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बात-बात पर मेरा रोना और शंभूजी का यूं ही छेड़ना : संजय सिन्हा

शंभूनाथ शुक्ल : संजय सिन्हा आज तक न्यूज चैनल के बड़े पत्रकार हैं। जनसत्ता के दिनों में वे साथ काम करने आए। तब वो जिस तरह के परिवार से आए थे, ऐसे परिवार तब भी हिंदी में दुर्लभ थे। उनके पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, उनके चाचा का अपना शिपिंग का मुंबई में कारोबार, उनके मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक और उनके दादा को राय बहादुर का खिताब मिला था, जो अंग्रेजों के वक्त में कानपुर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे। एक ऐसे परिवार से आया लड़का, जिसकी खुद की शिक्षा विदेशों से हुई हो हिंदी में काम करने लगे, तो अटपटा तो लगता ही था।

शंभूनाथ शुक्ल : संजय सिन्हा आज तक न्यूज चैनल के बड़े पत्रकार हैं। जनसत्ता के दिनों में वे साथ काम करने आए। तब वो जिस तरह के परिवार से आए थे, ऐसे परिवार तब भी हिंदी में दुर्लभ थे। उनके पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, उनके चाचा का अपना शिपिंग का मुंबई में कारोबार, उनके मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक और उनके दादा को राय बहादुर का खिताब मिला था, जो अंग्रेजों के वक्त में कानपुर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे। एक ऐसे परिवार से आया लड़का, जिसकी खुद की शिक्षा विदेशों से हुई हो हिंदी में काम करने लगे, तो अटपटा तो लगता ही था।

संजय सिन्हा तब भी एक सितारा थे और आज भी। पर यही संजय सिन्हा जब इस नाचीज को याद करें तो अच्छा लगता है। संजय सिन्हा आज भी अपना बाल हठ नहीं भूल पाए। जब वे मेरे सहकर्मी थे तब मैं उन्हें मित्र, पुत्र और गुरु भी मानता था। आज भी संकट में फंसता हूं तो संजय सिन्हा से ही राय मांगता हूं। और आप लोग अब तक तो जान ही गए होंगे कि मैं संकट में फंसता नहीं बल्कि संकट न्यौतता रहता हूं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


Sanjay Sinha : किसी भी व्यक्ति के बारे में क्षणांश को ही आप विस्तार मान लें तो आदमी को समझने में चूक हो जाती है। और 1988 में शंभूनाथ शुक्ल सेे मेरी मुलाकात में ये चूक मुझसे हो सकती थी, अगर क्षणांश को ही मैंने संपूर्ण मान लिया होता। उन्होंने मेरी ढेर सारी सहेलियों को एकबार रेह़ड़ कहा था, जिन्हें मैं आईआईएमसी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन) से महीने भर की ट्रेनिंग पर जनसत्ता ले आया था। क्योंकि मुझे आईआईएमसी में एडमिशन से पहले ही जनसत्ता में नौकरी मिल गई थी इसलिए अपने बैच की ढेर सारी लड़कियों को ट्रेनिंग दिलाने का जिम्मा मैंने उठाया था।

शंभूनाथ शुक्ल जिन्हें आगे मैं शंभूजी के नाम से संबोधित करूंगा, ने मजाक या दुलार में उन लड़कियों को रेहड़ कहा था। लड़कियां मेरी दोस्त थीं, इसलिए मुझे बुरा लगना ही था। उस क्षणिक भावुकता में मैं चला गया था जनसत्ता के स्थानीय संपादक बनवारी (जी) के पास। बनवारी की चर्चा मैं चाहूं तो अलग से कर सकता हूं और शायद कभी आगे करूंगा भी, लेकिन अभी बस उतना ही जितने की दरकार है। बनवारी ने मुझे अपने पास बिठाया और बहुत नपे तुले अंदाज में समझाया कि आंखों के लेंस पर अगर भावनाओं की गर्द जमा हो जाए तो सत्य, सत्य नहीं रह जाता। उन्होंने ये भी कहा कि तुम हफ्ता भर और शंभूजी के साथ काम करो, फिर बताना।

