Dilip C Mandal : सुधीश पचौरी ने वीरेन डंगवाल और राजेंद्र यादव के बारे में जिस तरह का अश्लील और अशोभनीय लेखन किया है, वह निंदनीय है. निंदनीय इसलिए नहीं कि वीरेनदा और राजेंद्र जी का जीवन और लेखन मुझे प्रिय है. सुधीश ने इन दोनों पर ऐसे समय में हमला किया, जब वे अशक्त हैं/थे.
खाट से उठ पाने में असमर्थ 84 साल के एक व्यक्ति और रेडियोथेरपी से गुजर रहे एक कैंसर पेशेंट पर छिपकर, घात लगाकर, पीठ पीछे से वार करना अशोभनीय है. वीरेनदा और राजेंद्र जी बिंदास लोग हैं/थे, और सुधीश के टुच्चे लेखन से इनका कुछ बिगड़ेगा नहीं, लेकिन शिष्टाचार भी कोई चीज होती है.
इन कुकर्मों के लिए सुधीश न सिर्फ धिक्कार के पात्र हैं, बल्कि सभ्य-प्रबुद्ध समाज से रिजेक्ट कर दिए जाने के काबिल हैं. हालांकि सुधीश इस समाज में कम ही हैं.
वीरेन डंगवाल अपनी सेहत की वजह से इस समय खुद को डिफेंड करने की हालत में नहीं है, यह जानकर उनको निशाना बना लिया. शर्मनाक तो यह है कि सुधीश ने इनकी बीमारी का मजाक उड़ाया है. हद है. मैं सुधीश पचौरी की व्यक्तिगत निंदा करता हूं.
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.
सुधीश पचौरी ने जो लिखा है वो इस प्रकार है…
नौकर की कमीज
एक था नौकर। एक थी उसकी कमीज। यह विनोद कुमार शुक्ल वाली नौकर की कमीज नहीं थी। वह कमीज वाला नौकर भाग्यशाली था कि उस पर एक महाबोर फिल्म भी बनाई गई। लेकिन इस नए नौकर की कमीज थी ही कुछ ऐसी, जिस पर डर्टी पिक्चर टाइप की फिल्म बन सकती है। फिल्म अब भी एक संभावना है, जिसकी पटकथा लिखी जाने लगी है। इस पटकथा रसिक रिकमंडेड है।
पटकथा इतनी जबर्दस्त है कि पिक्चर बने बिना ही सुपर हिट हो रही है गोष्ठियों में, साहित्य सभाओं में, यहां तक कि गली-मुहल्लों में इस मनचली कहानी के किस्से बनने लगे हैं। यह ‘मनचली कहानी’ नई कहानी आंदोलन के नए क्षितिज खोलने लगी है, क्योंकि यह ‘प्रामाणिक अनुभव’ से निकल ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ की एक नई ‘समांतर कहानी’ कह रही है। मनचली कहानी शुरू होती है उस घड़ी से, जब एक नौकर एक मनचले के यहां नौकरी के लिए आया। नौकर मालिक की सेवा करता। मालिक मालिश कराता। वह करता। मालिक दवा खाता, वह खिलाता। मालिक दिलफेंक था। जो भी नई कहानी आती, तो उस पर उसका दिल आ जाता। नौकर नई कहानी की पुरानी दिलफेंक बीमारी के लिए ट्रेंड न था।
दिल्ली पुलिस नागरिकों से कहती थी कि अगर नौकर रखें, तो उसकी पहचान का वेरीफिकेशन पुलिस से जरूर कराएं। नौकर की जांच तो वह करती, लेकिन मालिक की जांच नहीं करती। मालिक हमेशा विश्वसनीय है, नौकर हमेशा संदिग्ध! यही वर्गभेदी न्याय था, जो न केवल मालिक को पसंद था, बल्कि मालिक के सब मित्रों को भी पसंद था। सब प्रेमचंद की परंपरा में कुरसी जमाए थे, नौकर के साथ किए जा रहे भेदभाव को छिपाए थे। महान साहित्यिक अश्लीलताओं के साथ मालिक के दिन कट रहे थे, कहानी भी आगे बढ़ रही थी, लेकिन कहानी में अचानक एक ट्विस्ट आया, जो एक ऐसा सीन बना गया। सब कहने लगे कि वाह क्या सीन है! बात एक रात की है, जब कुत्ते भौंक नहीं रहे थे, सितारे चमक नहीं रहे थे, मालिक लेखक सो नहीं रहा था।
नौकर भी सेवारत था कि एक नई कहानी का अवतरण हुआ और देखते-देखते मालिक के कॉपीराइट के लिए फाइट का सीन बन चला। केस थाने गया। नौकर कमीज समेत अंदर हो गया। नई कहानी की शिकायत पर थानेदार ने मालिक लेखक को बुलाया और बोला कि तू आसाराम क्यों बना जा रहा है भाई? तेरे बुढ़ापे पर तरस आ रहा है, वरना तने तो अंदर कर देता और तू दो मिनट में कहानी की जगह गाना गाने लगता। एक मौका देते हैं, अपनी गलती मान ले और आदत से बाज आ जा। नहीं तो वह दफा लगेगी कि बेल तक नहीं होगी। हे सुधी पाठक! आप इस मनचली, सेक्सी क्राइम कहानी के अंत की प्रतीक्षा कर गलती कर रहे हैं।
कहानी अभी बाकी है साथी! आपसे निवेदन है कि अपनी कल्पना पर लगाम लगाएं और सोचें कि आखिर इस 85 साल के लेखक की क्राइम कहानी पर सब लेखक उसी तरह चुप क्यों हैं, जिस तरह मुक्तिबोध ने अंधेरे में वर्णित किया है: सब चुप! कविजन निर्वाक! पर्वतवादी पीत-पत्रकारिता शिरोमणि भी चुप है! परम प्रगतिशील प्रश्न उठ रहा है कामरेड कि प्रगतिशील विचारों के मालिक का नौकर अपनी कमीज समेत अब तक अंदर है और जनवादी मालिक बाहर क्यों है! जनवादी मालिक अपने सर्वहारा के साथ अंदर रहे, तो क्या अच्छा न होगा कामरेड? इस कहानी का ‘मोरल’ क्या है कामरेड!
