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मध्य प्रदेश

दिग्विजय गुट से मप्र कांग्रेस फिर भंवर में

मध्यप्रदेश कांग्रेस में इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा. 10 वर्षों के दिग्विजयी शासन को प्रदेश की आम जनता याद करना नहीं चाहती उस पर से दिग्विजय गुट के नेता कांग्रेस की बुरी गत करने से बाज नहीं आ रहे. यूं तो प्रदेश में दिग्विजय सिंह का गुट बहुत बड़ा माना जाता है किन्तु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और उज्जैन सांसद प्रेमचंद गुड्डू दिग्विजय सिंह के ख़ास सिपहसालारों की भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र कांग्रेस में हुए टिकट वितरण के चलते विरोध के स्वर अधिक मुखरता से सामने आए हैं और सभी में कमोबेश खलनायक की पदवी भूरिया और गुड्डू को दी जा रही है जो सीधे-सीधे दिग्विजय सिंह के पठ्ठे हैं. यानि दिग्विजय सिंह की शह से दोनों ही नेता प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर करने की नीति पर काम कर रहे हैं. 
मध्यप्रदेश कांग्रेस में इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा. 10 वर्षों के दिग्विजयी शासन को प्रदेश की आम जनता याद करना नहीं चाहती उस पर से दिग्विजय गुट के नेता कांग्रेस की बुरी गत करने से बाज नहीं आ रहे. यूं तो प्रदेश में दिग्विजय सिंह का गुट बहुत बड़ा माना जाता है किन्तु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और उज्जैन सांसद प्रेमचंद गुड्डू दिग्विजय सिंह के ख़ास सिपहसालारों की भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र कांग्रेस में हुए टिकट वितरण के चलते विरोध के स्वर अधिक मुखरता से सामने आए हैं और सभी में कमोबेश खलनायक की पदवी भूरिया और गुड्डू को दी जा रही है जो सीधे-सीधे दिग्विजय सिंह के पठ्ठे हैं. यानि दिग्विजय सिंह की शह से दोनों ही नेता प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर करने की नीति पर काम कर रहे हैं. 
 
2003 में प्रदेश की सत्ता से बेदखल हुए दिग्विजय सिंह ने 10 वर्षों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने की कसम तो खा ली थी किन्तु सर्वेसर्वा होने का कथित नशा उन्हें वास्तव में राजनीति से दूर नहीं कर पाया. इसलिए ठाकुर दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु स्व. अर्जुन सिंह की भांति खुद को चाणक्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए अपने सिपहसालारों द्वारा प्रदेश कांग्रेस को बंधक बनाते हुए उसे नेस्तनाबूत करने की ठान ली. यह ठीक वैसा ही है जैसे हम नहीं तो कोई नहीं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के फॉर्मूले से इतर प्रदेश के सभी बड़े नेताओं ने अपने समर्थकों को टिकट बंटवाए. यहां तक तो ठीक है. सभी बड़े नेता चाहते हैं कि अपने समर्थकों को अधिक से अधिक टिकट दिलवाए जाएं ताकि उनका खुद का राजनीतिक कद भी ऊंचा हो किन्तु भूरिया और गुड्डू ने जिस तरह टिकट वितरण में हस्तक्षेप किया और अपने पसंदीदा समर्थक को टिकट दिलाए, उससे कांग्रेस में बागी उम्मीदवारों की संख्या में भी इजाफा हुआ. भूरिया अपनी भतीजी कलावती भूरिया को बागी बनने से नहीं रोक पाए तो गुड्डू ने महिदपुर से कांग्रेस विधायक और वर्तमान प्रत्याशी कल्पना परुलेकर के खिलाफ अपने खास समर्थक दिनेश जैन बोस को बागी बनवा दिया. 
 
भूरिया की राजनीतिक मजबूरियों को आप और हम अच्छी तरह पहचानते हैं इसलिए इस बार भूरिया को माफ करते हुए गुड्डू की कारस्तानियों पर प्रकाश डालते हैं. उज्जैन लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली हर विधानसभा में गुड्डू ने जमकर बागियों को उकसाने का काम किया है और जहां बागी कांग्रेस आलाकमान के आगे झुके, वहां गुड्डू ने कमजोर प्रत्याशी को टिकट दिलवाकर बाकी कसर पूरी कर दी. गुड्डू को लेकर सबसे बड़ा आरोप खुद उन्हीं की पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता नूरी खान ने लगाया है. नूरी खान का कहना है कि गुड्डू उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में भाजपा से हाथ मिलाकर कांग्रेस को कमजोर करने का काम कर रहे हैं. यह इससे भी साबित होता है कि उज्जैन में हुए नगर निगम चुनाव के वक़्त भी गुड्डू ने महापौर पद के लिए भाजपा प्रत्याशी रामेश्वर अखंड के मुकाबले अपेक्षाकृत कमजोर दीपक मेहरे को कांग्रेस प्रत्याशी बनवाया और जब नगर निगम चुनाव परिणाम घोषित हुए तो रामेश्वर अखंड करीब 48 हज़ार से अधिक वोटों से जीते. ऐसा नहीं है कि उज्जैन में कांग्रेस के पास मजबूत चेहरा नहीं था, किन्तु गुड्डू की ज़िद के चलते उज्जैन नगर निगम कांग्रेस के हाथ से जाता रहा. फिर गुड्डू को इस तिकड़मबाजी में दिग्विजय सिंह का साथ न मिला हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. 
 
