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सुख-दुख...

कमलेश्वर के लाए उस रेडियो पत्रकार की कमजोर नस मेरे हाथ लग गई थी

दिल्ली में शाह टाइम्स की धूमधाम से लांचिंग नहीं हो सकी तो कमलेश्वर जी ने कार्यालय आना बंद कर दिया क्योंकि उनके पास इसके लिए कोई जवाब नहीं था। दिल्ली के अखबार जगत में यह चर्चा भी चल पड़ी कि यह सब कुछ जान बूझ कर किया गया है। बात जो भी रही हो मगर अखबार मालिक और उनके परिवार को बहुत दुख हो रहा था क्योंकि वह इस अवसर पर भारी रकम खर्च कर दिल्ली में अपना जलवा दिखाना चाहते थे। उधर कमलेश्वर से उनका सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। प्रोग्राम तो होना नहीं था इसलिए सब मन मसोस कर रह गए।

दिल्ली में शाह टाइम्स की धूमधाम से लांचिंग नहीं हो सकी तो कमलेश्वर जी ने कार्यालय आना बंद कर दिया क्योंकि उनके पास इसके लिए कोई जवाब नहीं था। दिल्ली के अखबार जगत में यह चर्चा भी चल पड़ी कि यह सब कुछ जान बूझ कर किया गया है। बात जो भी रही हो मगर अखबार मालिक और उनके परिवार को बहुत दुख हो रहा था क्योंकि वह इस अवसर पर भारी रकम खर्च कर दिल्ली में अपना जलवा दिखाना चाहते थे। उधर कमलेश्वर से उनका सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। प्रोग्राम तो होना नहीं था इसलिए सब मन मसोस कर रह गए।

अखबार दिल्ली में जारी हो गया। प्रताप भवन में पहली मंजिल का एक भाग कार्यालय के लिए पहले ही खरीद लिया गया था। उसकी साज सज्जा पर भी काफी पैसा खर्च कर एक शानदार कार्यालय बना दिया गया था जिसमें कमलेश्वर की टीम मजे ले रही थी। इस टीम में मैं भी एक बेगाने की तरह रह रहा था। संपादकीय लिखना और लोकल रिपोर्टिंग को चुस्त दुरुस्त रखने के अलावा डमी निर्माण की प्रक्रिया को देखना भर मेरा काम रह गया था। इस टीम के लोग भी मुझसे अधिक सम्पर्क नहीं करते थे। सहयक संपादक के रूप में जो रेडियो पत्रकार रखे थे वह अपने आप को तीसमार खां मानते थे। मेरा सही सुझाव भी उन्हें गलत लगता था। जब भी अवसर मिलता मैं उनसे संपादकीय लिखने का आग्रह कर देता। बस यही उनकी एक कमजोर नस मेरे हाथ लग गई थी। अब उन्हें मुझ से यह डर हमेशा लगा रहता कि कहीं मैं संपादकीय लिखने का तकाजा न कर दूं।

अखबार के मालिक शाहनवाज राणा परेशान थे। विज्ञापन मैनेजर तीन महीने से भारी वेतन ले रहा था मगर अब तक विज्ञापन एक पैसे का नहीं दिला पाया था। कमलेश्वर दूसरे अखबारों में तो लिख रहे थे मगर शाह टाइम्स में कभी एक लाइन नहीं लिखी। ब्यूरो चीफ का भी यही हाल था। वह भी इस दौरान कुछ नहीं लिख पाए थे। शाहनवाज ने सोचा यह था कि विद्वान लोग हैं, अखबार में कुछ लिखेंगे तो अखबार की प्रतिष्ठा में इजाफा होगा मगर पता नहीं क्यों ये लोग खामोश बैठे थे। ब्यूरो के संवाददाताओं का भी यही हाल था। ये लोग लिखते तो थे मगर अपनी मर्जी से। इसके चलते महत्वपूर्ण राजनीतिक खबरें छूट जाती थीं। हां ब्रिटिश लायब्रेरी की खबरें खूब लिखते थे। लोकल रिपोर्टिंग में कुछ पुराने लोग थे जो काम कर रहे थे, सो लोकल मामलों में अखबार नहीं पिछड़ रहा था। कमलेश्वर की टीम के लोग मेरी बात मानने को तैयार ही नहीं थे इसलिए मैंने भी उन्हें कोई सुझाव देना बंद कर दिया था। कमलेश्वर जी ने कार्यालय कभी कभार भी आना बंद कर दिया था।

मुझे आभास होने लगा था कि ये लोग कभी भी जा सकते हैं। इसलिए मैंने मुजफ्फरनगर से तीन सब एडीटर बुला लिए थे तथा खेल और व्यापार के अतिरिक्त लोकल पेज का जिम्मा भी उन्हें दे दिया था। अंत में वही हुआ जिसकी आशंका थी। उस दिन जब चार बजे तक कोई नहीं आया तो मैं समझ गया कि ये लोग अब नहीं आएंगे। संकट कुछ नहीं था क्योंकि पहले से ही मन बना हुआ था इसलिए झटपट सब काम पर लग गए और समय रहते पहला पेज छपने के लिए भेज दिया। कमलेश्वर जी अपने लोगों को उसी प्रकार ले गए जिस प्रकार सम्बंध विच्छेद होने पर दुल्हन अपना स्त्री धन साथ ले जाती है। उनके जाने का अखबार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मालिक ने भी राहत की सांस ली क्योंकि वह सीधे सीधे उनसे जाने को नहीं कह पा रहे थे। इस प्रकार शाह टाइम्स से कमलेश्वर प्रकरण का अंत हो गया। और शाह टाइम्स के इतिहास में एक अध्याय यह जुड़ गया कि कभी नामी लेखक कमलेश्वर भी इस अखबार के सम्पादक रहे थे।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

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