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चैनलों के ‘जनतंत्र’ में दलितों के लिए जगह नहीं है

एक ऐसे दौर में जब कई न्यूज चैनल देश की ‘अंतरात्मा की आवाज़’ होने का दावा कर रहे हैं, स्टूडियो में रोजाना प्राइम टाइम अदालतें लगा रहे हैं, देश की स्वयंभू आवाज़ बनकर जोरशोर से सवाल पूछ रहे हैं, भ्रष्टाचार से लेकर बलात्कार तक के खिलाफ लड़ाई में खुद को सबसे बड़े धर्मयोद्धा घोषित कर चुके हैं, उस समय यह जानते हुए भी कि वे खुद से सवाल पूछा जाना पसंद नहीं करते हैं और अपने को हर सवाल से ऊपर मानते हैं, उनसे भी सवाल पूछने और कटघरे में खड़े करने का समय आ गया है.

एक ऐसे दौर में जब कई न्यूज चैनल देश की ‘अंतरात्मा की आवाज़’ होने का दावा कर रहे हैं, स्टूडियो में रोजाना प्राइम टाइम अदालतें लगा रहे हैं, देश की स्वयंभू आवाज़ बनकर जोरशोर से सवाल पूछ रहे हैं, भ्रष्टाचार से लेकर बलात्कार तक के खिलाफ लड़ाई में खुद को सबसे बड़े धर्मयोद्धा घोषित कर चुके हैं, उस समय यह जानते हुए भी कि वे खुद से सवाल पूछा जाना पसंद नहीं करते हैं और अपने को हर सवाल से ऊपर मानते हैं, उनसे भी सवाल पूछने और कटघरे में खड़े करने का समय आ गया है.

सवाल बहुत सीधा सा है. वह यह कि चैनलों के ‘जनतंत्र’ में समाज के हाशिए पर पड़े दलित समुदाय के लिए कितनी जगह है? हालाँकि यह सवाल नया नहीं है लेकिन कई कारणों से एक बार फिर मौजूं हो गया है. सबसे ताजा कारण यह है कि वर्ष १९९७ में बिहार के लक्ष्मणपुर-बाथे गांव में ५८ निर्दोष दलित महिलाओं, बच्चों और पुरुषों के नृशंस नरसंहार के मामले में कोई तेरह साल बाद निचली अदालत से फांसी और आजीवन कारावास की सजा पाए सभी अभियुक्तों को पटना हाई कोर्ट ने हाल ही में संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया है.

इस फैसले के बाद से चैनलों की ‘अंतरात्मा की आवाज़’ को जैसे सांप सूंघ गया है. वैसे चैनलों के कोलाहल भरे ‘जनतंत्र’ में सचिन की रिटायमेंट से लेकर एक स्वयंभू स्वामी के सपने के आधार पर उन्नाव के एक गांव में हजार टन सोने की खोज और नरेन्द्र मोदी की रैलियों से लेकर राहुल गाँधी के भाषणों पर उत्तेजना भरी बहसें बदस्तूर जारी हैं लेकिन ५८ दलितों के नरसंहार के मामले में किसी को भी सजा न मिलने और सभी आरोपियों के बरी होने पर एक षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी को साफ़ सुना जा सकता है.

चैनलों की यह चुप्पी चौंकानेवाली है क्योंकि जेसिका लाल से लेकर प्रियदर्शिनी मट्टू की हत्या के मामलों में अदालतों ने जब अभियुक्तों को बरी कर दिया था, इन्हीं चैनलों ने और सही ही सिर आसमान पर उठा लिया था. इन मामलों में चैनलों ‘अंतरात्मा’ जितनी तेजी से जगी और सक्रिय हुई, उसके कारण ‘देश की अंतरात्मा’ भी हिल उठी. उसके कारण इन मामलों में केस फिर से खुला, दोबारा जांच हुई, सबूत इकठ्ठा किये गए, पुख्ता गवाह पेश किये गए और नतीजा, हाई प्रोफाइल अभियुक्तों को सजा भी हुई.

