Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

प्रिंट-टीवी...

आशीष अग्रवाल को जवाब क्यों नहीं दे रहे राजुल माहेश्वरी? (पढ़ें दो मेल)

श्री राजुल माहेश्वरी जी
प्रबंध निदेशक
अमर उजाला पब्लिकेशन लिमिटेड
नोएडा

आदरणीय भाई साहब
सादर नमस्ते

श्री राजुल माहेश्वरी जी
प्रबंध निदेशक
अमर उजाला पब्लिकेशन लिमिटेड
नोएडा

आदरणीय भाई साहब
सादर नमस्ते

१७ अगस्त २०१३ में एक वर्ष के करीब पूर्ण होने को है, बिना किसी कारण के मुझे कार्य से अलग कर दिया गया है, मैंने पहले भी निवेदन किया था और फर्रुखाबाद में मेरे काम करने के दौरान की सारी हालत आपको इमेल से अवगत कराया था. मुझे विश्वास था कि आप मुझे समय देकर वह सारे प्रमाण भी देखना चाहेंगे जिसकी वजह से मेरे विरुद्ध अनावश्यक रूप से विरोधी माहौल बनाया गया और आपको भ्रमित किया गया। जबकि मैं काम करना चाहता हूँ। पिछले एक साल से ज़बरदस्त तनाव में हूँ, आखिर सर्वाधिक काम करने और अपेक्षा से ज्यादा अच्छे परिणाम देने के बाद भी मुझे सिर्फ अच्छे काम की सजा क्यों दी जा रही है?

इस दौरान न तो मुझसे इस्तीफ़ा देने को कहा गया है और न ही मुझे किसी पत्र का उत्तर मिला है और न मुझे आपने मेरा पक्ष सुनने के लिए समय ही दिया है, अक्तूबर २०१२ के बाद से मेरा वेतन भी नहीं दिया गया है, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मुझे क्या करना है, आर्थिक समस्या भी गंभीर हो गयी है…

आपके उत्तर की प्रतीक्षा में

सादर

आशीष अग्रवाल

२६, जुलाई २०१३
बरेली

 —– Forwarded Message —–
 From: ashish agrawal
 To: Rajul Maheshwari
Sent: Saturday, 2 February 2013 2:07 PM
Subject: Rajul ji se fariyaad

        आदरणीय भाई साहब
        सादर नमस्ते  

        मैंने पहले भी आपको एक मेल भेजा था। इस मेल के जरिये मैं आपको वह सारी हालत बताना चाहता हूँ जिस हालत में मैंने फर्रुखाबाद में काम किया। अगर आप मेरे से इतना नहीं कहते की आप नेगेटिव नहीं सुनना चाहते हैं और मुझे वहां दो साल रहना है,तब तो  कुछ भी करता आपसे अपना तबादला कहीं भी करवा लेता।

        1- शुरू के दिनों में जिस तरह से  जुयाल जी ने मेरे साथ आश्चर्यजनक व्यवहार किया उसके बारे में आपको बताने के कारन इन लोगों ने ही यह प्रचार किया कि मैं हर बात आपको बताता हूँ। जबकि ऐसा नहीं था। आपके ही कहने पर मैंने जब भूपेंद्र दुबे के साथ अपनी परेशानी बतायी तो यह इसलिए मेरी भूल थी कि वह और दिनेश जुयाल एक ही तरह की बात करते थे यह सिर्फ आपको दिखाने के लिए अलग अलग बनते थे।

        2-मेरी समझ में यह बात काफी पहले आ गयी थी की दिनेश जुयाल हों या सतीश द्वेदी ,या दुबे जी या कौशल किशोर और एस पी सिंह ,आखिर सबका एक साथ तो मैंने कुछ कर नहीं दिया। यह बात तो आप भी समझ रहे होंगे! मैं इन  सबसे पूरे सम्मान के साथ के साथ बात करता रहा जबकि यह् लगातार  मेरा मज़ाक उड़ाते रहे
        दफ्तर का stablizer खराब था मैंने 19 दिसम्बर को ज्वाइन किया था कानपुर से 21 तारीख को आये मेकनिक ने ही बताया कि यह नया लगेगा , मेरा इस बातचीत से कोई लेना देना नहीं था एक दिन मैकेनिक अखिलेश दुबे ने मुझे बताया कि  मैं दुबे जी को एक मेल डाल दूँ  तब stablizer  नया आ जाएगा मैंने मेल भेज दी .इसके बाद भी stablizer करीब तीन माह बाद आया।

