केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इधर लगातार चर्चा में बना हुआ है। आम तौर पर राजनीतिक कारणों से इसकी ज्यादा चर्चा विपक्ष करता रहा है। मुख्य विपक्षी दल, भाजपा का नेतृत्व लंबे समय से कहता आया है कि सीबीआई अब ‘कांग्रेस जांच ब्यूरो’ की तरह काम कर रही है। क्योंकि, कांग्रेस का नेतृत्व अपनी सुविधा की राजनीति करने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल बड़ी बेशर्मी से करने लगा है। सीबीआई के तौर-तरीकों पर कई बार अदालतों ने तीखी नाराजगी जाहिर की है।
मई महीने में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कोयला घोटाले जांच प्रकरण में सीबीआई की भूमिका पर टिप्पणी की थी कि जांच एजेंसी पिंजड़े में बंद ‘तोते’ की तरह वही बोलती नजर आती है, जो कि उसका मालिक (सरकार) चाहता है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद सीबीआई को लेकर एक लंबी बहस जारी रही है। यह अलग बात है कि कोयला घोटाला जांच प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय की तमाम फटकार के बावजूद अब सीबीआई ने कड़ा रुख अपना लिया है। उसका रुख इतना कड़ा हो गया है कि कोयला घोटाले की जांच का दायरा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुका है। सीबीआई का यह हौसला अब केंद्रीय सत्ता में बैठे राजनीतिक आकाओं को काफी नागवार गुजरने लगा है। ऐेसे में, शांत स्वभाव वाले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी अब थोड़ा-थोड़ा गुस्सा आ गया है। उन्होंने सीबीआई को दो टूक शब्दों में हिदायत भी दे डाली है। राजनीतिक हल्कों में इस हिदायत के अलग-अलग निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री के बाद केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने कल इसी सेमिनार में कह दिया है कि अच्छा यही रहेगा कि सीबीआई के अधिकारी महत्वपूर्ण मामलों की जांच-पड़ताल का काम और लगन से करें। ये लोग नीतियों के बदलाव के पचड़े में ज्यादा न पड़ें। क्योंकि, यह देखना सीबीआई का काम नहीं है। वित्तमंत्री ने सीबीआई के कामकाज पर प्रधानमंत्री की तरह अपनी नाराजगी दर्ज कराई। लेकिन, उन्होंने कई मामलों में इस केंद्रीय जांच एजेंसी की जमकर वाहवाही भी कर दी। सीबीआई का गठन केंद्र सरकार ने 1963 में एक प्रशासनिक आदेश से किया था। इस जांच एजेंसी ने भ्रष्टाचार के कई अहम मामलों में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, लंबे समय से इसकी विश्वसनीयता को लेकर तमाम विवाद खड़े होते रहे हैं। आरोप यही लगता है कि यह केंद्रीय एजेंसी सरकार के आकाओं के इशारे पर ही नाचती है। इन्हीं आकाओं के इशारे पर कई बार विपक्षियों पर राजनीतिक कारणों से शिकंजा कसा जाता है। ऐसे मौकों पर सीबीआई सिर्फ एक ‘हथियार’ बन जाती है।
पिछले दिनों गुवाहाटी (असम) उच्च न्यायालय की एक पीठ ने सीबीआई के गठन को ही असंवैधानिक करार किया है। इससे राजनीतिक हल्कों में खासी सनसनी फैली। एक याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस आधार पर सीबीआई के गठन को गैर-कानूनी करार किया क्योंकि, इसका गठन सरकार ने महज एक प्रशासनिक आदेश से किया था। इसके लिए कैबिनेट या संसद की कोई मंजूरी नहीं ली गई। सीबीआई अपना जांच कार्य ‘दिल्ली पुलिस स्टेब्लिस्मेंट एक्ट-1946’ के तहत आज भी करती है। इसी को आधार बना कर गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने फैसला दिया। इस निर्णय के बाद कई महत्वपूर्ण मामलों में आरोपी पक्ष ने ये दलीलें देनी शुरू कर दी थीं कि जब सीबीआई का गठन ही वैधानिक नहीं है, तो उसकी जांच के आधार पर उन्हें कैसे आरोपों के कठघरे में खड़ा किया गया है? इस तरह की कानूनी अफरा-तफरी की चुनौती खड़ी हुई, तो सरकार ने आनन-फानन इस आदेश को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करा दी।
