ये तस्वीर किसी भाजपा कार्यालय की नहीं हालांकि इस पर भाजयुमो कार्यालय लिखा जरूर है मगर असल में ये माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्विद्यालय का नोएडा कैंपस है, जहां पर पत्रकारिता के गुर सिखाये जाते हैं. उन्हें नारद से लेकर प्रभाष जोशी तक को पढ़ाया जाया जाता है. संचार और प्रोपेगेंडा, प्रसार, विज्ञापन यानी हर वो विषय जो पत्रकारिता से संबंधित है, पढ़ाया जाता है. कैंपस के प्रथम तल पर बड़ी सी लाइब्रेरी है जिसमें जनसत्ता से लेकर पाचंजन्य तक इंडियन एक्स्प्रेस से लेकर ऑब्जर्वर तक समाचार पत्र आते हैं. मैंने पढ़ाई के दौरान इच्छा जाहिर की थी कि उर्दू अखबार, रोजनामा सहारा, और हिंदी मैग्जीन कान्ति को भी कैंपस की लाईब्रेरी में मंगाना चाहिये लेकिन इसको यह कहकर टाल दिया गया था कि कल को कोई बंगाली या फिर कन्नड छात्र यहां पर अपनी भाषा के अखबार मंगाने के लिये भी आवेदन कर सकता है. हालांकि उर्दू अखबार तो कैंपस में नहीं आ पाया लेकिन कान्ति जरूर आना शुरु हो गई थी.
आज उधर से गुजर रहा था सोचा अपने प्रिय गुरु जी सूर्य प्रकाश, बीर सिंह निगम, और क्लर्क देवदत्त शर्मा से मुलाकात करता चलूं. मैं अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आज वहां पहली बार गया था. शर्मा जी से गुफ्तगू हो रही थी, बातों-बातों में मैं कहने लगा पिछले डेढ़ सालों में काफी कुछ बदल गया है. कैंपस की गाड़ी खड़ी करने के लिये गैराज भी बन गया है. पता चला कि ये गैराज नहीं है यह पहले कैंटीन हुआ करती थी लेकिन अब ये भाजयुमो का कार्यालय है. मैं चौंका कुछ छात्र और प्रोफेसर ही संघ और भाजपा का राग अलापा करते थे मगर कार्यालय नहीं हुआ करता था. लेकिन अब तो बाकायदा कार्यालय बनाकर यह साबित कर दिया गया कि माखनलाल विवि केवल संघ के लिये कैडर तैयार करने का काम कर रहा. जाहिर है किसी नेता का तो सिर्फ एक क्षेत्र विशेष तक ही प्रभाव रहता है मगर पत्रकार का लिखा हुआ तो दुनिया भर में फैल जाता है. जब रोज सुबह बिहार के सीवान से, झारखंड के धनबाद, बंगाल के नागपाड़ा, यूपी के गोरखपुर से स्टूडेंट उस कॉलेज में पढ़ने के लिये आयेगा जिसमें भाजपा का प्रचार, प्रसार किया जाता हो वह भविष्य में क्या गुल खिलायेगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. क्या वह भविष्य में संघी पत्रकार, बलदेव भाई शर्मा, एस शंकर, आदी की जगह नहीं लेगा ?

मुझे आपत्ति भाजपा के कार्यालय पर नहीं है बल्कि आपत्ति इस बात पर है कि ज्ञान के मंदिर में राजनीति के राक्षस को क्यों खड़ा किया गया? भाजपा की सोच से कोई हो जो वाकिफ ना हो. एक विशेष समुदाय के खिलाफ इसके नेता किस तरह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और किन शब्दों का इस्तेमाल उस समुदाय के संबोधन के लिये करते हैं वह आये दिन समाचार माध्यमों से पता चलता रहता है. ऐसे में इस कैंपस में भाजपा का कार्यालय होना माखनलाल विवि के कुलपति को सवालों के दायरे में लाकर खड़ा करता है और इस कैंपस से निकलने वाले छात्रों की निष्पक्ष पत्रकारिता पर भी सवालिया निशान लगाता है. अगर शिवराज सरकार ने हाल फिलहाल में कोई ऐसा कानून बना डाला है कि पार्टी कार्यालय कैंपस में भी होगा तो फिर एक पार्टी का ही कार्यालय क्यों खुलवाया गया। बाकी पार्टियों के कार्यालयों के लिये भी जमीन और हॉल का इंतजाम क्यों नहीं किया गया? और उन छात्रों को जिनकी सोच भाजपा की विचारधारा से अलग है उनको कैंपस से बाहर क्यों नहीं किया गया.
छींकने की बीमारी तक के इलाज का विज्ञापन अखबारों में देने वाली सरकार ने यह विज्ञापन क्यों नहीं जारी किया कि अब माखनलाल पत्रकारिता विवि में भाजपा की विचारधारा को भी कोर्स के रूप में शामिल किया गया है और जो बच्चा इस पाठयक्रम को नहीं पढ़ेगा उसे कैंपस से बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा या यह कोई नई तकनीक ईजाद की है युवाओं को ब्रेन वॉश करने की. इसका जवाब तो कैंपस के जिम्मेदारों, और ईमानदारी और सुशासन का ढोल पीटने वाले भाजपाइयों, और इसके संघी प्राध्यापकों जो माखनलाल में कार्यरत हैं उन्हें देना ही होगा. कि तुम यहां पर मोटी मोटी फीस वसूल कर छात्रों को पत्रकार बना रहे हो या भाजपा और संघ परिवार के कैडर तैयार कर रहे हो?
लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार और मीडिया एक्टिविस्ट हैं.