        3- दफ्तर का मोडम ख़राब था। इंटरनेट नहीं चलता था रात के समय नीरज दिक्षित और पाशा ही नेट का तार निकाल दिया करते थे मैंने जी एम टेलीफोन  को बोलकर नया तार लगवाया फिर पता  लगा की हमें अपना मोडम बदलना है उसके लिए 1800 रुपये जमा करने हैं कानपुर से सतीश द्वेदी और मोहन कुमार तीन माह तक यही कहते रहे की मोडम विभाग से किराए पर लेना मैंने  कहा कि ऐसा नहीं होता है इन लोगों ने फिर खुद बात की और मुझे बताया कि जे ई से मैं बात कर लूँ मैंने बात की तो जे ई ने बोला  उन्होंने किसी को नहीं बताया है की मोडम किराए पर मिलता है ऐसे कोई स्कीम नहीं है विधान सभा चुनाव के मौके पर मैंने फिर कहा कि पैसे जमा करवा दीजिये वरना काम प्रभावित होगा तब भी किसी ने नहीं सुनी फिर हार कर जब मैंने कहा की मैं खुद अपने जेब से पैसे जमा करवा दे रहा हूँ  तब मेर से कहा गया की एक दिन रुक जाइये आज नॉएडा से अनुमति ले ली जायेगी मैंने अगले दिन पैसे जमा करवा दिए तब सतीश द्वेदी का पात्र आया की आप खुद पैसे जमा करके मोडम लगवा लें

        4-दफ्तर में बिजली के वोल्टेज की समस्या थी पहले बताया  गया कि  वह stablizer  से ठीक होगी .मगर बिजली वालों ने बताया कि लाइन दूसरी पड़ेगी वह भी मैंने अपने स्तर  से करवाई। इस काम में भी दफ्तर का कोई भी आदमी कोई सहयोग नहीं करता था इस बात पर चकित था। यह सब मेरी समझ से परे था

        5- रिपोर्टर अजय द्वेदी काम नहीं करते थे यही हाल बाकि लोगों नीरज कौशिक और पाशा का था एक बार मैंने किसी और के जरिये अजय द्वेदी से बात करवाई कि आखिर वह बताएं की काम क्यूँ नहीं कर रहे हैं क्या तबादले की वजह से?वह अपना तबादला कानपुर चाहते थे मगर उन्होंने बताया कि  अगर वह काम करेंगे तो दिनेश जुयाल नाराज़ होंगे उन्होंने ही उनसे और बाकी  तीनों लोगों से मना किया हुआ है काम न करें।

        6-मेरे वहां जाने के 10-12 दिन बाद कानपूर से उपहारों का ट्रक आया मैं उस समय होटल में रहता था जबकि मधुकर पाण्डेय दफ्तर के पास ही रहते थे चाबी भी उनके ही पास रहती थी ,तब भी उन्होंने रात के तीन बजे ट्रक वाले को मेरा नम्बर दिया और बोले की वही अभी रात में ट्रक उतरवा सकते हैं जबकि वह यह कह सकते थे कि सुबह ट्रक उतरेगा।

        7- विधान सभा चुनाव में खुद जुयाल जी ने साप्ताहिक अवकाश रद्द किये फिर मधुकर पाण्डेय ने मेरे से बाहें चढ़ाकर कहा कि  अवकाश मैंने रद्द किये हैं और कोई भी इस बात का नहीं मानेगा यह बात मैंने उसी समय जुयाल जी को बतायी तो सबके सामने फोन पर बोले कि  मैं  लोगों से काम नहीं ले प् रहा हूँ ,जबकि मैंने ठीक से काम भी शुरू नहीं किया था सारा काम मधुकर पाण्डेय के ही पास था मेरे से अगर कुछ पूछते थे तो बता दिया करता था।