छुट्टी वाले दिन मुख्य न्यायाधीश के घर अदालत लगी। विशेष सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायलय ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की अगली सुनवाई 6 दिसंबर को होनी है। सरकार की पहल पर भले सीबीआई को फौरी तौर पर राहत मिल गई हो, लेकिन इस प्रकरण से उसके कामकाज को लेकर तमाम हल्कों में जेर-ए-बहस खासी तेज हो गई है। सीबीआई गठन के 50 साल पूरे हुए हैं। ऐसे में, इसके स्वर्ण जयंती समारोह के मौके पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार भी आयोजित किया गया। इसका उद्घाटन करते हुए सोमवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सीबीआई के कामकाज के बारे में कई खरी-खरी टिप्पणियां कर डालीं। उन्होंने यहां तक कह डाला कि सरकार के नीतिगत मामलों में यह जांच एजेंसी सीधे हस्तक्षेप करने की कोशिश न करे। उसे अपने काम-काज की लक्ष्मण रेखा का ध्यान जरूर रखना चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि सरकारी कामकाज के दौरान किसी से कोई चूक होती है, तो उसे भ्रष्टाचार का मामला नहीं मान लेना चाहिए। बगैर, सबूतों के किसी अधिकारी के खिलाफ सीबीआई को घेरेबंदी की नीति से बाज आना चाहिए।
राजनीतिक हल्कों में यही माना जा रहा है कि जिस तरह से सीबीआई ने पिछले दिनों कोयला घोटाले की जांच के मामले में अपना दायरा पीएमओ तक बढ़ा लिया है, इससे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खुश नहीं हैं। दरअसल, 2006-09 के दौरान कोयला मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री के पास ही था। पिछले वर्षों में यह खुलासा हुआ है कि इसी कार्यकाल में कोयला ब्लॉक आवंटन में बड़े स्तर पर गोलमाल हुआ है। महालेखाकार एवं नियंत्रक (कैग) की रिपोर्ट में तो कहा गया कि इस घोटाले में 1.86 लाख करोड़ रुपए की धांधली हुई है। जब, ‘कैग’ ने इतनी बड़ी धांधली का जिक्र किया, तो राजनीतिक हल्कों में इसे ‘2जी स्पेक्ट्रम’ घोटाले से भी बड़ा करार किया गया। उल्लेखनीय है कि इस घोटाले में सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी शक के घेरे में रहे हैं। विपक्ष ने इनकी भूमिका पर तमाम आरोप लगाए हैं। यह कहा गया है कि कांग्रेस नेतृत्व ने अवैध ढंग से कोयला ब्लॉक आवंटन करके अरबों रुपए की उगाही कर ली है।
सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में इस घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है। अदालत के निर्देश के बावजूद सीबीआई ने पड़ताल की ‘स्टेटस’ रिपोर्ट केंद्र सरकार के मंत्रियों से साझा कर ली थी। इस मामले में पहले तो सीबीआई निदेशक ने झूठ बोला था। यही कहा था कि अदालत में दाखिल करने के पहले इस रिपोर्ट को किसी को नहीं दिखाया गया। लेकिन, इसी बीच मीडिया में यह खुलासा हो गया था कि अदालत में रिपोर्ट दाखिल करने के पहले इसे सीबीआई निदेशक, तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार के पास ले गए थे। इतना ही नहीं उन्होंने पीएमओ के अधिकारियों से परामर्श करने के बाद इसमें कुछ फेर-बदल भी कराए थे। इस खुलासे के बाद अदालत ने नाराज होकर इस प्रकरण में सीबीआई निदेशक से शपथ पत्र मांग लिया था। अदालत का रुख बेहद कड़ा हुआ, तो सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा ने यह स्वीकार कर लिया कि उन्होंने रिपोर्ट का मसौदा कानून मंत्री को दिखाया था। इसमें उन्होंने कुछ संशोधन भी कराए थे। जब यह सच्चाई सामने आई, तो अदालत ने सीबीआई को फटकार लगाई थी और कानून मंत्री के रवैए के प्रति भी घोर नाराजगी जताई थी। इसी के चलते कानून मंत्री अश्विनी कुमार को सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था।
इस प्रकरण को लेकर संसद से लेकर सड़क तक मनमोहन सरकार की लंबे समय तक किरकिरी भी हुई थी। ‘तोते’ वाली अदालती टिप्पणी के चलते सीबीआई ने भी लंबी फजीहत झेली है। कोयला प्रकरण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के जज सीबीआई अधिकारियों से बराबर कह रहे हैं कि जब उनकी निगरानी में वे लोग जांच कर रहे हैं, तो निर्भय होकर जांच करें। चूंकि, 2006-09 के दौरान ही कोयला ब्लॉक आवंटन में ज्यादा गड़बड़ियां हुई हैं, ऐसे में सीबीआई ने जांच के दायरे में पीएमओ को भी ले लिया है। जांच दल ने पीएमओ से कोयला आवंटन की कई फाइलें तलब कर ली हैं। ‘हिंडाल्को ग्रुप’ को ओडिशा में तलवीर कोयला ब्लॉक का आवंटन किया गया था। आरोप है कि यह फैसला पीएमओ के दबाव में आनन-फानन किया गया। इस दौर में कोयला मंत्रालय के सचिव पीसी पारेख थे। सीबीआई ने अब इस रिटायर अधिकारी को भी मामले में आरोपी बनाया है।
