उनकी भाषा में भी हसोड़पन साफ दिखाई देता था. सीधा और सरल जीवन जीना ही उन्हें अच्छा लगता था. उनके बातचीत के लहजे में हमेशा खुलेपन व स्वतंत्र जीवन का अक्स देखने को मिलता था. जी हां मैं बात कर रहा हूं मशहूर व्यंग्यकार केपी सक्सेना यानी कालिका प्रसाद सक्सेना जी की जो अब हमारे बीच नहीं हैं. कोई चार साल पहले मेरी उनसे एक मुलाकात लखनऊ के कृष्णा नगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुई थी. हांलाकि फोन से परिचित बहुत पहले से था.
मैं उनका पूरा नाम नहीं जानता था, बस केपी नाम से ही परिचित था. कार्यक्रम के अंत में मैं उनसे मिला और प्रणाम करके हालचाल पूछाा. मैंने कहा सर आपके व्यंग बहुत अच्चे लगते हैं. बातों ही बातों में मैंने उनसे कहा सर आपका पूरा नाम क्या है, तो उन्होंने कहा यार पूरा नाम मत पूछो, नाम ठीक नहीं है. उनकी बात सुनकर मैं सोचने लगा, भला किसी का नाम भी गलत हो सकता है. मैंने उनसे कहा सर क्यों नाम ठीक नहीं है आपका. तो उन्होंने कहा यार नाम पुराने जमाने का है. मेरा नाम कालिका प्रसाद है. उनकी बात सुनकर मैं थोड़ा हंस पड़ा. तब फिर उन्होंने कहा कि तुम्हें भी लगा ना मेरा नाम बेकार है मैंने कहा नहीं सर आपका नाम बहुत अच्छा है, बल्कि आपसे मेल भी खाता है. तब वह भी खिलखिलाकर हंस पड़े. भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.
रमेश ठाकुर युवा पत्रकार हैं.