        8-तीन लोगों के काम छोड़कर जाने की बात भी मुझे जुयाल जी ने बतायी

        9- इसके एक दिन पूर्व इन तीन लोगों में से एक ने मुझे दफ्तर में बे वजह गालियाँ दीं मैंने जब जुयाल जी बताय तो बोले यार मैं  कुछ नहीं कर सकता। यही तीनो लोग बाकी काम करने वालों को कहते थे कि कम के लिए जान दॊगे क्या? जबकि सब  काम कर रहे थे।

        10- यही मधुकर पाण्डेय और और बाकि तीन लोग ही थे जिन्होंने मुझे मकान नहीं मिलने दिया आखिर मकान देखने किसी के तो साथ जाना ही पड़ता  

        11- चुनाव के दौरान ही जुयाल  जी ने मधुकर पाण्डेय को कानपुर बुला लिया मैंने कहा कि दो एक दिन में भेज दूंगा क्यूंकि कुछ लोग छुट्टी पर हैं और मैंने वादे के मुताबिक़ भेज भी दिया और फिर मधुकर को इन्होने कानपुर से उन्नाव भेज दिया भूपेंद्र दुबे ने मेरे से कहा की अब जुयाल जी उन्नाव में हालत खराब करवाएंगे मैं इस बात को सुन ही सकता था। सुनता रहा। मधुकर के लिए कोई तबादला आदेश जारी नहीं हुआ और अजय द्वेदी जो एक साल से अपना तबादला कानपुर मांगे रहे थे के लिए जुयाल जी ने मेरे से कहा की इसके लिए एक शिकायत भेज दो की वह काम नहीं कर रहा है मैंने मना कर दिया और कहा कि  जब वह खुद एक साल से तबादले के लिए कह रहे है उनको आपने खुद ही आश्वसान  दिया है तब शिकायत क्यूँ की जाए फिर गलत शिकायत कैसे करूँ?

        12-आपको यह जान  कर आश्चर्य होगा कि  अजय के तबादले का आदेश जारी हुआ और मधुकर फर्रुखाबाद से कानपुर गए फिर वहां से उन्नाव गए और उन्नाव से वापस फिर कानपुर. उनका तबादले का कोई आदेश जारी नहीं हुआ और 17 अगस्त को जब मैं  नॉएडा में वैभव जी से मिला तो उन्होंने पहले आरोप यही लगाया कि  मेरी वजह से लोग काम छोड़कर गए उनमे मधुकर और अजय द्वेदी भी  हैं

        13-सर्कुलेशन  के आशीष गौड़ कभी कभार ही दफ्तर आते थे मेरा इससे क्या लेना देना था?मगर अक्सर कानपुर से एस पी सिंह कहते थे की आशीष गौर को भी देखिये मैंने बताया की वह दिखाई नहीं दे रहे हैं कानपुर ड्यूटी पर होंगे तब बोले कि नहीं वहीँ है, उसको कानपुर के लिए मना कर दिया है। इसके बाद आशीष गौर मुझे फोन करते और कहते की मैं उनकी शिकायत करता हूँ ?अब इसमें मेरा क्या दोष है ?और जब मैंने एस पी सिंह को बोला कि वह मरे से अभद्रता कर रहा है तब वह कभी हँसते और कभी चुप हो जाते। अब इसका आशय यह नहीं कि यही लोग मेरा झगडा करवाना चाहते थे ? मगर मैं अपनी ही सतर्कता से किसी से नहीं उलझा क्यूंकि मुझे सिर्फ काम करना था —–यह आपका ही सन्देश और आदेश था वैसे भी मैं सदैव काम में ही यकीं रखने वाला रहा हूँ फिर मुझे विवाद्दस्पद बनाने में कुछ लोग सक्रिय रहे।

