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दिल्ली

अब ना तो नेहरू चाहिए, ना ही पटेल

कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियां आजकल एक छद्म-युद्ध में उलझी हुई हैं। इस वाक्युद्ध का मुद्दा है, ‘जवाहरलाल नेहरू बनाम सरदार वल्लभभाई पटेल'। कांग्रेस इन दोनों नेताओं पर अपना कब्जा दिखाना चाहती है और भाजपा सरदार पटेल को नेहरू के मुकाबले बड़ा बताना चाहती है। पटेल गुजराती थे और नरेंद्र मोदी भी। यदि पटेल को बड़ा बनाया जाए तो उसका सीधा फायदा मोदी को मिलता है, लेकिन पटेल के मामले में कांग्रेस भी पीछे क्यों रहे? वह पटेल को संघ पर प्रतिबंध लगाने और उसकी कड़ी निंदा करने का श्रेय देती है। दोनों पार्टियों के नेता आजकल गड़े मुर्दे उखाडऩे में व्यस्त हैं।
कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियां आजकल एक छद्म-युद्ध में उलझी हुई हैं। इस वाक्युद्ध का मुद्दा है, ‘जवाहरलाल नेहरू बनाम सरदार वल्लभभाई पटेल'। कांग्रेस इन दोनों नेताओं पर अपना कब्जा दिखाना चाहती है और भाजपा सरदार पटेल को नेहरू के मुकाबले बड़ा बताना चाहती है। पटेल गुजराती थे और नरेंद्र मोदी भी। यदि पटेल को बड़ा बनाया जाए तो उसका सीधा फायदा मोदी को मिलता है, लेकिन पटेल के मामले में कांग्रेस भी पीछे क्यों रहे? वह पटेल को संघ पर प्रतिबंध लगाने और उसकी कड़ी निंदा करने का श्रेय देती है। दोनों पार्टियों के नेता आजकल गड़े मुर्दे उखाडऩे में व्यस्त हैं।
 
इन नेताओं से कोई पूछे कि इन दोनों दिवंगत नेताओं को लेकर आज तू-तू, मैं-मैं करने का फायदा क्या है? इसमें शक नहीं कि नेहरू और पटेल, दोनों ही अपने-अपने ढंग के विलक्षण नेता थे। दोनों में ही बहुत-सी खूबियां थीं और कमजोरियां भी थीं। उनसे सीख लेने की बजाय आज देश के दो प्रमुख दल अपना-अपना अखाड़ा सजाने में लगे हुए हैं। इस अखाड़े में वे क्या करेंगे? दो दिवंगत मूर्तियों को एक-दूसरे से भिड़ाएंगे? ऐसा लगता है कि दोनों के पास जैसे जीवित योद्धाओं का अभाव है तो वे अब दिवंगतों से ही काम चला रहे हैं। दिवंगतों के द्वंद्व से चटखारे लेनेवाले दलों का दिवालियापन इससे भी उजागर होता है कि उनके पास लड़ाने के लिए सिर्फ व्यक्ति हैं, मुद्दे नहीं हैं। वे पुराने नेताओं के द्वंद्व को नए नेताओं पर आरोपित करना चाहते हैं यानी उनके पास क्या आज नेताओं का भी अभाव है?
 
जहां तक नेहरू और पटेल का सवाल है, अपने समय में दोनों ने इतिहास बनाया और दोनों इतिहास के विषय बन गए। देश को अब न नेहरू की जरूरत है न पटेल की! समय बहुत बदल गया है। समाजवाद और गुट निरपेक्षता के दिन लद गए। इसी प्रकार भारत-विभाजन और परराष्ट्र भक्ति का आज कोई खतरा नहीं है। इसीलिए यदि आज राजनीति की सुई नेहरू और पटेल पर ही अटकी रही तो भारत की घड़ी बंद हो जाएगी। वर्तमान भारत को इन दोनों नेताओं से कहीं आगे निकलना होगा। अगर आप नेहरू और पटेल के दीवाने हैं और उन्हें दुबारा अवतरित कराना भी चाहें तो कैसे करेंगे? आप गांधी की वह अद्वितीय भठ्ठी कहां से लाएंगे, जिसमें से तपकर ये शानदार ईंटें निकली थीं? क्या आप गांधी के बिना जवाहरलाल और वल्लभ भाई की कल्पना भी कर सकते हैं?
 
