Kumar Sauvir : प्रतापगढ़ के बेहद बुजुर्ग और पांच महीना पहले प्रदेश सरकार द्वारा मंत्री पद से बर्खास्त किये गये राजाराम पांडेय अब नहीं रहे हैं। वैसे उनका काम-तमाम तो उसी दिन हो गया था जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें मंत्री का ताज छीन कर उन्हें बाकायदा पैदल कर दिया था। यह दीगर बात है कि पांडेय जी के आवास के हर कमरे में मुलायम सिंह यादव की फोटो लगी हुई हैं।
राजनारायण शैली के मजाकिया स्वाभाव वाले पांडेजी महिला जिलाधिकारियों पर अपनी सार्वजनिक टिप्पणियों पर विवाद में पड़ गये थे। आरोप लगा था कि उन्होंने उनकी सुंदरता पर कटाक्ष किया था। खबरें भी आयीं थीं कि उनमें से एक सुल्तानपुर की महिला जिलाधिकारी ने उसके बाद तमक कर उनकी खासी लानत-मलामत कर दी थी। वैसे बाद में पता चला था कि पांडेय जी ने उनकी एक सहज प्रशंसा भर ही की थी, जो उनकी कार्यशैली को लेकर ही थी।
खैर, मंत्रिमंडल से बर्खास्त किये जाने के बाद से ही पांडेजी वाकई परेशान थे। उनका 24 वर्षीय बेटा एक दुर्घटना में मारा गया था, और उसके सदमे में उनकी बुजुर्ग पत्नी पागल हो चुकीं। लेकिन सबसे ज्यादा कष्ट था उन्हें अपनी प्रतिष्ठा को लेकर। खबर है कि उन्हें हाल ही मंत्री बनाये गये अपने करीबी एक युवा तुर्क से कहा था कि भइया, मुझे मंत्री बनवा दो, वरना मैं खत्म हो जाऊंगा। बताते हैं कि इस पर इस तुर्क का टका भर जवाब दे दिया था:- बड़ी मुश्किल से ही मैं दोबारा मंत्री बन पाया हूं, आपकी क्या मदद कर सकता हूं।
पता चला कि इस पर राजाराम पांडे अपनी अरज लेकर सीधे लखनऊ पहुंचे और बीती शाम मुख्यमंत्री से भेंट की, लेकिन जवाब टका सा ही मिला। आखिरी कोशिश भी नाकाम होने के चलते उनकी हालत बिगड़ गयी और सिविल अस्पताल में उन्होंने आखिरी दम तोड़ दिया।
बस, आखिरी खबर एक और। आज दोपहर 5-कालिदास मार्ग स्थित अपने सरकारी आवास पर मुख्यमंत्री ने एक जलसे की शुरुआत में पांडेजी के कृतित्व और जीवन पर विस्तृत व्याख्यान दिया और बताया कि वे समाजवादियों का आदर्श थे। अखिलेश यादव ने इस मौके पर दो मिनट का शोक भी व्यक्त किया।
Kumar Sauvir : मृत्यु-श्रंखला की अगली कड़ी पंकज पर। पंकज यानी डॉक्टर पंकज सिंह। जौनपुर स्थित वीरबहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में एप्लाइड सायकोलॉजी पढ़ाता था पंकज। लेकिन अब नहीं रहा है पंकज। बीते 21 अक्तूबर की तड़के 2:54 उसका फोन आया। लेकिन यह मिस्ड हो गया। सुबह मैंने फोन वापस लगाया तो उसकी पत्नी ने बताया कि पंकज बुरी तरह झुलस गया है और वाराणसी के अस्पताल में भर्ती है। यह पूरा कांड बड़ा रहस्यमय था। जौनपुर से जो खबरें मिलीं, उससे पता चला कि घटना के दिन भोर में पंकज ने खुद को आग के हवाले कर दिया था। बीते गुरूवार उसकी मौत हो गयी। यूनिसर्सिटी के डॉक्टर केएस तोमर ने खबर की पुष्टि की।
सन-03 के अक्तूबर का वक्त था। मुझे जौनपुर में पहुंचे अभी दो महीना बीता था कि एक दुबला-पतला लेकिन तेजस्वी युवक ऑफिस में आया। सभ्यता और सलीका उसके अंदाज से टपक रहा था। बोला: मैं पंकज सिंह हूं। यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान पढ़ाता हूं। साथ ही कांग्रेस सेवादल का जिला प्रमुख भी हूं।
इसके बाद उसने मेरी तारीफों की झड़ी लगा दी, मसलन मैं बेबाक लिखता हूं। उसने बताया कि वह मेरी रिपोर्ट्स को लगातार पढ़ता है। यह भी कि इसके पहले जौनपुर में ऐसा तेवर कभी नहीं दिखा, वगैरह-वगैरह।