इसी तरह पिछले साल १६ दिसम्बर को दिल्ली में निर्भया के साथ हुए नृशंस बलात्कार मामले में भी चैनलों और समूचे न्यूज मीडिया की सक्रियता और छात्र-युवाओं-महिलाओं के आंदोलनों के कारण संसद को न सिर्फ महिलाओं के खिलाफ होनेवाली यौन हिंसा पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून बनाने पर मजबूर होना पड़ा बल्कि बलात्कार के दोषियों को विशेष अदालत ने रिकार्ड समय में फांसी की सजा भी सुना दी.  लेकिन लगता है कि लक्ष्मणपुर-बाथे में १६ साल पहले मारी गईं ५८ दलित महिलाएं-बच्चे और पुरुषों की कराह और आंसू न्यूज चैनलों की ‘अंतरात्मा’ को झकझोरने के लिए काफी नहीं थे. ऐसा लगता है कि इस मामले में चैनलों की ‘अंतरात्मा’ सो गई है या उसे लकवा मार गया है.

संभव है कि कई चैनलों को इस फैसले की ‘खबर’ तक नहीं हो क्योंकि उन चैनलों पर इस फैसले की खबर तक नहीं चली है. यह भी हो सकता है कि हाई कोर्ट का यह फैसला कई चैनलों की ‘समाचार’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता हो. इसमें तो कोई दो-राय नहीं है कि किसी न्यूज चैनल के स्टार एंकर/संपादक को यह इतनी बड़ी खबर या मुद्दा नहीं लगा कि वे इस फैसले को प्राइम टाइम चर्चा के लायक समझते और देश की अंतरात्मा से सवाल पूछते. 

चैनलों पर प्राइम टाइम बहस के मुद्दे

ऐसा नहीं है कि इस दौरान कोई इतनी बड़ी ‘खबर’ आ गई कि यह खबर पीछे छूट गई या उसे प्राइम टाइम चर्चा के लायक नहीं माना गया. लक्ष्मणपुर-बाथे मामले में पटना हाई कोर्ट का फैसला ९ अक्टूबर को आया और अगले एक सप्ताह तक चैनलों पर बाथे के मुद्दे को छोड़कर अनेकों मुद्दों पर चर्चा और गरमागरम बहस हुई.

यही नहीं, इसी दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने देश में दलितों की बदहाल स्थिति का उल्लेख करते हुए स्वीकार किया कि उनकी स्थिति बेहतर करने के लिए उन्हें वृहस्पति की गति से आगे बढ़ना पड़ेगा. कुछ चैनलों में इस मुद्दे पर चर्चा हुई लेकिन लक्ष्मणपुर-बाथे को उल्लेख के लायक भी नहीं माना गया.

इस दौरान (९-१५ अक्टूबर) अगर कुछ प्रमुख चैनलों पर हुई प्राइम टाइम बहसों के विषयों पर गौर करें तो यह साफ़ हो जाता है कि चैनलों के ‘जनतंत्र’ में दलितों के लिए हाशिए की जगह भी नहीं है.

एन.डी.टी.वी-इंडिया के प्राइम टाइम में ९ अक्टूबर से १५ अक्टूबर के बीच हुई बहसों के मुद्दे

९ अक्टूबर- क्या राहुल राज की तैयारी में है कांग्रेस (एंकर: सिक्ता देव)
११ अक्टूबर- राजा भैया क्यों है जरूरी (एंकर: सिक्ता देव)
१२-१३ अक्टूबर- शनिवार और रविवार को प्राइम टाइम चर्चा नहीं होती है
१४ अक्टूबर- अगला चुनाव: कांग्रेस बनाम आर.एस.एस (एंकर: रवीश कुमार)
१५ अक्टूबर- मुस्लिमों को मोदी का डर दिखा रही है कांग्रेस? (एंकर: रवीश कुमार)

