उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव जहाँ एक ओर प्रदेश को नयी सरकार देंगे वहीं 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों में देश की राजनीति की दिशा निर्धारण करेंगे। विगत चुनावों के विश्लेषण बता रहे हैं कि मतदाता का ध्रुवीकरण सांप्रदायिक व गैर सांप्रदायिक दो विचारों को लेकर हो गया है। कभी राष्ट्र की सबसे मजबूत पार्टी कांग्रेस अब उन राज्यों में सिमट कर रह गयी है जहाँ मजबूत क्षेत्रीय दल या तीसरी शक्ति का अभाव है। उत्तर प्रदेश में सपा के रहते कांग्रेस उबर नहीं पायी। सपा ने भाजपा की बढ़त रोकी तो दोनों बडे़ राष्ट्रीय दल कांग्रेस व भाजपा पीछे रह गये और मुकाबला सपा-बसपा में हो गया।
इसको गहनता से समझने के लिए गाजियाबाद का उदाहरण लिया जा सकता है, जहाँ 2009 के लोक सभा चुनाव में राजनाथ सिंह भाजपा उम्मीदवार बने तो सपा ने कांग्रेस को समर्थन देकर वोटो का बिखराव रोक दिया था। मेरठ-सहारनपुर मंडल में केवल इसी सीट पर कांग्रेस दो नम्बर पर रही अन्यथा सहारनपुर, मुजफरनगर, मेरठ, बुलन्दशहर में कांग्रेस चार नम्बर पर ही रही, बिजनौर में मुस्लिम वोट सपा-बसपा में बंट जाने के कारण कांग्रेस तीन नम्बर पर आ गयी। बिजनौर में तब लोक सभा चुनाव में बसपा के प्रत्याशी शाहिद सिद्दीकी इस बार सपा को वोट डलवायेंगे।
ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकार यह सोच सकते हैं कि सपा को कमजोर किया जाय। परन्तु यह काम न तो आसान है और न ही एक चुनाव में सम्भव है। फिर, मुलायम सिंह जैसे परिपक्व राजनेता के सामने कांग्रेस के नौकरशाही सलाहकारों की रणनीति सफल नहीं हो सकती। कांग्रेस भले ही सरकार बनाने की दहाडे़ मार रही हो परन्तु उसकी दहाड़ में हाथी की चिघांड़ को समर्थन साफ नजर आता है। कांग्रेस सोचती है कि अपने को सरकार का दावेदार साबित कर मुस्लिम वोटों में भटकावा पैदा कर दिया जाय। इसका सीधा लाभ बसपा को मिलेगा। परन्तु नीयत में खोट होने के कारण कांग्रेस की चाल पकड़ में आ जाती है। कहते हैं कि वह जादू क्या जिसकी ट्रिक दर्शक भाँप लें। ऐसे ही मुस्लिम मतों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण के नाम की तुरप मारी, परन्तु मुस्लिमों को समझते देर नहीं लगी कि यह आरक्षण फर्जी है, इसमें मुस्लिमों को कोई लाभ नहीं मिलेगा।
कांग्रेस के छिपे एजेन्डे में बसपा को समर्थन एक ओर साफ दिखाई दे रहा है। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली विगत उत्तर प्रदेश सरकार में मामूली घटनाओं पर राजभवन से त्वारित प्रतिक्रिया हुआ करती थी, परन्तु बसपा सरकार के थोक के भाव मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर राजभवन की चुप्पी केन्द्र सरकार की नीति रही होगी। प्रदेश सरकार के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों का ट्रायल तो बाद में होगा। स्वंय मुख्यमंत्री मान रही हैं कि मंत्री भ्रष्ट हैं। कोई बताने की आवश्यकता नहीं है कि लूट का माल किस घर में जा रहा है या प्रदेश के भ्रष्टाचार की नदी का उद्गगम स्थान कौन सा है?
सन 1948 में बिहार की तत्कालीन सरकार के एक मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे तो केन्द्र सकते में आ गया था। 2011 में कर्नाटक में मंत्रिमडल पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर राज्यपाल सक्रिय हो उठे थे और लोकायुक्त की जाँच पर मुख्यमंत्री बाहर हो गया था। उत्तर प्रदेश में पौने पांच साल की लूट की छूट के बाद मंत्रियों को सुरक्षित मार्ग से बाहर निकाला जा रहा है, इनमें से कुछ पुन बसपा से उम्मीदवार है तो कुछ के परिवार को बसपा टिकट पर समायोजित किया गया है। इस रिपोर्ट में हम कांग्रेस को ही फोकस पर लेंगे। अपने भले दिनों में कांग्रेस के पास दलित मुस्लिम व ब्राह्मण वोटों का समर्थन था। दलित का एक भाग बसपा की तरफ चला गया मुस्लिम मुलायम के साथ है। ब्राहमणों ने सभी दलों में अपना स्थान बना लिया है। नीतियों में कांग्रेस देश के व्यापारी के मुकाबले विदेशी धनाढ्यों को प्राथमिकता देती देखी गयी। भ्रष्टाचार के राष्ट्रीय मुकाबले में कांग्रेस शिखर पर खड़ी है, बसपा रनरअप है तो भाजपा भी हाँफती हुई साथ दौड़ने की कोशिश कर रही है।
व्यापारी प्रतिनिधियों से बातचीत करने पर कांग्रेस के प्रति आक्रोश साफ नजर आता है। व्यापारी कहते हैं कि जब कांग्रेस रिंग मे अकेली पहलवान थी तब व्यापारियों को चोरबाजारी कह कर कठोर धाराओं के मुकदमे लगवाये जाते थे। आज पतली हालत में है तो भी बिचौलिये कह कर बदनाम कर रही है। वह भूल गये कि केन्द्र में उनकी सरकार है और यदि वे बिचौलिये कहते हैं तो यह देन भी उन्हीं की है। वैसे बिचौलिया शब्द कांग्रेस पर फिट बैठता है क्योंकि वे स्वंय विदेशी व्यापारियों के लिए हिन्दुस्तान में व्यापार के बिचौलिए हैं। कुल मिलाकर चौथे नम्बर की कांग्रेस तीसरे नम्बर की पार्टी भाजपा से भी मुकाबले में पिछड़ती ही दिखाई दे रही है।
भाजपा भी तीसरे नम्बर से दूसरे पर आती दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि 1991 के बाद उसकी धीमी पड़ती रफ्तार अब हाँफ कर बैठ जाने की स्थिति में हैं। उसको केवल इस बात से संतोष करना पडे़गा कि चुनाव बाद बसपा से एक बार फिर रिश्ता जुड़ जाय। मुस्लिम इस बार सावधान है। बसपा-भाजपा के संभावित गठबन्धन के प्रति मुस्लिमों के साथ भाजपा का परम्परागत वोट भी सशंकित है। वे इस गठबन्धन के मुकाबले सपा की सरकार को ही पसन्द करेंगे।
मेरठ से गोपाल अग्रवाल की रिपोर्ट.