हफ्ता बीत गया। मैंने इस एक हफ्ते में महसूस किया कि किसी को जानने के लिए सचमुच भावना भरे लेंस उतार देने चाहिए। मैंने लेंस उतार कर शंभूजी के साथ तालमेल बिठाना शुरु किया, और यकीन मानिए इस हफ्ते भर में शंभूजी बदल गए, मैं बदल गया या सत्य को परखने का नजरिया बदल गया।

तीन बेटियों के पिता शंभूजी ने एकदिन मुझसे कहा कि तुम मेरे पुत्र के समान हो, और मैंने मजाक में कहा कि ऐसे में तीन-तीन बेटियों के दहेज का जुगाड़ तो मुझे ही करना होगा। शंभूजी हंसते हुए कहते, और उसके बाद जो बचेगा वो तो तुम्हारा ही होगा। अब एक पत्रकार के पास तीन-तीन बेटियों के ब्याहने के बाद बचना क्या है, मैं उन्हें अक्सर छेड़ता। लेकिन शंभूजी विचलित नहीं होते। वो उन लोगों में शुमार हैं, जो सफर को मंजिल मानते हैं। इसलिए जिंदगी भर फक्कड़ी करते हुए भी आज शंभूजी से ज्यादा खुश और मस्त कोई पत्रकार मुझे नजर नहीं आता। वो पत्रकार भी नहीं जिन्होंने शंभूजी के साथ शायद कभी लुंगी तक साझे में खरीदी होगी, और हो सकता है कि आज उनके ड्राइवर की आर्थिक हैसियत भी शंभूजी से ज्यादा हो। कहने का मतलब बस इतना ही कि शंभूजी कुछ हजार रुपयों की नौकरी में खाते रहे और हमे खिलाते रहे। थोड़ी बहुत कमाई की भी वो सोच पाए होते तो यकीनन कमसे कम दिल्ली में दो कमरे का फ्लैट तो होता ही, ना कि गाजियाबाद में। खैर मेरा कद छोटा है ऐसी बातें कहने और करने के लिए।

हां, तो शंभूजी के लिए ये संभव था कि वो दो-दो संजयों को एक साथ साधे हुए चलते रहे- जिनके बारे में उन्होंने खुद लिखा है कि प्रभाष जोशी कहा करते थे कि आप सिंह बंधुओं को अपने साथ लेकर चल रहे हैं। ये सच है कि शंभूजी के नहीं होने पर हम दोनों संजय अक्सर ऐसा वैसा बवाल काट सकते थे जिसकी सफाई देते-देते वो बेचारे परेशान हो जाते होंगे। ऐसी ही एक कड़ी में एकबार मैंने और संजय सिंह ने पटना के जनसत्ता संवाददाता सुरेंद्र किशोर से कुछ ऐसा कह दिया था कि प्रभाष जोशी को दिल्ली के सुंदरनगर वाले एक्सप्रेस गेस्टहाउस में बैठक बुलानी पड़ी थी। बैठक में हम दोनों संजयों को नया खलीफा कहा गया था, और तुर्रा ये कि हम दोनों संजय सीना चौड़ा करके वहीं खाना खाए और वापसी भी हमने प्रभाष जोशी की फिएट एन ई कार में की।