इसके बाद तो कई बार पंकज मेरे आफिस आया और लगातार बे-तकल्लुफ होता रहा, मगर सम्मान के साथ। सर या भाईसाहब बस। वह लगातार घरेलू होता गया। खबरों का एंगिल समझने-समझाने में भी वह मुझे लगातार मदद करता रहा। पता चला कि वह धनबाद के एक औसत जमींदार परिवार का इकलौता बेटा था। उसके पिता कांग्रेस के विधायक रह चुके थे। मेरी बेटियां पंकज को भइया कहने लगीं।
पंकज था कविता और शेर-शायरी का बड़ा प्रशंसक। खुद भी खूब लिखता था। कमर अब्बास रहे हों, या फिर ओमप्रकाश मिश्र, निसार हों या फिर प्रतीक मिश्र। रत्नेश तिवारी से उसने कविता-शायरी का गुरूमंत्र हासिल किया था। जौनपुर के रत्नों को खोजने-पहचानने में पंकज और रत्नेश ने मेरी बेहिसाब मदद की। शुक्रिया पंकज और रत्नेश।
मुझे याद है सन-04 में यूनिवर्सिटी का कन्वोकेशन हुए था। करीब 30 हजार छात्रों का विशाल जनसमुदाय। मानव संसाधन मंत्री और राज्यपाल मौजूद थे और पंकज ने इस पांडाल का ऐसा सधा हुए संचालन किया कि लोग दंग रह गये। बावजूद इसके कि वहां वरिष्ठतम शिक्षक भी मौजूद थे, लेकिन किसी में इतनी कूवत नहीं थी कि वह ऐसा दायित्व सम्भाल सकता।
पंकज ने कई अनूठे प्रयोग भी किये। वह सड़क पर बिखरे पत्थरों को बीनता और उन्हें नगीना बनाता रहता था। मसलन, मैंने एक लेख-रिपार्ट सीरीज प्लान किया था। नाम था:- जो पहुंचे जमीं से आसमां तलक। काल बाबा नाम के एक औघड़ बाबा को मैंने इस सीरीज में शामिल किया, और बाद में पता चला कि पंकज ने इस बाबा को सीधे अपने क्लास-रूम में ले जाकर सम्मान दे दिया। मकसद था, अंध-विश्वास के खिलाफ मनोविज्ञान के अपने छात्रों को जागरूक करना। काल बाबा से छात्रों से चुन-चुन कर सवाल दागे और बाबा ने उनका जवाब। और ऐसा कई बार साक्षात्कार छात्रों से कराया पंकज ने। यकीनन, यह अद्भुत प्रयोग था। कहने की जरूरत नहीं कि जल्दी ही पंकज जौनपुर का एक अपरिहार्य शख्सियत बन गया।
उसकी शादी तय करने के लिए पंकज ने मुझे अभिभावक का ओहदा दे दिया। और इसके बाद मैं वाराणसी होते हुए महुआ न्यूज का लखनऊ में ब्यूरो प्रमुख कर चला गया। मगर उससे सम्पर्क लगातार बना ही रहा। खबर मिलती रही कि वह दो बेटियों का बाप बन गया है।
लेकिन जल्दी ही पता चला कि पंकज को शराब की बेहिसाब लत पड़ गयी। इतनी कि उसका लीवर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। यह भी उसकी पत्नी से उसका नियमित झगड़ा होने लगा है। एक दिन उसे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने साफ कहा कि अब चाहे कुछ भी हो, लेकिन शराब नहीं पीना है। मगर लौट कर पंकज फिर शराब में डूब गया। एक दिन उसकी पत्नी का फोन आया। बोली:- चाहे कुछ भी हो, मैं पंकज को नहीं छोड़ सकती हूं, मगर पंकज तो अपने दोस्त ——-के चलते खुद को पूरे परिवार को तबाह कर रहा है।
पूछने पर उसने जिस दोस्त का नाम बताया तो मैं सन्न रह गया। यह शख्स कुछ बरस पहले जौनपुर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग को छोड़़कर एक दूसरी यूनिवर्सिटी से जुड़ गया था। पंकज की पत्नी का कहना था कि यूनिवर्सिटी छोड़ने के बावजूद उसका लगातार सम्पर्क पंकज से बना ही रहा। कुछ भी हो, जो जानकारियां उसकी पत्नी ने मुझे फोन पर दीं, वह किसी को भी विह्वल कर सकती थीं।
बहरहाल, पंकज पंच-तत्व में बिखर चुका है।
लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.





