'तमंचे पर डिस्को..' बज रहा था लेकिन मंदिर के बगल में लुढके पड़े शराबी के पैर बिलकुल नहीं हिल रहे थे… उसके मुंह को सूंघते हुए दो कुत्ते थोड़े आगे थोड़े पीछे हो रहे थे, जाने भय में, या 'स्टॉफ' के सदस्य को देखकर अपनी सक्रियता-सलामी शो करने के वास्ते या मन ही मन कोई नुसरत फतेह अली मार्का लंबा आलाप ''…पड़े ही रहने दो चौखट पर..'' लेने में आई मजबूरन लंबी हिलडुल को सहेजने में… तभी रात दस बजे के बाद नशे में उन्मुक्त दिल्ली को सैल्यूट मारती एक तेज रफ्तार कार हाई वाल्यूम म्यूजिक '''…दिल तू ही बता…'' अपनी सभी खुली खड़कियों से थ्रो करते पूरी मार्केट पूरी रोड को दनदनाते आई गई हो गई…
थाने के सामने रोड किनारे बुढ़िया इत्मीनान से चूल्हे पर रोटियां सेंक-पलट रही थी… अगल-बगल छोटे छोटे ग्रुप में सिपाही, एएसआई, दरोगा अलग-अलग क्लाइंट्स को डील कर रहे थे, गलबहियां से लेकर हमप्याला, हमनिवाला हो रहे थे… वो सब्जी वाले ने अपनी दुकान का शटर गिरा लिया और भीतर ही दारू के दौर शुरू हो गए… एक कार रुकी थी और कुछ बोतलें निकलीं, बस… शटर बंद… आलू-प्याज लेने आया एक बैचलर खटखटाता रहा, अंदर से आवाज आती रही… अब बंद… कल खुलेगी… ठेके पर भीड़… जाओ, लाओ.. एक पव्वा और… नहीं भइया… अद्धा से कम नहीं… पूरी रात बाकी है..
लुढ़के पड़े शराबी को दूसरा थोड़े होश वाला शराबी रिक्शे वाले के सहयोग से लाद कर ले गया.. कुत्ते अब गली की बजाय सड़क पर मोर्चाबंदी के लिए चहलकदमी करने लगे.. कारों की संख्या कम हुई लेकिन जो आती-जाती रहीं, उनमें स्पीड ज्यादा दिखी.. बुढ़िया अपने प्लास्टिक से तैयार कैंप में घुसकर सो गई… थाने के सामने केवल एक संतरी बचा, रुटीन की ड्यूटी देते हुए बेहद उदास मुद्रा में.. सब्जीवाले दुकान की शटर खुलने बंद होने की आवाज फिर आई और कार निकल गई.. ठेके वीरान हो गए… कुछ एक शराबी कांख में कुछ दबाए इधर उधर हिलडुल हो रहे थे और अंधेरे में बैठने छिपने का जतन करते हुए गिलास पानी पव्वा की आवाजें निकाल रहे थे… कुछ घंटे बाद एक आटो वाले ने थाने के सामने पार्क के करीब के झाड़ियों में एक युवक को उतारकर पीटा, लूटा और चलता बना… चीखने चिल्लाने की आवाजें खूब आई पर किसी ने सुनी नहीं.. शायद बुढ़िया के कान तक पहुंची लेकिन उसके हाथ में पावर नहीं था… जिनके पास पावर था वे दिन भर कार-बाइक रोक कर कागज पत्तर देखने में एनर्जी खर्चते रहते हैं सो कानून के आराम का वक्त था.. कुत्ते सब देख कर भी भोंक नहीं रहे थे… शायद कोई सेटिंग हो…
एक नया आटो आया और उसमें से कुछ लोग पोस्टर गोंद लेकर निकले और चिपकाने लगे… नेताओं को चेहरे और वोट देने की अपील… एक शराबी पड़ा पड़ा देखता रहा, गरियाता रहा, बड़बड़ाता रहा… मंदिर से भजन की आवाज आने लगी थी… शराबी उंघने लगा था… कुत्ते सोने लगे थे… पोस्टर चिपक चुके थे.. लुट चुके युवक के कराहने की आवाज बंद हो चुकी थी… बुढ़िया सड़क किनारे के नाले पर निपटने बैठ गई थी… दिल्ली मौन थी… सड़कें लगभग वीरान… ऐसे ही वक्त उस शराबी ने तय किया कि उसे इतनी ही खामोशी पसंद है, बस इत्ती-सी चीजों, ऐसी ही स्थितियों में जीना पसंद है… सो वह अगले दिन ट्रेन पकड़ेगा और अपने गांव-कस्बे लौट जाएगा, हरामखोरों की दिल्ली की ऐसी की तैसी…
अगली सुबह थाना मंदिर ठेका दुकान सड़क कुत्ते सिपाही बुढ़िया सब कहीं खो-से गए क्योंकि घरों से रेला निकल चुका था सड़कों पर और भारी भीड़ में कौन किसी एक शक्ल, भावना, सिंबल को पहचान कर पकड़ कर बैठता… बड़ी बड़ी हांय हांय करती बसें, मेट्रो ट्रेन, आटो, कारें, रिक्शे, ये, वो, जाने क्या क्या के बीच आदमी खो गया.. शब्द खो गए.. भावनाएं खो गई… आवाज खो गए… उस शराबी को फिर शाम, अंधेरा, शराब, संगीत, सड़क का इंतजार है जहां कोई न हो… सिर्फ वो हो और हों बस कुछ एक अलग-अलग किस्म की चीजें.. ताकि विविधता में एकता और एकता में विविधता दिखे… 'जय हिंद' कहता हुए वो शराबी चश्मा लगाए मेट्रो पर सवार होकर ड्यूटी बजाने निकल गया था… यही सब सोचता बूझता गुनगुनाता… और, उसने घर परिवार की मजबूरियों के कारण दिल्ली छोड़ने का इरादा मुल्तवी कर दिया था… लेकिन वो रात में फिर तलाशेगा अपना गांव, अपने लोग, खामोशी, संगीत, मुक्ति…. फिलहाल तो कल रात के कुछ अनजाने चोट, घाव उसे मीठा मीठा दर्द दे रहे थे…
लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. संपर्क: [email protected]