        14-आशीष गौर ने मेरी एक बार शिकायत कि  मैंने दफ्तर में ताला लगा दिया और वह दफ्तर से लौट गए ….इस पर यादवेश जी के मेल पर जुयाल से स्पष्टीकरण मांगा गया तब मैंने वह भी भेज दिया  और उसकी कापी आपको भी भेजी। उसमे उपस्थिति रजिस्टर की फोटोस्टेट भी लगाई, जिसमे एक माह से ज्यादा समय के करीब आशीष गौर के हस्ताक्षर नहीं थे उसकी प्रति भी हर माह सतीश जी को भेजी जाती थी ,इसके बाद सतीश द्वेदी और एस पी सिंह फरूखाबाद आये और आशीष गौर के बारे में बात की। मैंने कहा कि ऐसी कोई बात ही नहीं है न मुझे उनसे कोई शिकायत है। होगी भी क्यूँ?मगर जब आप मेरे से कुछ पूछेंगे तब जो मुझे पता होगा वही बताऊंगा इस पर आशीष गौर मेरे से अभद्रता करें इस बारे में आप बताएं कि  क्या करूँ?

        15-आशीष गौर ने कायमगंज क्षेत्र के एक व्यक्ति से एजेंसी के लिए पांच हज़ार रुपये ले लिए ,आठ माह तक उसको एजेंसी नहीं दी गयी। उस व्यक्ति ने आफिस आकर अपनी बात कही ,जो मैंने तुरंत ही जी एम श्री भवानी जी को बता दी। तब भवानी जी ने मेरे से कहा की उस आदमी से मैं लिखित में ले लूं। वह आशीष गौर को बर्खास्त कर देंगे। उन्होंने यह भी कहा की मैं उस आदमी की उनसे बात करवा दूँ। मैंने वह भी करवा दी उसके बाद भवानी जी का ही फोन आया की उनकी बात हो गयी है। अब लिखित में आते ही वह कार्रवाई कर देंगे। मगर अभी तक कुछ नहीं हुआ, जबकि आशीष गौर इसके पहले ही कानपुर जा चुके थे और उन्होंने उनकी  जगह आये सुकेश शुक्ल के हाथ पांच में से चार हज़ार रुपये वापस करवाए।  मगर आधिकारिक  रूप से उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

        16-कायमगंज के रिपोर्टर मधुसुदन की नियुक्ति के लिए भूपेंद्र दुबे मेरे से पहले से ही कह रहे थे और मैं उनसे एक ही बात कहता की की आप मुझे इन सब बातों से दूर रहने दीजिये। जो है जैसा काम कर रहा है। जुयाल जी सब जानते हैं। फिर जुयाल जी के नोयडा जाने के बाद फर्रुखाबाद दफ्तर में आये दुबे जी ने सबके सामने मेरे से बोला कि मैं मधुसुदन अरोरा के लिए मेल क्यूँ नहीं बेज रहा हूँ? इस समय तक यतीन्द्र खुद छोड़कर  जा चुके थे इसके साथ में यह भी सच है की मैं भी यही चाता था कि कोई भी काम करने वाला आदमी आये और काम करे इस नाते मधुसुदन अरोरा ही एक मात्र पत्रकार कायमगंज में थे जिनको  रखा जाना चाहिए था। इस बीच में सतीश द्वेदी  मेरे से अक्सर पूछते थे कि कायमगंज में किसको रखा जा रहा है किसका नाम दे दिया जाये यह बात नोएडा से वैभव जी पूछ रहे हैं। जल्दी बताइये ,मुझे आश्चर्य होता था तब मैंने उनसे यही कहा कि आप कानपुर से किसी को ही भेज दें। तब उनका कहना था वहीँ का आदमी रखना है मधुसुदन को ही करिए उनको तो जुयाल जी ने बिना वजह परेशान किया। बाद में जब दुबे जी ने आफिस में कहा की मेल भेजो। तब मैंने उनके लिए मेल भेजी।
         यहाँ आपको बताना  जरुरी है कि आश्चर्यजनक ढंग से जिस दिन मधुसुदन अरोरा को कानपुर बुलाया गया तब रात में 9 बजे मुझे हरीश चन्द्र सिंह ने फोन किया कि आपने (राजुल जी ) ने मधुसुदन के लिए मना कर दिया है और आधे घंटे बाद ही उन्होंने मुझे बताया कि  हरीश जी ने आपको राजी कर लिया है अब कोई बात नहीं ,जबकि उस दिन मधुसुदन करीब दो लाख रुपये का विज्ञापन लेकर कानपुर गये थे। वह विज्ञापन भी वापस कर दिया गया और दो दिन बाद उसको छाप  दिया गया .आपको  बता दूँ यह विज्ञापन सिर्फ मेरा ही idea  था जो कानपुर आल एडिशन  में छापा गया।