खैर, इन बातों का लेखा-जोखा कभी जनसत्ता पुराण में होगा। अभी तो शंभूजी की बात।

अमिताभ बच्चन के रूप में मुझे मां पहले ही मिल गई थी, संजय सिंह के रूप में बड़ा भाई मिल ही चुका था अब पिता के रूप में शंभूजी साथ थे। लेकिन इस पिता के साथ मेरे रिश्ते अजीब से थे। कभी रूठना कभी मनाना। बात-बात पर मेरा रोना और शंभूजी का यूं ही छेड़ना। बहुत से दिन कटते चले गए। और एकदिन मैं जनसत्ता छोड़कर ज़ी न्यूज़ चला गया। शंभूजी चंडीगढ़ में जनसत्ता के संपादक बन कर चले गए। एकदिन मेरा और संजय सिंह का परिवार शंभूजी से मिलने चंडीगढ़ पहुंच गया। शंभूजी ने खूब खातिर की। और एकदिन हमने कहा शंभूजी कहीं बटेर खाने को मिल जाए तो मजा आ जाए। और विश्वास कीजिए….उसी शाम पता नहीं कहां से शंभूजी ने पतीला भर पका हुआ बटेर हमारे होटल में भिजवा दिया। हम छक कर बटेर खाए और बहुत सारा जो बच गया उसे अगले दिन लेकर दिल्ली भी चले आए।

यही शंभूजी जब चंडीगढ़ से कोलकाता जनसत्ता के स्थानीय संपादक बन कर गए तो दो बार उनसे मिलने मैं कोलकाता गया। मजेदार बात ये है कि शंभूजी से मिलने एक बार तो मैं शंभूजी के साथ ही गया, दूसरी बार अकेला। शंभूजी मुझे लेने एयरपोर्ट आए थे। मुझे याद है कि उसके अगले दिन कोलकाता बंद की अपील ममता बैनर्जी ने की थी। शंभूजी मुझे घर में आराम करने को कह कर खुद दफ्तर चले गए थे। मैं काफी देर तक सोता रहा, और जब जागा तो हैरान रह गया। शंभूजी अपने हाथों से मेरे लिए गोभी की सब्जी और चावल बनाकर दफ्तर गए थे। मैं पूरा खाना खा गया, शायद उनका हिस्सा भी। फिर मैंने वहीं टीवी पर शाहरुख खान की फिल्म डर देखी और उसके बारे में सोचता रहा। सोचता रहा शाहरुख से 1988 में हुई अपनी मुलाकात के बारे में…इस पर भी बात करेंगे लेकिन आगे। अभी तो पूरा शहर बंद था। सारे होटल बंद थे। शंभूजी रात में आए तो मेरी तबीयत जरा खराब थी। मैं लेटा हुआ था। शंभूजी ने आते ही कहा, " यार पूरा शहर बंद है। चलो फिर भी कहीं खाने की तलाश करते हैं।" दफ्तर की कार उनके पास थी, ड्राइवर था। मुझे कार में पीछे लिटा कर शंभूजी खुद आगे बैठे और पूरा कोलकाता हमने छान मारा। शायद कहीं कुछ जुगाड़ हुआ था, और अगली सुबह मैं दिल्ली के लिए उड़ चुका था।

दो दिनों बाद मुझे अमेरिका जाना था, मैं अमेरिका चला गया। लेकिन शंभूजी के संपर्क में रहा। कई बार शंभूजी मुझसे राय मांगते। मुझे जो सूझता कह देता, और ऐसे ही अपने किसी साथी से कोई धोखा खाने के बाद शंभूजी ने मुझसे पूछा था कि अब क्या किया जाना चाहिए? मैंने मेल पर उन्हें लिखा था- धोखा देने से धोखा खाना बेहतर होता है। धोखा खाने में तो आपका जरा सा नुकसान हो सकता है, लेकिन धोखा देने पर आपकी आत्मा मर जारी है। शंभूजी ने इस लाइन को बार बार दुहराते हुए मुझसे मेल पर कहा था, यार जिसने मुझे धोखा दिया है आज तुम्हारे कहने पर मैं उसे माफ कर देता हूं।

लेकिन मुझे पता है कि शंभूजी न जाने कितनी बार धोखा खाते रहे हैं और धोखा देने वालों को माफ करते रहे हैं, मेरे कहने के पहले भी और बाद में भी। और जो ये सब कर पाता है वही सुख की नींद सोता है, जब मन होता है लोटा कंबल लेकर हिमालय पर जा सकता है, और बेखौफ हो कर कौरवों की विक्रमी सेना से लोहा ले सकता है। हिमालय के शिखर से भी ज्वालामुखी का उद्रेक कर सकता है – उम्र के 59वें बसंत पर भी।

आजतक में कार्यरत संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.


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