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अजीत अंजुम को कांग्रेस वाले चंचल ने दिया जवाब

Chanchal Bhu : भाई अजित अंजुम के लिए -बहस का मुद्दा -एक- महगाई. बुलाइए सभी दलों को. पूछिए कहां है महंगाई? किन किन पदार्थों के दाम बढे हैं?
एक रटा रटाया जवाब आएगा -दाल, मूली , आलू , प्याज .पेट्रोल.
और ?
बस.
बस क्यों?

Chanchal Bhu : भाई अजित अंजुम के लिए -बहस का मुद्दा -एक- महगाई. बुलाइए सभी दलों को. पूछिए कहां है महंगाई? किन किन पदार्थों के दाम बढे हैं?
एक रटा रटाया जवाब आएगा -दाल, मूली , आलू , प्याज .पेट्रोल.
और ?
बस.
बस क्यों?

चिप्स, कुरकुरे, पानी, पेय पदार्थ, दवा, किताब कापी, बिस्कुट, क्रीम पावडर, वो झागवाला ..जूता .कपड़ा …? इनके दाम? एंकर यह सवाल नहीं पूछेगा क्योंकि परदे के पीछे बैठा उसका मालिक परेशान होगा. तनखाह कहाँ से लाएगा? (जिंदल जब तक विज्ञापन देता रहे उसे बचाते रहो )

बुरा मत मनाइएगा. यह व्यक्तिगत मुद्दा नहीं है, यह हमारी दिक्कत नहीं है. आप ही लोगों की है. किस तरह दिल मसोस कर आप लोग काम करते हैं हमें मालूम है. आपका कहना सही है कि 'नेता' (कमबख्त ये कम अक्ल जोग हैं जो सियासत को घसीट कर बूचड़खाने तक पहुंचा आये हैं) अल्प ज्ञानी है. वरना इस मुद्दे पर अच्छी बहस चलती. नेता आधा सच बोल रहा है. आरती मेहरा बैगन दिखा रही हैं, गोयल मूली पकडे खड़े हैं. (देखें भाजपा का महंगाई विरोधी प्रदर्शन -द हिन्दू में छपी तस्वीर ) महिलाए आगे हैं उनके झोले में 'बिसलरी' है, चिप्स है.
जिन उत्पादकों को महंगा बोला जा रहा है सब किसान के खलिहान के हैं. खलिहान महंगा दिख रहा है कारखाना नहीं. उसी आलू से चिप्स बनता है तीन सौ से भी अधिक कीमत है एक किलो चिप्स की.
मजे की बात देखिये डिब्बे का कमाल. उसका अंतर्विरोध. एंकर चीखा- महंगाई की मार से जनता त्रस्त है सरकार के पास कोई जवाब नहीं है आज जंतरमंतर पर क्या हुआ देखिये… और जनता देखने लगी… एंकर जंतर मंतर से चीख रहा है- यह गरीबी और ऊपर से महंगाई की मार (कमबख्त यह तो देख लेते कि कैमरा क्या दिखा रहा है, अच्छी खाती पीते घर की हट्टी कट्टी महिलाएं अपने अपने सब्जी दिखा कर चीख रही हैं और तुम गरीबी बोल रहे हो) अब हम यहाँ लेते हैं एक ब्रेक कही मत जाइए अभी हम फिर आते हैं इसी महगाई पर. कट. विज्ञापन लगा रानी मुखर्जी कुरकुरे खाती हुई. खां साहेब आये क्रीम लगाए. एक हफ्ते में गोरा होने का अचूक नुस्खा …
कब तक यह डिब्बा बेवकूफ बनाएगा भाई? कारखाना विज्ञापन देगा. किसान कहाँ से दे? उसे घसीटोगे.
नीति पर बहस को ले जाइए 'दाम बांधो' 'खलिहान और कारखाने का रिश्ता तय करो' 'औद्योगिक नीति पर बात करो'. बहस को डगर पर ले जाओ. उसे खोज कर जनता देखेगी.

उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट यूं हैं…

Atal Behari Sharma चंचल भाई, आप भी न बस… आप तो लकुटिया हाथ ले लिए हो बकिया लोगों को तो रोजी रोटी, कार बंगला, मोटा बैंक बैलेंस बढ़ाने दो …
 
Ajit Anjum चंचल जी, आपका गुस्सा बहुत वाजिब है लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, लूट, भ्रष्टाचार, घोटालों के लिए मौनमोहन सरकार कितनी जिम्मेदार है …इस पर भी इसी तल्खी के साथ लिखें तो लगेगा कि राय एक तरफा नहीं है …
 
Atal Behari Sharma अजित भाई, चंचल जी भी न सबके हाथ में लकुटिया थमाना चाहते हैं ……..इन्हें मीडिया में काम करने वालों की मजबूरिया मालूम नहीं है ….या फिर जान बुझ कर जानना नहीं चाहते

Chanchal Bhu अजित भाई, न तो मैं गुस्सा हूँ न ही किसी की तरफदारी कर रहा हूँ. कांग्रेस पर लगे आरोपों को अगर प्रतिपक्ष ने कारगर ढंग से उठाया होता तो बेहतर होता. उन्होंने संसद को जाम किया. यह तरीका नहीं था. अब बचता है 'चौथा स्तंभ' मीडिया. सच बात तो ये है कि अगर मीडिया अकेले ही इन मुद्दों पर गंभीर रहती तो शायद हम इतना नीची न गिरते. हमारी दिक्कत हर तरफ फंसी है. आपने बहुत अच्छा किया एक कारगर बहस उठाया. बधाई आपको.

महेश तिवारी media ko janata nahi chunati lekin sarkar ko toh janata ne hi chuna aur agar desh me badhi mehgain ko sarkar controll nahi kar sakti toh uska kya ochitya raha sirji , hum aur aap sab isase pareshan hai aaj jo banda 150 dihadi kama rah hai woh kaise 5 se 6 jano ka pariwar pal payega jab 100 kilo pyaz aur 30 rs aalu mil raha ho baaki sabjiya toh swapan me hi dikhati hai , sarkar nahi toh kaun jimmewar hai uske liye , janata jisne usko chuna ?
 
महेश तिवारी desh ka durbhagya hai ki desh ko naa ek imaandar sarkar mili aur nahi ek imaandar vipaksh , saalo se janata football ban ke gaol pe goal khaa rahi hai.
 
Ashok Kumar Ram लोग कह रहे हैं कि रिक्सा का किराया बढ़ गया है। इसलिए हवाई सफ़र करे। सबसे ज्यादे प्याज और टमाटर को महंगा कहने वाले लोग अच्छी किस्म और महंगे टमाटर के पास भीड़ लगते हैं।

Ashit Chakravarti Chanchalji chaliye Karkane mey ban nay wali aapke saman ka dam uutna nahi mangha hua

Mahavir Pandey Bahut khub Chanchal ki
 
Anwaar Ahmad Shaikh excellent,……………….

Motilal Gupta यानि न महंगाई है न उससे परेशानी …बहुत खूब। सुनकर सकून मिला, पेट को न सही दिल को तो मिला..।
 


Chanchal Bhu : अजित अंजुम हमारे दोस्त हैं, 24कैरेट के. वे जितना अच्छा बोलते हैं उतना ही अच्छा लिखते रहे हैं. विशेष कर सामाजिक सरोकार पर. आज उन्होंने फेसबुक पर ताबड़तोड़ तीन पोस्ट दिया. एक सामान्य है, बाकी दो बहस की मांग करते हैं. पहली पोस्ट में उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने फैसला लिया है कि वह किसी भी 'डीवेट' (?) में भाग नहीं लेगी. हमें यह नहीं मालूम कि कांग्रेस ने यह फैसला किया है, अगर उसने यह फैसला लिया तो देर से लिया, उसे पहले ही ले लेना चाहिए था. क्यों? इसे गौर से देखें. क्या यह वाकई डिवेट है? और अगर है तो उसके विषय क्या रहे हैं? कोई भी 'डिब्बा' यह बता दे कि व्यक्तिगत आलोचना, आरोप-प्रत्यारोप, गाली गलौज तक जिन डिवेट में शामिल हों उससे अच्छा है सड़क पर खड़े होकर उन गाड़ियों को गिना जाय जो 'बेचारे' महंगी पेट्रोल के चलते फर्राटे से भाग रही हैं. परदे पर दिखने के लिए लार टपकाते नेता कैमरा के सामने जाने के पहले होम वर्क नहीं करता, मुलेठी डाल कर गला साफ़ करता है. ऐसे डिवेट की काल गणना कर के देखिये तो मजेदार तथ्य उभरेंगे. सबसे ज्या टाइम एंकर के हिस्से में जाता है. वह भी चुप कराने में. 'आग लगा के धीया दूर खड़ी' के तर्ज पर.