        17- कमाल गंज के संवाददाता केशव दुबे के खिलाफ फरवरी से ही विज्ञापन वाले फर्जी बिलों की जांच कर रहे थे। भूपेंद्र दुबे ने मुझे खुद फोन करके बोला कि आपने केशव दुबे को जेल भेजने के लिए कहा है और मेरे से बोले कि  क्या मैं  उनको जेल भिजवा  सकता हूँ? मैंने कहा आप जांच करवा लीजिये रिपोर्ट होनी है तो आपको ही कानपुर से भेजनी है। बाद में करीब चार माह के बाद एक दिन हरीश जी ने  मेरे से कहा कि केशव दुबे को काम करने से मना कर दीजिये और उनको कानपुर भेज दीजिये। मैंने केशव दुबे को यह संदेश दे दिया ——आश्चर्य है कि 17 अगस्त को नोयडा में वैभव जी ने मेरी वजह से काम छोड़कर जाने वालों की सूचि में केशव दुबे का भी नाम लिया जबकि केशव दुबे ने काफी मोटी रकम के फर्जी बिल जारी करके  विज्ञापन छापे और विज्ञापन के लोगों ही उनके बिल पकडे।

        18- कमाल गंज में केशव दुबे के बाद किसी आदमी को रखने के लिए मेरे से हरीश जी ने कहा तो मैंने बताया कि इन्द्रेश चौहान एक लड़का है जो एजेंट भी है और काम भी करता है तो बोले उसको आप मत रखिये,कोई और नाम बताइये। मैंने कहा पुराने रिपोर्टर आशुतोष हैं। बोले उसको भी नहीं करना है। मैंने कहा फिर तो देखना पड़ेगा। समय लगेगा। मगर इन दोनों को नहीं रकहना है क्यूंकि इन्द्रेश और आशुतोष साथ-साथ ही काम करते हैं। इसके बाद मेरे फर्रुखाबाद से आने के बाद इन्द्रेश को ही नियुक्त कर दिया गया।

        19- हरीश जी के आने के बाद मुझे दो बार कानपुर बुलाया गया मैंने इसका टूर का बिल पेट्रोल का लगा दिया मुझे एकाउंट से बताय गया कि  की मेरा कार का स्वीकृत नहीं होगा और मैं बस से ही यात्रा किया करूँ। मैंने कहा मेरे लिए यह संभव नहीं है।

        20इसके अलावा भी काफी ऐसे बातें हैं जो मेरे से कानपुर के प्रबंधक लोग कर रहे थे वह न तो उनके स्तर की थीं और न ही मेरे से की जाने चाहिए थीं मगर मैंने सोचा की हो सकता है अब यही सब यह लोग करते हैं और नया कारपोरेट पैटर्न यही हो मैं  चुप-चाप सुनने के अलावा कर भी क्या सकता था।

