Panini Anand : आज मेरी आजी (पिता की मां) का हमारे पैतृक गांव- परसदेपुर, रायबरेली में देहांत हो गया. वो 106 बरस की थीं. उनका जाना एक सदी का खामोश हो जाना है. मुझे उनका विशेष स्नेह हमेशा मिला क्योंकि बचपन से पूजा-पाठ और कर्मकांड में विशेष ध्यान रहता था मेरा. मेरे कान में सोने की जो पहली बाली पड़ी वो आजी ने ही बनवाई थी. मेरे बढ़े बालों और दाढ़ी को देखकर वो आखिर तक यह समझती रहीं कि मैं महंत ही बनूंगा. उनको समझा नहीं पाया कभी कि इंसान बनना सबसे मुश्किल काम है. लड़कों के लिए जो स्नेह उनके मन में था, लड़कियों के लिए नहीं रहा. न मेरी मां के प्रति, जो कि एक ब्राह्मण परिवार में आई क्षत्रिय महिला हैं. नाती परनाती, पोते-परपोते खिलाते चली गईं.
अंतिम दिन अकेलेपन और अपनों की उपेक्षा में बीते. जो ब्राह्मणी की नाड़ी से पैदा हुए थे, उन्होंने अपनी ही मां की सेवा को भार समझा. हम तो ख़ैर ठकुराइन के पेट से पैदा हुए इसलिए हमें कुछ करने नहीं दिया गया. मेरे पिता समाजवादी थे और विद्रोही भी. ब्राह्मणों के मठ के सारे नियम तोड़ना उनको मज़ा देता था. फिर भी, मां का प्यार सबसे ज़्यादा मेरे पिता के प्रति ही रहा. वो जबतक रहे, उनकी मां महारानी की तरह रहीं. मजाल है कि वो कुछ कहें और वैसा न हो. फिर मेरे पिताजी नहीं रहे तो उनकी मां का वो स्थान भी जाता रहा. आजी जिस घाट आई थीं, उसी घाट गईं. डलमऊ की दक्षिणायनी गंगा के तीरे ही मेरे बाबा की चिता शांत हुई. वहीं 1999 में मेरे पिता का शरीर वापस प्रकृति में विलीन हुआ. आज उसी घाट आजी भी जा रही हैं. इसी गंगा के तीरे ही कल्पवास के दौरान मेरे पिता को जन्म दिया था उन्होंने. अपने पैतृक परिवार से जिस एक कड़ी ने मुझे जोड़े रखा, वो आज टूट गई. आजी का जाना कष्टकर है. आज दिल्ली काट रही है. चाह कर भी नहीं पहुंच सकता तुरंत वहां, जहां पीढ़ियां मुक्त होती आई हैं हमारी. उन्हें अंतिम प्रणाम.
आउटलुक अंग्रेजी मैग्जीन में कार्यरत पत्रकार पाणिनी आनंद के फेसबुक वॉल से.






