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महुआ के अंदर-बाहर प्रदर्शन, भाषण, आंदोलन की कुछ तस्वीरें और कुछ बातें

जब पता चला कि महुआ न्यूज रूम पर यहीं के मीडियाकर्मियों ने सेलरी न मिलने के विरोध में कब्जा कर लिया है तो तुरंत यह महसूस हुआ कि आफिस के अंदर हड़ताल पर बैठे इन साथियों के समर्थन में आफिस के बाहर भी कुछ लोगों को खड़ा होना चाहिए. परसों दोपहर करीब एक या दो बजे कुछ एक साथियों से फोन पर बात की और भड़ास पर 'महुआ को घेर लो' का आह्वान कर बैठा. फेसबुक, फोन और वेब. इन तीन साधनों के जरिए बहुत लोगों तक अपनी बात पहुंचाई कि महुआ के सामने 12 बजे पहुंचना जरूरी क्यों है.

जब पता चला कि महुआ न्यूज रूम पर यहीं के मीडियाकर्मियों ने सेलरी न मिलने के विरोध में कब्जा कर लिया है तो तुरंत यह महसूस हुआ कि आफिस के अंदर हड़ताल पर बैठे इन साथियों के समर्थन में आफिस के बाहर भी कुछ लोगों को खड़ा होना चाहिए. परसों दोपहर करीब एक या दो बजे कुछ एक साथियों से फोन पर बात की और भड़ास पर 'महुआ को घेर लो' का आह्वान कर बैठा. फेसबुक, फोन और वेब. इन तीन साधनों के जरिए बहुत लोगों तक अपनी बात पहुंचाई कि महुआ के सामने 12 बजे पहुंचना जरूरी क्यों है.

ढेर सारे साथियों ने न सिर्फ आने का वादा किया बल्कि अपने साथ चार-पांच लोगों को लेकर वहां पहुंचने की गारंटी दी. कल दोपहर बारह बजे सुरेंद्र ग्रोवर, प्रदीप महाजन, अभिषेक श्रीवास्तव, शिवानंद द्विवेदी सहर, संजीव सिन्हा, आलोक कुमार, अनिल पांडेय, योगेश कुमार शीतल, विवेक सिंह, कमल सिंह, संजय तिवारी समेत कई साथी जब उपस्थित होने लगे तो लगा कि प्रदर्शन तो अब हो कर ही रहेगा. देखते ही देखते संख्या जब पच्चीस के पार होने लगी तो हम लोग नोएडा फिल्म सिटी में महुआ चैनल के आफिस के मेन गेट के ठीक बाहर खड़े हो गए और नारे लगाने लगे… 'पत्रकारों की सेलरी खाने वाले पीके तिवारी होश में आओ' 'महुआ के मालिक मुर्दाबाद' 'पत्रकार एकता जिंदाबाद' 'महुआ की मालकिन मीना तिवारी मुर्दाबाद' 'महुआ के मालिकों होश में आओ, पत्रकारों को सेलरी दिलाओ' 'महुआ मालिकों की लाली है, पत्रकारों की दिवाली काली है' …

ये सब नारे सुन कर अगल-बगल के लोग भी इकट्ठे हो गए फिल्म सिटी में मंजर कुछ ऐसा हो गया कि अरे, ये क्या हो रहा है, अब यहां भी धरना प्रदर्शन चालू हो गया… ये बातें वो कर रहे थे, जो महुआ आफिस के बगल के ही चैनलों में काम करते हैं लेकिन उन्हें पता तक नहीं था कि महुआ में सवा सौ मीडियाकर्मी कितने समय से बिना घर गए, बिना खाए पिए पड़े  हुए हैं, अपने अधिकार की लड़ाई को लेकर, अपनी सेलरी की मांग को लेकर… ढेर सारे मीडियाकर्मी ऐसे मिले जो दूसरे चैनलों में काम करते हैं और इस आंदोलन के पक्ष में हैं लेकिन खुलकर सामने आ पाने को तैयार नहीं थे… इन लोगों ने फोन कर एसएमएस कर इस आंदोलन के पक्ष में अपनी एकजुटता प्रदर्शित की.

हम लोग महुआ के इस गेट से उस गेट तक प्रदर्शन करते नारे लगाते हुए जाते और फिर सभा करने लगते… कनिष्ठ वरिष्ठ सभी पत्रकारों ने संबोधित किया और अपनी बात रखी. हम लोगों की गेट पर चल रही सभा और नारेबाजी को महुआ न्यूज रूम के अंदर हड़ताल पर बैठे कर्मचारी लाइव देखते रहे… एक तो सीसीटीवी कैमरे की वजह से और दूसरे सुरेंद्र ग्रोवर ने लाइव प्रसारण की व्यवस्था अपने सुयोग्य पुत्र के मदद से मीडियादरबार पर कर रखी थी… हम लोगों की भीड़, नारेबाजी, सभा देखकर अंदर बैठे हड़ताली मीडियाकर्मी उत्साहित हो गए और उनके मैसेज आने लगे कि वे अभिभूत हैं इस पक्षधरता पर…