तो अभी क्या करें? दोनों पार्टियों ने जिन नेताओं को आजकल आगे किया हुआ है, उनके बीच कोई तुलना है क्या? जो तुलना करने चलेंगे, वे खुद तुल जाएंगे। इसीलिए व्यक्तियों की तुलना करने या उन्हें आगे बढ़ाने से यह कहीं ज्यादा जरूरी है कि मुद्दों, नीतियों, कार्यक्रमों और अपनी-अपनी विश्वदृष्टि को जनता के सामने लाया जाए ताकि नई सरकार बनने पर लोग खुद तौल सकें कि उनका कितना फायदा हो रहा है और कितना नुकसान।
 
दोनों पार्टियों ने आजकल जैसे नेहरू बनाम पटेल का एक नकली मुद्दा उछाला हुआ है, वैसे ही वे आजकल एक-दूसरे पर प्रहार कर रही हैं। पक्ष और विपक्ष, एक-दूसरे पर प्रहार नहीं करेंगे तो क्या करेंगे? क्या वे ‘अहो रूपम-अहो ध्वनि' का पाठ करेंगे? वे एक-दूसरे पर प्रहार करें, जरूर करें। उसके बिना चुनावी अभियान नीरस हो जाएंगे, लेकिन विरोधियों पर सिर्फ प्रहार करना ही राजनीति नहीं है। दोनों में से कौन-सा दल ऐसा है, जो भावी भारत का वैकल्पिक नक्शा पेश कर रहा है?
 
जिन नेताओं को भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है, क्या उन्हें पता है कि भारत की असली समस्याएं क्या हैं और उनका समाधान कैसे हो सकता है? एक नेता से तो उक्त प्रश्न पूछना ही उसका अपमान करना है और दूसरा नेता यह दावा कर सकता है कि वह एक प्रदेश का दस साल तक मुख्यमंत्री रहा है। क्या उसे पता नहीं कि भारत का शासन कैसे चलाना है? इसका जवाब यही हो सकता है कि आप तो दस साल तक सिर्फ मुख्यमंत्री ही रहे, जो दस साल से प्रधानमंत्री बना हुआ है, उसकी दुर्दशा आप देख रहे हैं या नहीं? भारत जैसे विशाल और विविध देश को समझने के लिए दस साल कोई ज्यादा नहीं होते और अगर आप किसी पद-विशेष पर हों तो आपका ज्यादा समय और श्रम तो अपने कर्तव्य के निर्वाह में ही लग जाता है। देश को समझने का समय आपके पास कहां रहता है?
 
इस सत्य को समझना हो तो आज तक के अपने प्रधानमंत्रियों पर जऱा नजर दौड़ाइए। नेहरू, इंदिरा, मोरारजी, नरसिंहराव और वाजपेयी – ये पांच लोग, प्रधानमंत्रियों की लंबी कतार में अलग दिखाई पड़ते हैं या नहीं? क्यों? क्योंकि ये 5-10 साल वाले नेता नहीं थे। इन्होंने अपनी जिंदगी के 50-50 साल राजनीति में झोंक दिए थे। इन्होंने देश के लोगों को, अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को और उनकी समस्याओं को खुद उनके बीच शामिल होकर देखा-परखा था।
 
आज हमारे नेताओं को देश की समस्याओं का पता योजना आयोग के आंकड़ों से चलता है। आयोग कहता है कि गांव में 28 और शहर में 32 रुपए रोज से ज्यादा जिसे मिलें, वह गरीब नहीं है। भारत में गरीबों की संख्या मुश्किल से 30-35 करोड़ है। बाकी लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं। वास्तव में गरीबी रेखा तो पशु रेखा है। 30-35 करोड़ लोग तो पशुओं की जिंदगी बिता रहे हैं। शेष लगभग 60-65 करोड़ लोगों को मनुष्य-रेखा तक कौन-सा नेता पहुंचाएगा, कोई नहीं बता रहा। 100 करोड़ लोगों के उद्धार की कोई योजना किसी दल के पास नहीं है।
 
क्या कल्पना जगत में नेहरू और पटेल को भिड़ा देने से इन 100 करोड़ लोगों को हम मनुष्य-रेखा पर ला सकेंगे? क्या इन नेताओं ने कभी सोचा कि भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा अशिक्षित लोग क्यों हैं? जो शिक्षित हैं, वे भी बेरोजगार क्यों हैं? जिस अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व ने इस देश में अशिक्षा और असमानता फैला रखी है, क्या किसी नेता ने उसके विध्वंस के लिए कभी अपनी जुबान भी हिलाई है? वे कुछ समझते हों तो हिलाएं। भ्रष्टाचार और जातिवाद पर सभी नेता आंसू जरूर बहाते हैं, लेकिन उनका उन्मूलन वे कैसे करेंगे, उन्हें कुछ पता नहीं। युवाओं के वोट के लिए सभी लालायित हैं, लेकिन उनके बढ़ते हुए दुराचरण पर किसी नेता की नजर नहीं है। विदेश नीति और रक्षा-नीति अफसरों के भरोसे चलती ही है। जब पल्ले में कुछ है ही नहीं तो क्या करें? बस नेहरू बनाम पटेल की माला जपते रहें।
 
लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है.
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