इस दिवाली पर मीडियाकर्मियों के लिए अगर कोई सबसे बड़ा संदेश हो सकता है तो वो यही कि … जलिए और जगमगाइए. यहां जलना शब्द प्रतीक में है, संकेत में है. यह संघर्ष का प्रतीक है. यह एकजुटता और हिम्मत का संकेत है. यह साहस का इशारा है. महुआ न्यूज चैनल के मीडियाकर्मियों की एकजुटता और जीत से अंधेरे की गुफाओं और पतन के पातालों में चकरघिन्नी की तरह अकबकाया लुढक रहा चौथा स्तंभ थोड़ी उम्मीद की रोशनी से नहाया है.
वो उम्मीद ये कि सब खत्म नहीं हुआ है अभी. सूखा नहीं पड़ा है. पानी मरा नहीं है. नमक कायम है. खून में गर्मी, खून में उबाल यथावत है. ठंढा नहीं पड़ा है अभी. बहुत कुछ हो सकता है.
मीडिया के पेशे में मूलतः खुद को जलाते रहना ही सबसे बड़ा मंत्र होता है. सबसे बड़ा ज्ञान होता है. सबसे बड़ा उत्प्रेरक होता है. अगर खुद को जलना-जलाना छोड़ दिया तो समाज को, आम जन को क्या रोशनी देंगे. सब तक रोशनी पहुंचाने के लिए, अंधेरा का राज कायम न हो जाने देने के लिए हम मीडियावालों को जलते रहना बहुत जरूरी है. ताकि सब कुछ जगमग रहे. दिवाली की ढेरों शुभकामनाओं कबूल कीजिए और साथ ही आइए, महुआ के साथियों की जीत पर कुछ पड़ताल कर लें, और इसी बहाने अपने भीतर ताकझांक कर खुद के लिए एक खास पैमाना इजाद करें और उसी पर रखकर हम सब अपने को कसते, नापते, आंकते रहें…
तीन महीने की सेलरी खाने पर आमादा एक मीडिया मालिक जब अपने कर्मियों की हड़ताल, न्यूज रूम पर कब्जा जमाए रखने के ऐलान और आफिस के बाहर विरोध प्रदर्शन के लिए होने वाली जुटान से झुक जाता है.. सेलरी बांटने लगता है …. तो यह परिघटना किन मायनों में बड़ी है, इससे क्या सबक मिलते हैं.. इसके क्या निहितार्थ निकाले जा सकते हैं… आइए इसे बिंदुवार समझते-समझाते हैं…
1- दर्जन भर से ज्यादा न्यूज चैनलों को मैं जानता हूं जहां कई कई महीने की सेलरी लिए बिना लोग चुपचाप चैनल बंद हो जाने या बंद हुए बिना चैनल से सेलरी लिए बिना चले जाने को मजबूर हुए… कोई हो-हल्ला नहीं… मालिक भी नहीं डरा… और, सेलरी ना पाने वाले पत्रकार के मन में पैदा हुई कसक निराशा आज भी कायम है… तो, ऐसी स्थितियों में संघर्ष करना, एकजुट होकर लड़ना सबसे बड़ा और मारक हथियार है, यह महुआ के आंदोलन ने स्पष्ट किया… याद रखें, महुआ में ही ऐसा दूसरी बार हुआ है जब महुआकर्मियों ने एकजुट होकर अपनी बकाया कई महीनों की सेलरी ले पाने में सफलता हासिल की है…
2- जो मालकिन मीना तिवारी एक रोज पहले इन्हीं हड़ताली कर्मियों के बीच आकर कह चुकी थी कि हम लोग एक पैसा नहीं दे सकते क्योंकि उनके पास पैसा ही नहीं है… वही जब अचानक अगले दिन शाम को सेलरी बांटने लगती है, भले ही कुछ कैश और कुछ पोस्ट डेटेड चेक के रूप में, तो समझा जा सकता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मालिकों को खुद थूक कर चाटना पड़ा… सिर्फ एकजुटता और लंबा लड़ने का ऐलान…
