आज जब लोग पद्मभूषण या सरकारी सुविधाओं के लिए लाइन लगाये खड़े दिख जाते हैं निखिल चक्रवर्ती जैसे लोग याद आते हैं जिन्होंने मूल्यों की रक्षा के लिए इसे ठुकरा दिया था. निखिल चक्रवर्ती जिन्हें उनके चाहने वाले निखिल दा के नाम से पुकारते थे भारत में खोजी पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं. निखिल दा वही पत्रकार थे जिन्होंने सन् 1959 में मथाई ट्रस्ट घोटाले का पर्दाफाश कर नेहरू के आदर्शवादी सरकार की चूलें हिला दी थी. निखिल दा के इस खुलासे के बाद तत्कालीन वित्तमंत्री टी टी कृष्णमाचारी और नेहरू के निजी सचिव एम ओ मथाई को इस्तीफा देना पड़ा था. बीते 3 नवम्बर को निखिल चक्रवर्ती की सौंवी जयन्ती थी.
सन् 1944 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स वार से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत करने के बाद 1946-1948 तक पीपुल्स एज और क्रासवर्ड (1952-1955) में रहे. 1959 में पत्नी के कम्युनिस्ट पार्टी से लोकसभा सदस्य बनने के बाद वो दिल्ली आ गये और यहां पर कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'द न्यू एज' के सम्पादक बनाये गये. डेविड कोहेन के साथ दिल्ली में इंडियन प्रेस एजेंसी के नाम से समाचार एजेंसी की स्थापना की जिसमें बहुत से पत्रकारों को उन्होंने निखारा.
चीन के समर्थन के आरोपों से घिरी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य होने के बावजूद दादा ने अपने पत्रकारिता धर्म को सर्वोपरि रखा. 1962 में 'मेनस्ट्रीम' पत्रिका की शुरुआत की तथा पत्रिका के संस्थापक के कम्युनिस्ट रुझानों के बावजूद उन्होंने पत्रिका की निष्पक्षता और निर्भीकता को बनाये रखा. उन्होंने माओ की साम्यवादी नीतियों के विरोध में अपना विरोध व्यक्त किया. आपातकाल में जब इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी लागू की तब निखिल दा ने खुलकर विरोध किया जिसकी वजह से मेनस्ट्रीम को कुछ दिनों के लिए बंद भी करना पड़ा. कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा आपातकाल का समर्थन किये जाने के कारण उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफा से अपने सम्बन्ध तोड़ लिए लेकिन वामपंथ की विचारधारा में आजीवन अपना विश्वास बनाये रखा.
निखिल चक्रवर्ती सच्चे लोकतांत्रिक थे. 'मेनस्ट्रीम' पत्रिका में उन्होंने सभी को सम्पादकीय दायित्व दिया था. अगर किसी के लेख से वे सहमत नहीं होते थे तब भी उसमें काट-छांट के बजाय वे उसके प्रत्युत्तर में लेख लिखते थे. सभी तरह के विचारों को अपनी पत्रिका में स्थान देने के कारण ही निखिल चक्रवर्ती और मेनस्ट्रीम दोनों सभी को स्वीकार्य थे. उनकी स्वीकार्यता का आलम ये था कि जब आपातकाल के समय पीवी नरसिंहाराव ने जब अपनी ही पार्टी के विरोध में छद्म नाम से लेख लिखे तो इसके लिए उन्होंने मेनस्ट्रीम को चुना.
निखिल चक्रवर्ती ने 1989 में पद्मभूषण पुरस्कार लेने से इंकार करके पत्रकारिता के लिए एक बड़ा आदर्श प्रस्तुत किया था. तत्कालीन जनता मोर्चा की सरकार ने उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया तो उन्होंने ये कहते हुए पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया कि पत्रकार को अपने पत्रकारीय मूल्यों की रक्षा के लिए किसी भी पत्रकार को सरकारी या राजनीतिक संस्थाओं से दूर रहना चाहिए.
निखिल चक्रवर्ती खुद को हमेशा पत्रकार ही कहते रहे. 27 अगस्त 1998 को निखिल दा तब गुजर गये जब वो मेनस्ट्रीम का सम्पादकीय छोड़कर इसके सम्पादकीय सलाहकार बन गये थे. इस क्रांतिकारी पत्रकार की सौवीं जयन्ती के अवसर पर यह विचार आता है कि कदम कदम पर मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाले इस दौर में जब हर कोई सरकार और पार्टियों से अपनी नजदीकी साबित करते हुए अपने आपको बड़ा दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है तब निखिल दा अपनी निष्पक्षता और निर्भीकता के उदाहरणों के साथ दूर एक प्रकाश स्तम्भ की भांति खड़े हैं और हमें राह दिखा रहे हैं.