पर हम लोगों की सभा, विरोध प्रदर्शन की खबर जब पीके तिवारी को उनके जासूसों ने, जो उस वक्त महुआ कैंपस के अंदर इधर से उधर चहलकदमी कर रहे थे, पहुंचाई तो पीके तिवारी उर्फ प्रमोद कुमार तिवारी के होश उड़ गए.. उन्हें लग गया कि मामला अब सिर्फ महुआ के हड़ताली कर्मियों का नहीं रह गया.. अब तो इसमें बाहर के संगठन, पत्रकार और लोग कूद पड़े हैं… हम लोगों ने सभा के दौरान साफ ऐलान कर दिया कि अगर आज रात तक मांगें महुआ प्रबंधन नहीं मान लेता तो जिले जिले से पत्रकारों को बुलाया जाएगा और फिल्म सिटी की मुख्य सड़क से लेकर महुआ आफिस तक को पूरी तरह जाम कर दिया जाएगा..

हम लोगों ने चेतावनी देकर सभा को ज्यों ही समाप्त किया और वापस लौटने लगे तभी पता चला कि महुआ के मालिक ने पुलिस को संपर्क किया और उन्हें सेट कर एक 'आपरेशन' की तैयारी करा डाली. इस आपरेशन का मकसद अंदर बैठे हड़तालियों को बाहर निकालना था ताकि बवाल को बढने से पहले ही खत्म कर दिया जाए. अंदर न रहेंगे हड़ताली और बाहर न आएंगे भड़ासी जैसे बवाली… पर पीके तिवारी का यह आपरेशन उलटा पड़ गया. भड़ास समेत कई लोगों को ज्योंही ये पता चला कि पुलिसवाले न्यूज रूम में घुस गए हैं और अभद्रता करने लगे हैं तो तत्काल लखनऊ से लेकर नोएडा, दिल्ली तक के वरिष्ठ नेताओं, अफसरों, पत्रकारों को संपर्क किया गया और किसी भी हालत में पुलिस एक्शन न होने देने का अनुरोध किया गया. यह पहलकदमी रंग लाई और पुलिस को उल्टे पांव लौटना पड़ा. हालांकि अंदर बैठे हड़ताली कर्मियों ने पुलिस की बेहूदगी की रिकार्डिंग कर ली है जो भड़ास के पास है और इसे यथाशीघ्र अपलोड किया जाएगा.

बाद में शासन पर इतना दबाव पड़ा कि पत्रकारों के पक्ष में फैसला करने के लिए पीके तिवारी पर प्रेशर पड़ने लगा. संभवतः पुलिस व प्रशासनिक अफसरों को निर्देश दे दिया गया था कि जल्द से जल्द पत्रकारों के हक में फैसला कराएं और दिवाली से पहले हड़ताली पत्रकारों को सेलरी दिलाएं. तब आनन-फानन में मजिस्ट्रेट को मौके पर भेजा गया और उन्होंने हड़ताली कर्मियों का बयान लिया. अफसरों के दबाव के बाद पीके तिवारी को अपनी तिजोरी का मुंह खोलना पड़ा पर तिवारी ने चालाकी पूरी दिखाई. केवल दस हजार कैश देने को तैयार हुआ, बाकी रकम पोस्ट डेटेड चेक के जरिए.

विचार विमर्श के बाद हड़ताली कर्मियों ने समझौता मंजूर कर लिया. आज शाम से एक-एक कर्मियों को सेलरी व चेक दिया जाने लगा है. तो इस तरह से एक आंदलोन को मंजिल मिली. सबक ये है कि अगर आप खुद अपने हक के लिए नहीं लडेंगे तो आपके साथ हो रहे अन्याय को कोई नहीं बंद करा सकता. जब आप खुद लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं तो दस ऐसे लोग आपके सपोर्ट में आकर खड़े हो जाते हैं जिन्हें आप जानते तक नहीं. इस अन्यायी, अत्याचारी और शोषक सिस्टम में बहुत जरूर हो गया है कि हम सब एकजुट, संगठित रहें और हर छोटी बड़ी साजिशों अन्याय का खुलकर विरोध करें.

आंदोलन की तस्वीरें देखने के लिए नीचे दिए गए नंबरों पर एक-एक कर क्लिक करें… जो अंक लाल रंग में हैं, उस पर क्लिक करने से महुआ न्यूज रूम के अंदर की वो तस्वीरें दिखेंगी जिसमें शाम के वक्त पुलिस वाले आफिस के अंदर घुस गए थे हड़ताली मीडियाकर्मियों को बाहर निकालने के लिए…

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और, ये है महुआ के न्यूज रूम में पुलिस के घुसने के दौरान का एक वीडियो… क्लिक करें….

http://www.youtube.com/watch?v=_m1Rqmg5330

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. संर्पक: मेल- [email protected] मोबाइल- 09999330099


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महुआ आफिस कब्जा

 

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