        21- फर्रुखाबाद  दफ्तर में मेरे आने से छह माह पहले से चोरी की बिजली चल रही थी मैंने जब बिल के बारे में पता किया तो यह बात पता लगी। तब मैंने खुद ही पाशा और कौशिक से कह कर बिजली का मीटर लगवाने को बोला। मगर इन दोनों ने कहा कि कुछ नहीं होता है। मैं चिंता न करूँ और साथ में यह भी की पाशा के शाहजहांपुर में हिन्दुस्तान में काम करने के दौरान एक बार ऐसे ही बिजली चोरी की रिपोर्ट हो गयी थी। तब मैंने इनके ही साथी कौशिक को यह जिम्मेदारी दी आप दो-तीन दिन में कैसे भी मीटर लगवाएं।आखिर मीटर लगा। अब मैंने कानपुर सतीश द्वेदी से पूछा की मीटर का सीलिंग सर्टिफिकेट कानपुर  जाएगा  या फर्रुखाबाद  रहेगा। आपको भी आश्चर्य होगा कि सुबह को मैंने इस बारे में पूछा था और शाम को मुझे एक फैक्स मिला कि फर्रुखाबाद कार्यालय में छह माह से बिजली  मीटर नहीं लगा है। यह घोर लापरवाही है और ब्युरॊ चीफ के नाते मेरी यह जिम्मेद्दारी है कि दफ्तर में मीटर लगे और यह भी दफ्तर में सारे लोग रजिस्टर पर अपने दस्तखत करें ——इसका क्या आशय हो सकता है यह मैं अभी तक नहीं समझ पाया।

        22-आपको  यह भी बताना चाहता हूँ की मेरे कहने या संस्तुति पर न तो कोई बिल ही पास किया गया और ना ही किसी को मानदेय दिया गया।जबकि मैं दावे से यह बताना चाहता हूँ की मेरी वजह से फर्रुखाबाद का प्रसार करीब आठ सौ कापी बढा और अब फिर से कम हो गया है।विज्ञापन भी बढ़ा।

        23- जहां वैभव जी जो गाली की बात कर रहे हैं, वह मैंने उनको दी नहीं और उनके पूछने पर ही पाशा  के द्वारा कही गयी बात बतायी। मैंने सिर्फ उनसे यही पूछा था की पाशा की नियुक्ति हो जाने से मेरी बर्खास्तगी कैसे हो रही है?इस तरह की बातें मेरे से दस दिन पहले से की जा रही थीं और दफ्तर के लोगों को फोन करके कानपुर से ही किसी ने बतायीं। तब मेरे से जे पी त्रिपाठी ने ही कहा था की मैं  आपसे बात करूँ।मगर मैन सोचा की आपको काहे परेशान करूँ, आखिर ऐसे कैसे यह लोग मुझे हटा देंगे। जबकि फरवरी में जब पाशा और इनके दो साथी जानबूझकर काम छोड़कर गए तब 15 दिन बाद वैभव जी ने ही मुझे खुद फोन करके कहा था कि उन्होंने पाशा से इस्तीफ़ा मांग लिया है।

        24- आपको यह भी  बताना है एक दो लोगों को छोड़कर मेरे से किसी ने भी कभी शालीनता से बात नहीं की मैं  सब सहता रहा। मगर इस कदर परेशान था कि आखिर यह अमानवीयता  मेरे साथ क्यूँ हो रही है?यहाँ तक कि  कोई टेबिल दफ्तर में पड़ी थी ,पहले से ही एक बार सतीश द्वेदी आये बोले यह टेबिल  आपने क्यूँ हटा ली?आप तो मनमानी कर रहे हैं। मैंने कहा यह पहले से  ही पड़ी है, तब उन्होंने दफ्तर के एक दो की नहीं, चार लोगों से पूछा ! क्या यह मेरे लिए उचित था? इसके जरिये वह आफिस के लोगों को की सन्देश दे रहे थे?

