Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

लखनऊ

बनर्जी होंगे यूपी के नये डीजीपी

जैसा अब तक होता आया है कि प्रदेश के डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी का चयन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने ही किया है। अगर यही परंपरा जारी रही तो आनंद लाल बनर्जी यूपी के नये डीजीपी बनने जा रहे हैं। बस यह तय होना बाकी है कि मौजूदा डीजीपी देवराज नागर को उनके रिटायरमेंट के बचे हुए दो महीने गुजारने दिये जायें या फिर जल्दी ही श्री बनर्जी की तैनाती कर दी जाये। पूरी नौकरशाही में इस बात की चर्चा है कि चुनावी साल में अगला डीजीपी कौन होगा।
जैसा अब तक होता आया है कि प्रदेश के डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी का चयन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने ही किया है। अगर यही परंपरा जारी रही तो आनंद लाल बनर्जी यूपी के नये डीजीपी बनने जा रहे हैं। बस यह तय होना बाकी है कि मौजूदा डीजीपी देवराज नागर को उनके रिटायरमेंट के बचे हुए दो महीने गुजारने दिये जायें या फिर जल्दी ही श्री बनर्जी की तैनाती कर दी जाये। पूरी नौकरशाही में इस बात की चर्चा है कि चुनावी साल में अगला डीजीपी कौन होगा।
 
बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था समाजवादी पार्टी की सरकार के लिए सबसे ज्यादा मुसीबत का सबब बनी हुई है। कोशिशों के बाद भी कानून व्यवस्था संभलने का नाम ही नहीं ले रही है। आम जनमानस में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर बेहद नाराजगी है। सरकार चाह कर भी इन स्थितियों में सुधार नहीं ला पा रही है।
 
मुजफ्फरनगर दंगे इस सरकार के माथे पर सबसे बड़ा कलंक साबित हुए। कई महीने बीत गये मगर दंगे काबू में नहीं आये। एक तरफ सरकार दंगा रोक पाने में नाकाम सिद्ध हो रही है तो दूसरी ओर पुलिस के बड़े अफसर गुटबाजी और सरकार को बदनाम करने की रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। सरकार को देर से ही सही मगर पता चला कि जिन अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था अरुण कुमार के भरोसे वह यूपी में रामराज्य स्थापित करने की योजना बनाने में जुटी थी वही अरुण कुमार सरकार की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम कर रहे थे। हकीकत पता चलने के बाद हालांकि अरुण कुमार को न सिर्फ पद से हटाया गया बल्कि उन्हें अभी तक वेटिंग में डालकर सरकार उन्हें सबक सिखा रही है।
 
इसके बाद अगली नाराजगी डीजीपी देवराज नागर को लेकर है। अपने पूर्ववर्ती डीजीपी के मुकाबले श्री नागर ईमानदार और सरल स्वभाव के माने जाते हैं मगर यह बात अब साबित हो गयी कि पुलिस महकमे में उनकी पकड़ नहीं बची। मुख्यमंत्री इस बात से भी नाराज हैं कि पिछली बार मुजफ्फरनगर में इतने हंगामे के बावजूद डीजीपी मौके पर नहीं गये जबकि उनसे पहले खुद मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक उस इलाके का दौरा कर आये। नाराजगी के इसी क्रम में प्रमुख सचिव गृह की भी छुट्टी कर दी गयी।
 
सरकार को समझ नहीं आ रहा कि अब मुजफ्फरनगर दंगे किस रणनीति से रोके जायें। चुनाव से पहले लगातार इस तरह घटनायें सरकार की छवि को बेहद नुकसान पहुंचा रहीं हैं। सपा का एक बड़ा धड़ा चाहता है कि तत्काल डीजीपी को भी उनके पद से हटा दिया जाये जिससे यह मैसेज दिया जा सके कि सरकार कानून व्यवस्था के मामले में किसी से कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।
 
डीजीपी के बदले जाने की खबर ने यूपी के कई पुलिस अफसरों की सक्रियता बढ़ा दी। डीजीपी के संभावित दावेदारों ने अपनी-अपनी सक्रियता बढ़ा दी हैं। पिछले पखवाड़े चली चर्चाओं में एके गुप्ता, रंजन द्विवेदी, एएल बनर्जी एवं रिजवान अहमद का नाम सबसे ज्यादा सुनाई दिया। कुछ दिनों पहले तक सबसे मजबूती एके गुप्ता के नाम में दिखाई दे रही थी क्योंकि पुलिस अफसर मानते हैं कि श्री गुप्ता पुलिसिंग का काम बेहतर तरीके से करते हैं। तब यह माना जाता था कि एके गुप्ता ही नये डीजीपी बनाये जायेंगे।
 
एके गुप्ता का नाम फाइनल हो पाता उससे पहले ही प्रमुख सचिव गृह के पद पर अनिल गुप्ता और अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था के पद पर मुकुल गोयल की तैनाती कर दी गयी। यह दोनों वैश्य जाति से ताल्लुक रखते हैं। लिहाजा यह संभव नहीं था कि डीजीपी के पद पर भी किसी वैश्य जाति के अफसर को तैनात किया जाता। लिहाजा एके गुप्ता इस दौड़ से बाहर हो गये।
 