‘आई.बी.एन-७’ पर आशुतोष के कार्यक्रम ‘एजेंडा’ (रात ८ से ९ बजे) में ९ अक्टूबर से १५ अक्टूबर तक निम्नलिखत विषयों पर चर्चा हुई:

९ अक्टूबर- क्या सत्ता संभालने के लिए तैयार हो गए हैं राहुल गाँधी?
१० अक्टूबर- क्या सचिन ने सही वक्त पर सन्यास का एलान किया है?
११ से १३ अक्टूबर: शुक्रवार से रविवार तक ‘एजेंडा’ कार्यक्रम नहीं आता है
१४ अक्टूबर- भगदड़ को प्रशासन क्यों नहीं रोक पाता? (मध्यप्रदेश के दतिया जिले में रतनगढ़ मंदिर में हुई दुर्घटना पर)
१५ अक्टूबर- प्रियंका की एंट्री पर क्यों हिचकती है कांग्रेस?

‘आज तक’ पर पुण्य प्रसून वाजपेयी के कार्यक्रम ‘१० तक’ (रात १० से १०.३० बजे तक; सोमवार से शनिवार) में इन विषयों पर चर्चा हुई:
१० अक्टूबर- चुनावी शंखनाद और गाँधी मैदान को लेकर क्यों घबराए नीतिश
११ अक्टूबर- चुनावी वायदे पूरी नहीं कर पाई यू.पी सरकार और राहुल ने दिखाया ३६० का सपना
१२ अक्टूबर- तेरे बिन सचिन
१४ अक्टूबर- बदलते रहे पी.एम लेकिन आज भी खड़े हैं अजेय अमिताभ और सचिन
१५ अक्टूबर- कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की पुकार, फूलपुर से चुनाव लडें प्रियंका

इसी तरह ‘टाइम्स नाउ’ में हमेशा गरजनेवाले और देश की ओर से नियुक्त आम आदमी के वकील अर्नब गोस्वामी ने अनेकों मुद्दों पर बात की लेकिन लक्ष्मणपुर बाथे को उन्होंने ‘देश की अंतरात्मा’ के अनुकूल नहीं पाया. ९ अक्टूबर से १५ अक्टूबर के बीच उनके दैनिक ‘न्यूजआवर’ (१.३० घंटे से २ घंटे के कार्यक्रम) में अनेकों मुद्दे उठाये गए:    
९ अक्टूबर- राहुल बनाम मोदी, माया बनाम मुलायम
१० अक्टूबर- सचिन के रिटायरमेंट
११ अक्टूबर- राजा भैया को मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने पर और चक्रवात पेलिन पर विशेष चर्चा
१२-१३ अक्टूबर को अवकाश   
१४ अक्टूबर- अमित शाह के बहाने मोदी पर निशाना और दूसरी चर्चा अयोध्या के बहाने राजनीति और बाबा रामदेव पर विशेष चर्चा
१५ अक्टूबर- मौलाना महमूद मदनी के बयान पर चर्चा और साइबरस्पेस पर वर्चस्व को लेकर चर्चा

कमोबेश सभी चैनलों का यही हाल था, जहाँ संकीर्ण राजनीतिक मुद्दों से लेकर हर तरह के सतही मुद्दों पर गर्मागर्म चर्चा और बहस हुई लेकिन लक्ष्मणपुर-बाथे का मुद्दा चैनलों के लिए ‘अस्पृश्य’ बना रहा.

लेकिन जैसे पटना हाई कोर्ट का दलितों के नरसंहार के मामलों में आरोपियों को बरी करने का ताजा फैसला, पहला फैसला नहीं है, वैसे ही न्यूज चैनलों की ‘अंतरात्मा’ भी पहली बार सोती हुई नहीं दिखी है.

…जारी…

लेखक आनंद प्रधान जाने-माने पत्रकार, विश्लेषक, शिक्षक और एक्टिविस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग तीसरा रास्ता से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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