खैर, उज्जैन नगर निगम चुनाव को भूल भी जाएं तो उज्जैन उत्तर और उज्जैन दक्षिण विधानसभा सीटों पर भी गुड्डू की ही चली है और इसमें दिग्विजय सिंह की मूक सहमति से इंकार नहीं है. 2008 में कांग्रेस से बागी होकर लड़े जयसिंह दरबार को एक बार पुनः उज्जैन दक्षिण से कांग्रेस उम्मीदवार घोषित किया गया है. अव्वल तो दरबार का प्रत्याशी बनना राहुल फॉर्मूले से मेल नहीं खाता, ऊपर से दरबार ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी योगेश शर्मा 'चुन्नू' की जमानत जब्त करवाने में महती भूमिका निभाई थी. वहीं उज्जैन उत्तर से गुड्डू ने अपने ख़ास समर्थक विक्की यादव को टिकट दिलवाकर एक तरह से सीट भाजपा को तोहफे में दे दी है. विक्की यादव को उज्जैन दक्षिण के मतदाता तो क्या, खुद उनके मोहल्ले के वाशिंदे भी ठीक ढंग से नहीं पहचानते. पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष विक्की यादव की राजनीतिक उड़ान अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि उन्हें विधानसभा का टिकट मिल गया. अब आप खुद भी अंदाजा लगा सकते हैं कि विक्की उज्जैन दक्षिण से कितना चौंकाते हैं. 
 
इन सबके इतर सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने जिस तरह आलोट विधानसभा क्षेत्र से खुद के बेटे अजीत बौरासी का टिकट करवाया, उससे आलाकमान तक नाराज है. ऐसी सूचनाएं हैं कि आलोट में पूर्व में प्रस्तावित सोनिया गांधी की सभा रद्द हो चुकी है और उज्जैन उत्तर-दक्षिण को मिलाकर होने वाली राहुल गांधी की सभा भी विंध्य क्षेत्र को मिल गई है. गुड्डू लाख दुहाइयां दें कि उन्होंने पार्टीलाइन से हटकर कोई गलत काम नहीं किया मगर मीडिया की सक्रियता ने गुड्डू की चालबाजी को उजागर कर दिया है. यहां गौर करना होगा कि उज्जैन उत्तर-दक्षिण में दिग्विजय सिंह की सभा का कार्यक्रम बन चुका है और ऐसा अनुमान है कि गुड्डू अब दिग्विजय सिंह को आलोट भी ले जा सकते हैं. चूंकि गुड्डू ने अपने किए से पार्टी के तमाम बड़े नेताओं को रुष्ट किया है इसलिए न तो कोई नेता गुड्डू समर्थित उम्मीदवारों के क्षेत्र में सभा करना चाहता है और न ही इन बड़े नेताओं के समर्थक गुड्डू समर्थित उम्मीदवारों के क्षेत्र में प्रचार करना चाहते हैं. कुल मिलाकर गुड्डू के विरोध में पूरी पार्टी एकजुट नज़र आ रही है. नूरी खान ने तो बाकायदा गुड्डू से खुद की जान को खतरा तक बता दिया है और गुड्डू के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए उनका डर स्वाभाविक भी है. 
 
गुड्डू का विधानसभा चुनाव के बाद हाशिये पर जाना तय है क्योंकि उनके समर्थित उम्मीदवारों में जीतने का माद्दा ही नहीं है और रही-सही कसर गुड्डू से नाराज कांग्रेसी कर ही देंगे. गुड्डू निशाने पर हैं पर अब तो इंतजार है दिग्विजय सिंह के दांव का क्यूंकि गुड्डू जब-जब मुसीबत में पड़े हैं, दिग्विजय सिंह ने ही उनकी डूबती नैया पार लगाई है.
 
लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम पत्रकार हैं.
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