3- हर आंदोलन में कुछ एक ऐसे साथी होते हैं जो अधैर्यवान, मैनेमजमेंट फ्रेंडली, निराशा पैदा करने के साथ-साथ आपस में ही झगड़ने, अपने ही लोगों की कमी दिखाने में व्यस्त रहते हैं… ऐसे लोगों की बातों, बयानों के जरिए बहुमत की जीत को खारिज नहीं किया जाना चाहिए… महुआ का मालिक तो यही चाहता था कि सेलरी न पाने से उब कर ये लोग खुद चैनल छोड़कर चले जाएं ताकि उसे न सेलरी देनी पड़े और न कंपनसेशन…फिर वह चुपके से नए लोगों की कम दाम में भर्ती करता और सेलरी की जगह थोड़ी थोड़ी भीख देकर फिर से चैनल के जरिए धंधा-पानी करता रहता… कम से कम इन लोगों ने चैनल मालिक की मंशा को भांपकर खुद को मानसिक रूप से तैयार किया और एक जुट होकर, जूझकर अपने तीन महीने के दिन-रात के काम का पैसा तो हासिल कर लिया…

महुआ न्यूज रूम कब्जाए महुआकर्मियों को निकालने के लिए जब जबरन पुलिस आ गई तो एकजुट महुआकर्मियों ने पुलिसवालों से जमकर बहस की और न्यूजरूम छोड़ने से साफ मना कर दिया. ऐसा हौसला उसी में होता है जो लंबी लड़ाई लड़ने और कुछ भी परिणाम भुगतने की मानसिकता से लैस रहता है.
4- अगर इन हड़ताली महुआ कर्मियों से कोई किसी बड़ी क्रांति की उम्मीद कर रहा था तो वह कुछ वैसा ही लल्लूलाल होगा जो फेसबुक छोड़कर सड़क पर एकजुटता दिखाने तो नहीं आएगा लेकिन दूर से जरूर कह देगा कि अरे, उसे तो इतनी बड़ी क्रांति की उम्मीद थी, ये लोग तो सिर्फ सेलरी के लिए लड़ रहे थे… ऐसे बयान देकर छोटे संघर्षों की भावनाओं को अपमानित करने और संभावनाओं को खारिज करने वाले लोग मूलतः जीवन में खुद डिप्रेस्ड होते हैं और दूसरों में भी हताशा फैलाते रहते हैं ….
5- फिल्म सिटी में कुछ ही महीनों में ये दूसरी बार हुआ कि आम मीडियाकर्मियों के हक में पत्रकारों ने एकजुटता दिखाते हुए नारेबाजी की, जुलूस निकाला, सभा की.. मतलब ये कि फिल्म सिटी वाले जितने भी चैनलों का मैनजमेंट है, और संपादक हैं, ये लोग जान चुके हैं कि उनके यहां की समस्याएं, झगड़े, रगड़े, छंटनी, अपमान, डांट, फटकार, बिना तनख्वाह काम जैसे मुद्दे किसी मंगल ग्रह के मामले नहीं कि जहां कोई सपोर्ट देने, नारे लगाने, भाषण देने नहीं आएगा… मीडिया के खिलाफ खुलकर बोलने लिखने और सड़क पर उतरने वालों की एक पीढ़ी तैयार हो चुकी है… या तो इस पीढ़ी का हिस्सा बनिए या फिर कहीं किसी कोने में बैठकर अपनी ही दुनिया में मगन रहते हुए चिंतन-मनन करिए और अपनी मान्यताओं में डूबते-उतराते रहिए. लड़ने वाले तो लड़ेंगे और अपने तात्कालिक लक्ष्यों को हासिल करेंगे. तात्कालिक लड़ाइयां ही लंबी लड़ाइयों में तबदील होती हैं… ये पता होना चाहिए… कोई लंबी लड़ाई प्लान करके नहीं शुरू की जाती.. बस, छोटे मसले ही भड़क कर छोटे से बड़े संघर्ष में तब्दील होते हैं …