        कुल मिलाकर आपको सिर्फ यह बताना कि  है शुरू से ही मेरे खिलाफ एक मुहिम चल रही थी, इसको कौन चला रहा था और क्यूँ चला रहा था? मैं नहीं जानता !!!!!!!!!!!!!!!    मगर मेरा सोचना यही है कि ब्रूटा के यहाँ आपके द्वारा दोबारा भेजने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया और ब्रूटा को पास करने के लिए मुझे फेल  करना जरुरी था !!  इस व्यक्ति की पहचान आप को स्वयं करनी होगी ! मेरा यह  आशय नहीं है कि मेरी नौकरी के लिए आप यह पता करें बल्कि यह एक व्यवस्था का सवाल है ….क्या वही व्यक्ति काम करेगा जिसको कुछ लोग चाहेंगे ? अगर वोह लोग नहीं चाहेंगे तो क्या यह लोग कुछ लोगों को अराजक बनाकर संस्थान को मज़ाक बना देंगे ? इनको वहो लोग पसंद हैं जो किसी भी रूप में आपसे संपर्क नहीं रख सकते!!!!!!!

        वरना क्या वजह हो सकती है की मेर से नीचे और ऊपर के लोग मेरे साथ कभी भी मानवीय शालीनता से पेश नहीं आये। यहाँ तक कि नए नए आये अनुज शर्मा  हमेशा इस कदर बदतमीजी से बात करते कि बस मैं अन्दर ही अन्दर कुढ़ कर रह जाता। यही हाल कौशल किशोर का था जो मेरे लिए आश्चर्यजनक था !

        क्या इन लोगों को इस बात का  था भरोसा था की मेरा कार्यकाल ज्यादा नहीं है ? या फिर इनको किसी के द्वारा यह टास्क दिया गया था की मुझे परेशान किया जाए !

        ———–उपरोक्त कथन मैंने जो कुछ भी कहा है उसके सबके प्रमाण मेरे पास हैं और एक बात विशेष रूप से आपको बतानी है :–
         
        जनवरी 2012 में दफ्तर में काम करने वाले विष्णु  दिक्षित और धीरज अग्निहोत्री ने अपनी सेलरी बढवाने के लिए पहले ही जुयाल से अनुरोध किया था। इन लोगों फिर मेरे से कहा। मैंने जुयाल जी को बता दिया। फिर मई माह में सतीश जी का मेल आया कि इन दोनों को कन्फर्म किया जाना है। इनके कागज भेजें जाएँ।
        मैंने दोनों से बात की तो पता लगा कि धीरज केवल आठवां पास है। मैंने सतीश जी को बता दिया कि धीरज चाहते हैं कि उनका सिर्फ वेतन बढ़ा दिया जाए। फिर सतीश जी ने खुद धीरज को फोन किया और कहा  कि अग्रवाल जी नहीं चाते हैं कि उसको कन्फर्म किया जाए और वह जैसे भी हो अपने कागज भेजे
           यह बात जब धीरज ने मुझे बतायी तो मैंने यही कहा कि तुम गलत काम मत करना। इसके बाद सतीश द्वेदी लगातार धीरज को फोन करके कागज मांगते रहे। धीरज ने कई बार उनका फोन नहीं उठाया।बाद में उनकी धीरज से बात हुई और उन्होंने उससे कागज मंगवा लिए और कन्फर्म भी कर दिया।मेरे फर्रुखाबाद से आने के बाद धीरज को बर्खास्त कर दिया गया और उससे कहा गया की तुम यदि यह लिखकर दे दो की मैंने  उससे  फर्जी कागज लगवाए तो, तुमको बचाया जा सकता है। यह बात मैंने वैभव जी को बतायी। तब उन्होंने धीरज को नोयडा बुलाकर बात की और उनको सब लिखकर दे दिया। सतीश द्वेदी और भूपेंद्र दुबे ने उस पर यह दबाव भी डाला कि वह मेरे पर आरोप लगा दे !!!!
        आखिर यह सब क्यूँ और किस लिए किया जा रहा  था ?मुझे हटाया जाना था तो वैसे ही कह दिया जाता ?मुझे आरोपित करने की क्या ज़रूररत थी?
        इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि मेरे कार्यकाल में संवाददाताओं के बिल तक नहीं पास किया गए इसलिए की संवाददाता काम न करें काम ख़राब हो या फिर वह लोग नाराज़ हों!
        ——-जुयाल जी के नॉएडा तबादले के बाद मुझे सतीश द्वेदी भूपेंद्र दुबे कौशल ने खुद फोन करके बताया की मेरी वजह से अन्हे हटाया गया है!मैंने कहा यह तो मेरे  खिलाफ साजिश है तो चुप हो गए !मेरा मतलब यह बताने का है कि कोई भी सीधी बात तो करता ही नहीं था। बस हर समय कोई न कोई नई शरारत! यहा तक कि दफ्तर का नया stablizer खराब  होने पर कानपुर जाना था टैक्सी वाला लेकर नहीं गया  तो सतीश द्वेदी ने भवानी जी को मेल  भेजा — आशीष अग्रवाल ने stablizer नहीं भेजा !