सीबीआई ने कहा है कि कोयला सचिव रहते हुए पारेख ने ऐसी नीतियां जानबूझकर बनाईं, जिससे ‘हिंडाल्को ग्रुप’ को अपात्र होते हुए भी कोयला ब्लॉक मिल गया। इस मामले में कानूनी पारदर्शिता नहीं बरती गई। पारेख ने अपनी सफाई में यही कहा है कि सीबीआई को नीतिगत मामलों में सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। इनके पास इसके कोई सबूत नहीं हैं कि उन्होंने इस मामले में कोई भ्रष्टाचार किया है। फिर भी, उन्हें आरोपी बनाया गया है। दरअसल, पारेख के कामकाज के बहाने सीबीआई जांच की आंच सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच रही है। ऐसे में, सीबीआई पीएमओ के निशाने पर भी आ गई है। कोयला घोटाले के इसी प्रकरण में जाने-माने उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला को भी लपेट लिया गया है। पारेख और बिड़ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से सरकार की नाराजगी सीबीआई निदेशक के खिलाफ भी बढ़ने लगी है।
दरअसल, सरकार की मुश्किल यह है कि घोटाले में कुमार मंगलम बिड़ला का नाम आने से उद्योग जगत की बड़ी लॉबी तुनक गई है। इस लॉबी ने सरकार पर दबाव बनाया है और कहा है कि यदि सीबीआई ने इस तरह से उद्योगपतियों को महज शक के आधार पर फंसाना शुरू किया, तो यहां कौन अपनी बड़ी पूंजी का निवेश करना चाहेगा? कोशिश की जा रही है कि किसी तरह से कुमार मंगलम बिड़ला का नाम इस मामले से हटा लिया जाए। लेकिन, मुश्किल यह है कि अब सीबीआई भी सरकार से ज्यादा दब नहीं रही है। उसकी एक मजबूरी भी है कि वह इस मामले में सीधे सर्वोच्च न्यायालय के लिए जवाबदेह है।
राजनीतिक हल्कों में सीबीआई के कामकाज को लेकर प्रधानमंत्री की नाराजगी को अगले लोकसभा की चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा ने अपना ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी को बनाया है। वे देशभर में बड़ी भीड़ वाली जोरदार रैलियां कर रहे हैं। मोदी की मुहिम से कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती अचानक बढ़ गई है। सरकारी हल्कों में इस आशय की बहस तेज हुई है कि कहीं अगले चुनाव में मोदी के नेतृत्व में ही सरकार न बन जाए? क्योंकि, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार काफी बदनाम हो चुकी है। राजनीतिक तौर पर भी मोदी के मुकाबले मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का राजनीतिक करिश्मा कुछ शिथिल माना जा रहा है। यह अलग बात है कि 2002 के गुजरात दंगे मोदी को लगातार परेशान कर रहे हैं। क्योंकि, उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद मुस्लिम समाज में मोदी की स्वीकार्यता नहीं हो पा रही है। फिर भी, कांग्रेस की डावांडोल स्थिति को लेकर नौकरशाही भी अवसरवादी मूड में है। माना जा रहा है कि इसी स्थिति के चलते सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा भी कांग्रेस के हुक्मरानों के दबाव में आने को तैयार नहीं हैं।
सीबीआई के कामकाज को लेकर तमाम राजनीतिक विवाद उठते रहे हैं। भाजपा नेतृत्व लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व केंद्र में समर्थन लेने के लिए सपा और बसपा जैसे दलों पर सीबीआई के जरिए दबाव बनवाता आया है। क्योंकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ सीबीआई आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों की जांच करती आई है। इसी के चलते लंबे समय तक दोनों नेताओं को काबू में रखा गया है। यह अलग बात है कि अब सीबीआई ने इन मामलों में दोनों नेताओं को ‘क्लीनचिट’ दे दी है। इस बीच सीबीआई निदेशक ने भी दबाव बनाया है कि जांच एजेंसी को पूरी तौर पर स्वायत्ता मिलनी चाहिए। ताकि, एजेंसी बगैर दबाव के काम कर सके। उन्होंने माना है कि मौजूदा व्यवस्था में सीबीआई पर राजसत्ता का कुछ न कुछ दबाव रहता है, क्योंकि अभी तक सीबीआई सरकार की प्रशासनिक मशीनरी का ही एक हिस्सा है। सीबीआई निदेशक ने कह दिया है कि जब तक इसे कानूनी स्वायत्ता नहीं मिलेगी, तब तक खांटी निष्पक्षता से काम करना मुश्किल है। इस पर प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक नाराज माने जा रहे हैं। वित्तमंत्री ने तो साफ कर दिया है कि नीतिगत मामले को देखना सरकार का काम है। फिलहाल, सीबीआई की जो प्रशासनिक व्यवस्था है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।