6- जब एक न्यूज चैनल के लोग अपनी बकाया सेलरी के लिए एकजुट होकर लड़ते हैं, कुछ लोग उनके सपोर्ट में आते हैं, और अंत में संघर्ष की जीत होती है, तो जो इससे तात्कालिक मांग पूरी हो जाती है, इससे यह जीत (भले ही अर्थवादी, पेटवादी और निहितस्वार्थी जीत हो) का संदेश चुपचाप दूसरे न्यूज चैनलों के कर्मियों तक भी पहुंचता है और वो भी इन स्थितियों के आने पर ऐसा ही कुछ करने का प्लान करते हैं, मन बनाते हैं.. मतलब, चरम बाजारू दौर में संघर्ष अब भी कामयाब रास्ता हो सकता है, यह महुआ के आंदोलन ने इस्टैबलिश किया… और, संघर्ष करने वाले लोग बाकी मीडिया के लिए अछूत नहीं होते, वे भी नौकरियां पाते हैं और ठान कर करते हैं, यह दिखता है…
7- प्रबंधन कितना क्रूर हो सकता है… बिजली पानी काट कर, इंटरनेट काट कर, दिन में गर्मी के वक्त एसी बंद कर और सुबह ठंडक के वक्त एसी फुल कर हर तरह से प्रताड़ित करता है अपने हड़ताली कर्मियों को ताकि ये टूट जाएं और न्यूज रूम छोड़ जाएं… पर ये एकजुट पत्रकार इतने विपरीत हालात में भी डंटे रहे कि बिना सेलरी लिए नहीं जाएंगे चाहे जो हा जाए… ये जिद, ये जिजीविषा, ये माद्दा बहुत बड़ी बात है… पुलिस से लेकर शासन तक को मैनेजमेंट ने अपने पक्ष में पटा लिया था लेकिन इन पत्रकारों की एकजुटता संघर्ष से मीडिया इंडस्ट्री के दूसरे संवेदनशील पत्रकार और संपादक न सिर्फ जगे बल्कि शासन प्रशासन को चेता दिया कि अगर पुलिस ने कुछ किया तो मामला बिगड़ जाएगा और हर हाल में मैनेजमेंट इन कर्मियों की मांग को पूरा करे… मतलब, जब आप खुद अपने हक के लिए दो कदम चलते हैं तो आपके सपोर्ट में चार कदम चलने वाले शुभचिंतक समर्थक भी मिल ही जाते हैं और लड़ाई इस प्रकार काफी बड़ी रूप ले लेती है…
8- कर्मियों की पहली और मूल मांग व प्राथमिक सोच यही थी कि दिवाली के ठीक पहले उनके जेब में कुछ पैसे हों, ताकि वे अपने घर परिवार की मूलभूत बुनियादी जरूरतों को पूरी कर सके… इस जज्बे के साथ लड़े और इसे पूरा करवाकर दिखा दिया… वे व्यवस्था परिवर्तन के मकसद से नहीं उतरे थे और उनसे ऐसी अपेक्षा जो लोग कर रहे हैं वो यूटोपिया नास्टेल्जिया में जीने वाले लोग हैं … इस आंदोलन का लक्ष्य तय था और उसे इन कर्मियों ने पूरा किया…
9- कह सकते हैं कि पोस्ट डेटेड चेक मिलेगा या नहीं मिलेगा… पर ये जान लीजिए.. तिवारी ने अगर पोस्ट डेटेड चेक नहीं दिया तो ये सभी कर्मी जिनमें से काफी संख्या में महुआ के भूतपूर्व कर्मी हो चुके हैं और खुद की मर्जी से हुए हैं क्योंकि अब वे यहां काम करके अपनी सेलरी नहीं फंसाना चाहते, फिर से एकजुट होंगे और तिवारी को हर तरफ से घेर लेंगे… मतलब, नए फेज की लड़ाई के लिए ये तैयार हैं.. बस, तिवारी ये दिखा दे कि वो पोस्ट डेटेड चेक नहीं देने वाला…