दूसरा हिस्सा देखिये – खबर पढ़ने का तरीका , ..' उसकी बात से तिलमिलाई कांग्रेस ने कहा' 'कांग्रेस के पास इसका कोइ जवाब नहीं है' वगैरह वगैरह. पत्रकारिता की भाषा में 'साइलेंट मैसेज' होता है. यह पत्रकार का एक अलग का 'हथियार ' होता है और वह उसे चुपके से और शालीन भाषा में कह जाता है, लेकिन कपड़े के बाहर जाकर 'पार्टी' नहीं बनता. पत्रकारिता का 'एथिक' है तीन बातों से पत्रकार को बचना चाहिए- 'प्रिडिक्शन, पब्लिसिटी और पार्टी'. आज इन तीनों के बरक्स जाकर डिब्बा पत्रकारिता की …. (इसे हम आप मिल कर पूरा कर लेंगे)

दूसरा आपने कहा कि जिन चार राज्यों में चुनाव होने जा रहा है कांग्रेस 'साफ़' है. तो आ कौन रहा है? जिनके आने की बात हो रही है उनके घर में क्या हो रहा है? दफ्तर तोड़े जा रहे हैं, बगावत सबसे ज्यादा वहीं है. इसे डिब्बा भले ही न देखे लेकिन प्रिंट मीडिया तो देख रही है.

अजित भाई ! शुक्र है इन बैस्कोपिक डिब्बे के प्रेक्षक पूरी आबादी के दशमलव शून्य शून्य तीन फीसदी ही हैं. तुर्रा यह कि इसमें खबर और डिवेट शामिल नहीं हैं. इसमें एकता कपूर और सिद्दू की कामेडी है.

हम मार्कंडेय काटजू के बयान को तस्दीक करने के लिए मजबूर हैं.


उपरोक्त पोस्ट पर आईं कुछ टिप्पणियां यूं हैं…

Raj Kamal बड़े भाई आपकी बात से सहमत हूं। एक बार मेरे तत्कालीन संपादकजी ने चुनाव के वक्त चौपाल लगाने को कहा। चौपाल में वही नजारा बना जो सब्जी मंडी में होता है…मेरा माल अच्छा, मेरा भाव कम…। आखिर तक कोई जनसरोकार से जुड़े मुद्दे नहीं उठे और न उस पर मौजूद नेताओं की ठोस बात आयी। मैं संतुष्ट नहीं था लेकिन संपादकजी के लिए मैं कामयाब रहा।…और उन्होंने मेरी पीठ ठोकी…।
 
Sanjaya Kumar Singh सारी बात राजकमल जी ने कह दी। एक दफा मैं पिताजी के साथ टीवी देख रहा था और बताया कि देखिए एंकर क्या बेवकूफी के सवाल कर रहा है। इसका जवाब तो यही आएगा आदि। पिताजी ने कहा कि इसीलिए तो वो वहां है और तुम यहां। रखे रहो अपना ज्ञान।
 
Ashok Mandloi आपको तो बस अपनी अपनी पड़ी है उस अर्णव गोस्वामी का क्याहोगा,
 
Sandeep Verma अब तो कांग्रेस ने गरीब चैनेल वालो के पेट पर लात मार दी . बेचारे खबरे दिखाना तो पहले ही बंद कर चुके थे ,अब चर्चा भी बेमतलब करा दी .दर्शक भागेंगे तो विज्ञापन बंद. इस बार जब पत्रकारों की छटनी होगी तो इल्जाम कांग्रेस पर आएगा .
 
Rakesh Tewari सबसे ज्या टाइम एंकर के हिस्से में जाता है . वह भी चुप कराने में . 'आग लगा के धीया दूर खड़ी ' के तर्ज पर . Sateek teep.
 
