Sandeip Agrawal : मुजफ्फरनगर दंगों में आज तक के स्टिंग उबरने के संदर्भ में, मैं अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत का एक अनुभव साझा करना चाहूंगा…हम एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक के लिए दिल्ली के इलाकों में 'आपके विधायक आपकी नजर' श्रंखला के लिए काम कर रहे थे. इसमें हर विधानसभा क्षेत्र की जनता से बात और फिर उनकी कही बातों पर विधायक की प्रतिक्रिया को शामिल करना था.
एक विधायक जो उस समय देश के प्रमुख राष्ट्रीय दलों में से एक के प्रदेश उपाध्यक्ष थे, पर इलाके के लोगों ने 30-30 रुपए लेकर अवैध झुग्गियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था. पत्रकारिता के उस समय बहुत बड़ी ताकत होने की गलतफहमी और तरुणाई का जोश, पूछ बैठा सीधे-सीधे कि आपके बारे में लोग कहते हैं कि आप सब झुग्गियों वालों से 30-30 रुपए वसूलते हैं. तो उन्होंने बहुत सहजता से कहा कि देखो बेटा, ये बात तुम अखबार में मत छापना. लेकिन, सही बात तो यह है कि मैं कोई साधु नहीं हूं, और राजनीति साधुओं के लिए है भी नहीं… जिन 30 रुपए की तुम बात कर रहे हो, उनमें से 24 रुपए पार्टी फंड में चले जाते हैं, एक रुपया वो पैसा उगाकर लाने वाले आदमी ले लेते हैं और चार रुपया मुझे बचता है.
इसके बाद 1984 के सिख विरोधी दंगों के बारे में बोलते हुए भी उन्होंने ऑफ द रिकॉर्ड की शर्त पर अपने ही दल के तत्कालीन अध्यक्ष के बारे में बताया कि वे हमलावरों को उकसाने वालों में सबसे आगे थे…मैं चाहता तो इन दोनों बातों को अपने साक्षात्कार में डालकर दे सकता था, लेकिन उनका विश्वास तोड़ने की कतई इच्छा नहीं हुई. और तो और, जब मैंने उनकी बातें अपने गुरु और नवभारत टाइम्स के तत्कालीन कार्यकारी संपादक श्री अच्युतानंद मिश्र से बताईं तो उन्होंने भी मुझे यही कहा कि इन बातों को कॉलम में न लिखने का आपका फैसला एकदम सही है.
अगर मैं आज किसी अखबार या चैनल के संपादक के पास यह सब अनुभव लेकर जाऊं तो क्या उससे इतनी सौम्यता प्रदर्शित करने की उम्मीद की जा सकती है ? वह मुझे एक ही सूरत में इसे न लिखने की सलाह दे सकता है, जब उसके या संबंधित प्रतिष्ठान के मालिकों के हितों को इससे नुकसान पहुंच रहा हो. हो सकता है कि मेरे हमपेशाओं की मौजूदा पीढ़ी मुझे बेवकूफ करार दे, लेकिन मुझे आज भी अपने उस फैसले की खुशी है.
पत्रकार संदीप अग्रवाल के फेसबुक वॉल से.