10- सरोकार की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कई लोगों को जानता हूं जो खुद की निजी लड़ाइयां लड़ने की जगह चुपचाप हार जाने, समझौता कर लेने या थूक निगल कर घर लौट जाने को प्राथमिकता देते हैं लेकिन जब दूसरों के संघर्ष की बात आती है तो बिना उन्हें सपोर्ट दिए, केवल मीनमेख निकालने का काम करते हैं… ऐसा करने की जगह जो लोग लड़ रहे होंते हैं उनके साथ उनके सामने कंधा मिलाकर खड़ा होना सीखें ताकि संघर्ष करने वालों को यह भरोसा रहे कि उनके साथ ऐसे भी साथी खड़े हैं जो उन्हें जानते तक नहीं लेकिन उनके मुद्दे को सपोर्ट करते हैं…
11- इन महुआ के साथियों ने अपने तीन-चार दिनों के संघर्ष से अपने खुद के जीवन में लड़ने का जो जज्बा पाया है, जो अनुभव पाया है, लड़कर जीत जाने का जो स्वाद चखा है, ये सब कुछ उनके ता उम्र काम आएगा… बाकी, नौकरियां तो मीडिया में आती जाती मिलती छूटती रहती हैं.. मैं कम से कम बीस ऐसे हड़ताली महुआकर्मियों को जानता हूं जिन्होंने इस वक्त तक दूसरे चैनलों अखबारों से एप्वाइंटमेंट लेटर ले लिए हैं, वो बातचीत पहले से कर रहे थे..
12- महीना बीतते बीतते महुआ के हड़ताली मीडियाकर्मी जो जज्बे वाले, कामकाज में माहिर और संघर्षशील लोग हैं, कहीं न कहीं अपना दाना पानी फिक्स कर लेंगे और काम शुरू कर देंगे.. अगर कोई बचा तो उसकी मदद हम सब मिल कर करेंगे.. उन लोगों की मदद करने में ज्यादा सुख मिलता है जो खुद को बेचारा बनाने की जगह अपने हक और अपनी मंजिल के लिए लड़ने भिड़ने और जूझे रहने के लिए तैयार रहते हैं… इस बारे में आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत और पहले महुआ में कार्यरत रहे विकास मिश्रा ने ठीक ही लिखा है एफबी पोस्ट पर, एक अपील करती हुई पोस्ट… कि इन लड़ाकों, जो काम से लेकर सड़क तक पर आजमाए गए और हर जगह खरे हीरे पाए गए, को नया ठिकाना देने-दिलाने के लिए पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लोगों को लग जाना चाहिए… पढ़िए यहां: https://www.bhadas4media.com/article-comment/15580-2013-11-02-15-22-29.html
13- हम अगर इन महुआ कर्मियों को अपने ही समाज के बीच से आया हुआ युवा मानते हैं तो इनसे हम किसी महान संत जैसे आचरण, शब्दावली, भाषा, संस्कार की उम्मीद नहीं कर सकते… वो वैसे ही जिएंगे बोलेंगे हंसेंग रोएंगे चलेंगे जैसा आजकल का माहौल है.. आजकल के युवा को अपना लक्ष्य खूब पता रहता है… बाकी झंझटों, बंधनों में वो नहीं पड़ते-फंसते… महुआ के ज्यादातर साथियों को बिना सेलरी अब काम नहीं करना था क्योंकि वो पिछले एक साल से सेलरी संकट से जूझ रहे हैं और हर महीने पहले से ज्यादा देर से सेलरी पाने को मजबूर होते रहे हैं.. इसी कारण तीन महीने की सेलरी का बैकलाग चलने लगा… सोचिए, तीन महीने की सेलरी नहीं आए तो लोग कैसे जी रहे होंगे… तो, ये लोग अब रोज रोज के अवसाद, त्रासदी, असुरक्षा से मुक्ति पाने के लिए अपना समस्त बकाया सेलरी लेकर महुआ को अलविदा कहना चाहते थे और यही किया भी…