Chandramauli Pandey अर्णव गोस्वामी को भारत मे कुल १लाख लोग देखते है,ऊ ससुरा को लगता है कि सारा संसार बस उसी को सुन रहा है,अच्छा बोलता भी वो इसी अन्दाज़ मे है,नही?
 
Ajit Anjum बड़े भाई , इस जमाने में तो सोना भी 24 कैरेट का नहीं रह गया है , लोग 20-22 कैरेट से काम चला रहे हैं लेकिन आपने मुझे 24 कैरेट का कह दिया ….मैं खुद ही कबूल नहीं करता इस कंप्लीमेंट को …फिर भी आप बड़े भाई हैं . शुक्रिया आपका…..आपकी बातों से बहुत हद तक सहमत हूं …मैं तो सिर्फ ये कह रहा हूं कि कांग्रेस ने ये फैसला तभी क्यों किया , जब सर्वे या पोल उनके खिलाफ आ रहे हैं ….बाकी तो फैसला कांग्रेस का है , चाहे जो करें …
 
Chanchal Bhu अजित भाई बहुत दिन बाद बतियायेंगे तो यही सब होगा न .

शिवानन्द द्विवेदी सहर Ajit Anjum जी. यह सर्वे का नहीं हार की हताशा है….और रही बात चंचल जी कि तो एकतरफा बहस कोई इनसे कर ले. बस बहस दोतरफा न हो इत्ती सी शर्त है.
 
Yogesh Garg लोग अब समझने लगे है की खबर के पीछे की खबर क्या है कि ये चैनल /अखबार ये खबर दे रहा है तो क्यों दे रहा है । यकीन मानिए मुख्य धारा के स्थापित मीडिया की फजीहत का दौर अब शुरू हो गया है। ख़बर और उसके विश्लेषण के लिए अब खबरिया चैनलो से ज्यादा सोशल मीडिया की और रुख किया जाने लगा है धंधे बाज पत्रकारो और उनके मालिको के लिए अभी थोड़ा वक्त है कि सुधार ले खुदको और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की विश्वसनीयता बचा ले नहीं तो जनता ने सूचना और संचार क्रांति के इस दौर मे मीडिया चैनलो /अखबरों के विकल्प अब खुद तलाश लिए है पर फिलहाल इनकी खबरों कि दुकाने चल रही है क्योकि अभी भारत के पढे लिखे युवा और महिलाये इसे सीखने के दौर मे है ।

Santosh Kumar Singh लेकिन संजय झा भाई बेइज़्ज़त हो कहे थे विश्वास के विश्वास से : अरणव मुस्कराहट से मस्त थे । देख के हसी आ गयी
 
Shivani Kulshrestha Sir jayadatar neta bolne se pahle home work nahi karte aap chahe kisi bhi party ko le lijiye..naitikta ko tak par rakhkar 3rd class bayaan dete hai
 
Satyendra Pratap Singh ल्यो! कांग्रेस हार भी गई, उसमे हताशा भी आ गई हार की अब तो मिस्टर प्रेजिडेंट को कहिये कि नरेन्द्र मोदी को पीएम की शपथ दिला दें और सभी कांग्रेस शासित राज्यो के मुख्यमन्त्रिओन ं को बर्खास्त कर प्रतीक्षारत लोगों को मुख्यमंत्री बना दें! चंचल जी कुछ करिए आप कांग्रेसी हैं। इस तरह से कांग्रेस कुर्सी की जमाखोरी नहीं कर सकती
 
Satyendra Pratap Singh एक स्थापित चैनल ने तो गजबे परम्परा स्थापित की है। कोई एक मुद्दा लेता है बहस के लिए। उसमे वो खुद एक पार्टी / पक्ष होता है। अपने पक्ष का चार मुंहनोचवा बैठाता है, एक विपक्ष वाला होता है। पांचो मिलकर उस एक को नोच डालते हैं। चैनल जीत जाता है! … दर्शक भी खुश, चैनल नम्बर वन! वो समूह खुलकर कहता है कि ठेले रिक्शेवाला मेरा आडियेंस नहीं है…

कांग्रेस नेता, थिएटर आर्टिस्ट, पत्रकार चंचल के फेसबुक वॉल से.

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