रिजवान अहमद लंबे समय से समाजवादी पार्टी के वफादार अफसरों में रहे हैं। उनकी भी बड़ी इच्छा थी कि वह एक बार प्रदेश के डीजीपी बन जायें। अल्पसंख्यक होने के नाते वह अपनी दावेदारी को और मजबूत समझते हैं और अपने समर्थकों से यह संदेश भिजवाने में पीछे नहीं रहते कि उनकी तैनाती से मुस्लिमों में अच्छा संदेश जायेगा। उनकी इसी रणनीति के तहत पिछले दिनों मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में सवाल उठाया गया कि क्या प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदाय से डीजीपी बनाया जायेगा। मगर उनकी तैनाती में दो समस्यायें सामने आ गयीं। पहली तो यह कि उनकी नौकरी के चार माह ही बचे हैं। ऐसे में चार महीने के लिए डीजीपी के पद पर तैनाती किसी भी रूप में सही नहीं ठहराई जा सकती। दूसरा प्रदेश के मुख्य सचिव भी मुस्लिम हैं और इस आधार पर दूसरे सबसे बड़े पद पर भी मुस्लिम अफसर की तैनाती से सरकार बचना चाहती है।
 
पंडित कार्ड के नाम पर रंजन द्विवेदी ने भी अपना नाम आगे चलवाया था। मगर उनका पिछला ट्रैक रिकार्ड बहुत बेहतर नहीं रहा है इस नाते सरकार उनकी तैनाती से बचना चाहती है। साथ ही वह कई सालों तक प्रदेश से गायब भी रहे हैं। इसके अलावा वह सभी दलों से अपना तालमेल बनाकर रखते हैं। जिससे सपा के प्रति उतनी निष्ठा नहीं रह पाती जितनी सपा के नेता चाहते हैं।
 
1979 बैच के एएल बनर्जी ने पिछले कई दिनों से सपा मुखिया की परिक्रमा करके अपनी स्थिति बेहतर बना ली है। बताया जाता है कि जब प्रमुख सचिव गृह अनिल कुमार गुप्ता को बनाने का फैसला लिया गया और वह नेताजी से मिलने पहुंचे उस समय भी एएल बनर्जी वहां मौजूद थे। यही नहीं दीपावली के आसपास उनके सामने ही नेताजी ने डीजीपी देवराज नागर की जमकर क्लास ली। यह बात पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बनी हुई है।
 
श्री बनर्जी इस समय सतर्कता विभाग में निदेशक के पद पर तैनात हैं। उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ाने के साथ ही पिछले दिनों अपने कार्यालय में सभी डीजी तथा एडीजी को चाय पर आमंत्रित किया। लोगों ने इस आयोजन की वजह पूछी तो बताया गया कि सतर्कता विभाग की नई बिल्डिंग बनने के आयोजन में यह चाय पार्टी आयोजित की गयी है। जबकि हकीकत में यह श्री बनर्जी के डीजीपी बनने से पहले सक्रियता का पहला चरण था।
 
सर्तकता विभाग का यह भवन पिछले कुछ दिनों वैसे भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ दिनों पहले इस भवन के उद्घाटन के लिए मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया गया। इसके बाकायदा कार्ड भी छप गये और बंट गये। इसी बीच मुख्यमंत्री को बताया गया कि इस भवन में तो महीनों से विभाग के लोग बैठ रहे हैं अब अगर वह उद्ïघाटन करेंगे तो उनकी फजीहत होगी। लिहाजा ऐन वक्त पर यह उद्घाटन समारोह टाला गया। श्री बनर्जी की चाय पार्टी में गये अफसर यह नहीं समझ पा रहे थे कि जिस भवन का उद्घाटन करने में पहले भी इतना विवाद हो चुका है उस भवन के नाम पर चाय पार्टी क्यों आयोजित की जा रही है।
 
हालांकि श्री बनर्जी के नाम फाइनल होने की चर्चा के बीच अफसरों का एक धड़ा उनके भी विरोध में जुट गया है। यह धड़ा कह रहा है कि श्री बनर्जी का स्वास्थ्य काफी खराब है। मौजूदा दौर में प्रदेश को सक्रिय डीजीपी की जरुरत है। ऐसे में किसी बीमार अफसर को इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। सूत्रों का कहना है कि सपा मुखिया ने लगभग श्री बनर्जी के नाम पर अपनी स्वीकृति दे दी है और संभव है कि रिटायर होने से पहले ही देवराज नागर को उनके पूर्ववर्ती अंबरीश चंद्र शर्मा की तरह हटा दिया जाये क्योंकि सपा के लोग यह कह रहे हैं कि बाद में डीजीपी तैनात होने पर चुनाव आयोग उसे हटा सकता है।
 
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के संपादक हैं.  यह स्टोरी वीकएंड टाइम्स में प्रकाशित हो चुकी है.

संजय के अन्य लेखों, विश्लेषणों, रिपोर्टों को पढ़ने के लिए क्लिक करें: भड़ास पर संजय

 

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...