(साभार: हिंदुस्तान)
ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!
हिंदी साहित्य में ‘थोड़े’ का ‘बड़ा’ महत्व है। थोड़ा न हो, तो लिखना मुश्किल। थोड़ा न हो, तो गोष्ठी होना मुश्किल! थोड़ा न हो, तो समीक्षा मुश्किल। छपना मुश्किल। एक ‘बड़े’ कवि हैं, जिन्हें ‘थोड़े’ से बहुत प्यार है। वे थोड़े की थोड़ी कविताओं पर ‘थोड़ा-थोड़ा’ विचार करते रहते हैं। ‘थोड़ा’ विचार करते हुए भी वह आधा घंटे बोलेंगे और फिर भी उसे ‘थोड़ा’ कहेंगे। ‘थोड़े’ में थोड़ी विनम्रता है। ‘थोड़ा’ संकोच है। ‘थोड़ी’ अदा है। कविता करते हैं तो कहते हैं: ‘थोड़ी’ कविता की है, मानो थोड़ी ही कृपा की हो।
‘थोड़ा’ कहते ही कवि का अहंकार ‘बिला जाता’ है। ‘थोड़ा’ खाते हैं, तो थोड़ी बात करते हैं, तो थोड़ी पीते हैं और थोड़ी ही देर में लटपटाने लगते हैं। ‘थोड़े’ में थोड़ी नागरिकता है। थोड़ी शिष्टता है। थोड़ा कहते ही ऐसा एहसास होता है, जैसे कवि नामक प्राणी किसी अभयारण्य में वधिकों से किसी तरह बचा हुआ कोई दुर्लभ प्रजाति का हिरन या टाइगर हो। साहित्य में तुरुप का पत्ता है ‘थोड़ा।’ जो थोड़े को सही जगह लगाता है, वह बड़ा साहित्यकार हो जाता है।
एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले कि वह उन थोड़े-से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई। फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाजपुरसी की ओर आ गई। थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी व शरारत अब भी वैसी ही है। (क्या गजब ‘फेस रीडिंग’ है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर)। हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों को सुना, तो लगा कि यार, ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी, आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं, तो क्या ये बुजुर्ग चमचे आपके डॉक्टर हैं, जो दवा दे रहे हैं? लेकिन ‘चमचई’ में ऐसे सवाल पूछना मना है।
बहाना कविता का और बात बीमारी की। हिंदी में यही होता है। हिंदी वाला कभी मुद्दे पर नहीं आता। आता है, तो लपेटा मारकर आता है। यही उसका ‘थोड़ापन’ है। मुद्दा कविता है, तो बात कवि के पियक्कड़ होने की होगी। किसी ने न पूछा कि अगर चमचई ही करनी थी, तो थोड़े की बीमारी की ऐसी भूमिका बांधनी क्यों जरूरी थी? ऐसी नाटकीय भूमिका ही बांधनी थी, तो उनके थोड़ेपन और उनकी बीमारी पर एक विशेषांक ही निकाल दिया जाता। बिना दवा-दारू के थोड़े जी का मिजाज ठीक हो जाता और साहित्य में एक किताब और लोकार्पित हो जाती। लेकिन ये क्या कि आप साक्षात् थोड़े जी को ही लोकार्पित करने में लग गए? और थोड़े जी से भी किसी को शटअप नहीं किया गया। किसी ने कहा है: ‘निज चमच्व केहि लागि न नीका!’ हिंदी में थोड़ी चमचई, थोड़ी चापलूसी, थोड़ी निंदा, थोड़ी स्तुति, थोड़ी अश्लीलता रची जाती है। थोड़ी अश्लीलता न हो, तो हिंदी का साहित्य किस विधि रचा जाए भगवन्! यही है हिंदी की साहित्यिक इंडस्ट्री!
समय ‘थोड़ा’ है। कविता भी थोड़ी ही बची है। इसीलिए कविता तीन चार लाइन तक रहे, तभी वह ठीक रहती है। यही उत्तर आधुनिक ‘मिनीमलिज्म’ है। मिनीमलिज्म यानी ट्विटरा कविता। ट्विटरा गोष्ठी। ट्विटरा टिप्पणी। ट्विटरा बातचीत। ट्विटरा चमचागिरी। ट्विटराती जमात। ट्विटराती कनात!
इसी लघुता में प्रभुता है। कहा भी है :
‘लघुता ते प्रभुता मिले, प्रभुता ते प्रभु दूर!’
हाय! लाख बची क्रांतिकारी कविता, लेकिन गिरी उत्तर आधुनिक ‘मिनीमलिज्म’ में ही!
(साभार: हिंदुस्तान)