14- पत्रकारिता के पेशे का असली गला अगर किसी ने घोंटा है तो वो इस देश के राजनेताओं और बाजारवादी नीतियों ने. अजीब अजीब किस्म के लोग मीडिया में आ गए और मीडिया का नाम पावर ब्रोकिंग करने और काली कमाई की सफेद धुलाई करने वाली फैक्ट्री बना डाला… मीडिया में काम करने आने वाले नौजवान भरसक कोशिश करते हैं कि अपने संस्थान के दबावों-इशारों के बावजूद कुछ मानवीय, कुछ सरोकारी, कुछ अलग, कुछ नया, कुछ बड़ा कर दिखाएं… और, करते भी हैं.. लेकिन जब मालिक, लाला, डायरेक्टर, संपादक ही उन्हें रोज रोज पतन की एक नई सीढ़ी पर चढ़ने को कहेंगे तो वहां वही टिकेगा जो सबसे ज्यादा लचीला होगा, सबसे ज्यादा झेलने-सहने वाला होगा.. ऐसे में इस किस्म के सहनशील और लचीले लोग अगर एकजुट होकर आंदोलन करने का माद्दा रखते हैं तो यह बताता है कि अब वो दौर नजदीक है जब इस तरह के चिरकुट चैनलों में मालिक और संपादक दौड़ाकर पीटे जाएंगे… महुआ के आंदोलन की सफलता का एक निहितार्थ ये भी है… इसी कारण ये अचानक ही नहीं है कि महुआ के संपादक किशोर मालवीय मीडियाकर्मियों की हड़ताल शुरू होते ही इस्तीफा देकर पतली गली से भाग निकले…
15- महुआ में इन मीडियाकर्मियों ने अपने लेवल पर बातचीत कर, अपने लेवल पर तय करके अपनी रणनीति के हिसाब से आंदोलन शुरू किया और अपने ही लेवल पर तय किया कि कैसे और कब इसे खत्म करना है… उन्हें जाने कितने तरीके से डराया, धमकाया, परेशान किया गया.. फूट डालने की कोशिश की गई.. मानसिक, वैचारिक रूप से तोड़ा और डराया गया… लेकिन वे तब ही हटे जब उन्हें उनकी इच्छित मंजिल मिल गई… दिवाली के ठीक पहले जेब में थोड़े पैसे तो हों ताकि महीनों से सूने घर में कुछ दिया, कुछ पटाखे, कुछ मिठाई, कुछ रोशनी हो… ऐसा वो कर ले गए… और अपने जैसी स्थितियों में फंसे लोगों को संदेश दे गए कि.. ''बिन लड़े लाला से कुछ भी नहीं मिल सकता ये जानकर… अब जुटान हड़ताल न्यूजरूम कब्जान करने लगे लोग मेरे मीडिया इंडस्ट्री के… ''
16- और आखिर में…, दुनिया का इतिहास बताता है कि कहीं भी अगर कोई बड़ी क्रांति हुई तो उसके पहले किसी छोटी और बड़ी निजी किस्म की घटनाओं से उपजे संघर्षों ने ही बाद में बड़ा रूप लिया और उसका फलका इतना विस्तृत हुआ कि नीतियां तक बदलवाने में वे आंदोलन सफल हो गए… इसलिए, चिंगारी को तो भड़कते रहने दीजिए ताकि ये एक दिन शोला बनने की स्थिति में आ सके… आप अगर शुरू से ही शोला की कल्पना करते हैं, शोला भड़कने के सपने देखते हैं और उस शोला के जरिए सब कुछ जो बुरा है उसके नष्ट हो जाने और नए के निर्माण की संभावनाएं तलाशते टटोलते हैं तो फिर आप अभी हास्टली किस्म के हाइपोथिटिकल एंड यूटोपियन रिवोल्यूशनरी हैं, जो रीयल्टी से कम, अपने तर्कशास्त्र से ज्यादा संचालित होता है….
जय हो…
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया.काम
संपर्क: मेल- [email protected], फोन- +91 9999330099
ये है महुआ के न्यूज रूम में पुलिस प्रवेश के दौरान का एक वीडियो… क्लिक करें….
http://www.youtube.com/watch?v=_m1Rqmg5330
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