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जागरण जैसे सांप्रदायिक अखबार में नौकरी करने के बजाय पत्रकारिता से इस्तीफा देना ज्यादा मुनासिब समझूंगा

Wasim Akram Tyagi : जो लोग जागरण के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम को केवल मेरी मुहिम मान रहे हैं उन्हें समझाना जरा मुश्किल है, कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि जागरण ने मुझे नौकरी से निकाल दिया होगा, या मुझे नौकरी नहीं दी होगी इसलिये मैं उसके खिलाफ लिख रहा हूं तो उनकी जानकारी के लिये बता दूं कि मैं जागरण जैसे सांप्रदायिक अखबार में नौकरी करने के बजाय पत्रकारिता से इस्तीफा देना ज्यादा मुनासिब समझूंगा।

Wasim Akram Tyagi : जो लोग जागरण के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम को केवल मेरी मुहिम मान रहे हैं उन्हें समझाना जरा मुश्किल है, कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि जागरण ने मुझे नौकरी से निकाल दिया होगा, या मुझे नौकरी नहीं दी होगी इसलिये मैं उसके खिलाफ लिख रहा हूं तो उनकी जानकारी के लिये बता दूं कि मैं जागरण जैसे सांप्रदायिक अखबार में नौकरी करने के बजाय पत्रकारिता से इस्तीफा देना ज्यादा मुनासिब समझूंगा।

आप खुद सोच कर फैसला कीजिये जिस तरह खबरों को तथ्यों को तोड़ मरोड़कर जागरण प्रकाशित कर रहा है क्या वह पत्रकारिता के उसूलों के खिलाफ नहीं है? क्या चंद पैसों और ओहदों के लिये इंसानों का कत्ल करना जायज है? एक अकेला मुजफ्फरनगर ही नहीं बल्कि इसके अलावा भी शान्त से दिखने वाले माहौल में भी इस अखबार के द्नारा एक विशेष समुदाय के खिलाफ जहर उगला जाता है। बात आतंकवाद की हो या मंदिर मस्जिद की मगर जागरण रण भूमी की तैयारी में लगा रहता है और उन लोगों को एक विशेष समुदाय के खिलाफ भड़काता रहता है जो बिल्ली के रास्ता काटने भर से कोई अनहोनी घटना होने से डर जाते हैं। ऐसे मासूमों को राक्षस बनाने का जिम्मा जागरण ने उठाया है।

किश्तवाड़ में सांप्रदायिक दंगा हुआ तीन लोग मारे गऐ उनमें एक मुस्लिम और दो हिंदू थे। किसी भी तर्क से इस घटना को उचित नहीं माना जा सकता लेकिन उसके बरअक्स इस समाचार पत्र ने खबरों को ऐसे प्रकाशित किया मानो कश्मीर में हिंदुओं के लिये जमीन तंग हो गई है। यह वही सिद्धांत था जो आरएसएस का है जो आज भी मुसलमानों को विदेशी कहता है और उन्हें देश के लिये खतरा मानता है, खतरा सिर्फ इसलिये मानता है कि उनके रहते भारत को हिंदुराष्ट्र नहीं बनाया जा सकता जागरण के पन्ने इसी का रोना रोते हैं। जिसकी सड़ांध उसके स्तंभकारों, और संपादकीय लेखन मेँ झलकती है। (मौलाना खादिल मुजाहिद जिनको आर डी निमेष आयोग की रिपोर्ट बरी साबित करती है,) उनकी रहस्मय मौत पर हुऐ हंगांमे पर रिहाई मंच को इसने अपने संपादकीय में आडें हाथ लिया था। और साध्वी प्रज्ञा को एक नायिका की तरह, तोगड़िया, को योद्धा की तरह, प्रकाशित किया जाता है। जब सब नागरिक बराबर हैं जब सबके लिये मीडिया का एक धर्म निष्पक्षता लागू होता है तो फिर ऐसे भेद भाव क्यों, टोपी और तिलक में भेद क्यों, तोगड़िया और औवेसी में अंतर क्यों…

लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार हैं.


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