        इस कदर विरोधी माहौल और जब मैं देख रहा हूँ कि कोई भी किसी बात को न तो सही कहने को तैयार है  और न ही खुद देखने को, बस सबका मकसद मुझे घेरने का है तब जब कुछ बातें मैंने आपको बतायीं तो यह कहने लगे कि वह सीधी राजुल जी से बात करते हैं —आखिर मैं क्या करता ?तब भी मैंने आपको  सारी बातें नहीं बतायीं –अब बता रहा हूँ!

        आपको बता दूँ कि  मैंने दफ्तर की बिजली फ़ोन  नेट की व्यवस्था सही कराई कंप्यूटर सही कराये अखबार ने एक नई पहचान बनायी यह मेरे अथक परिश्रम का ही नतीज़ा था। इसके लिए मैं दफ्तर के नीचे ही गाडी में दोपहर में कुछ देर आराम करता था होटल का खाना खाता था। दफ्तर के लोग जो सक्रिय थे वह तक बिजली  और फोन के मामलों में जरा भी रूचि लेना तो दूर, झूट कह दिया करते थे कंप्लेंट  कर दी है !आखिर इन लोगों की ऐसी हिम्मत  कैसे हो सकती थी?

         मुझे आपने पुरे सम्मान के साथ फिर रखा इसके लिए आपका आभारी हूँ —मगर आपको मेरी भी बात पूरी सुननी और समझनी पड़ेगी,मेरा दोष भी मुझे बताएं ——-आप सर्वोच्च न्यायकर्ता  की भूमिका में हैं, मुझे अपनी बात कहने का तो अवसर है।

        मैंने आठ माह में सिर्फ काम किया है। नोयडा से आने के बाद मुझे गहरा सदमा लगा। मुझे भरोसा था की आप मेरे मामले में आप सज़ा देने से पहले मुझे तो मेरे गुनाह बताएँगे! 17 अगस्त को ही वैभव जी ने ने मुझे बड़े मजाकिया अंदाज़ में कहा कि जाओ-जाओ राजुल जी से मिलोगे? मैंने कहा आप कहते हैं तो मिलूँगा और मैंने कोई ऐसा गुनाह तो किया नहीं है –तो उन्होंने कहा रुको और खुद अपनी सीट से उठकर गए और वापस आकर बोले की आप गुस्से में बैठे हैं, इस वजह से वह -वैभव जी उनसे नहीं पूछ सके . मैंने उसी समय उनसे कहा था कि पाशा की बात मैंने आपको बतायी थी और यही पुछा था की पाशा की नियुक्ति का मतलब मुझे हटाया जाना है? उन्होंने कहा कि नहीं।और फिर दो दिन बाद ही मुझे हटाने का आदेश ! इसका मतलब तो जो बात मैं दस दिन से सुन रहा था वह सही थी?

मैंने अपनी बात इस अपेक्षा के साथ आपके समक्ष रख है कि न्याय करेंगे। बाकी तो मेरा पूरा जीवन आपके प्रति गुनाह करते ही ही बीता है। मगर अब मैं आपसे सिर्फ न्याय की अपेक्षा करता हूँ।

सादर
आशीष अग्रवाल

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...