थानाध्यक्ष गोमतीनगर, लखनऊ ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज के विरुद्ध दो विधि स्नातकों द्वारा अपने पद और स्थिति का पूर्णतया नाजायज़ फायदा उठाते हुए यौन उत्पीडन करने के आरोपों के सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रार्थनापत्र पर एफआइआर दर्ज काटने से मना कर दिया. उन्होंने मात्र शिकायती प्रार्थनापत्र रसीद संख्या 28310 दिया.
अतः अब डॉ ठाकुर ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत एफआइआर दर्ज करने और सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य में हाल में दिए गए निर्णय का घोर उल्लंघन करते हुए एफआइआर दर्ज नहीं करने के सम्बन्ध में एसओ गोमतीनगर पर कार्यवाही किये जाने की मांग की है.
एफआइआर के अनुसार एक सामाजिक कार्यकर्ता और नेशनल ला यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही विधि छात्रा की माँ के रूप में वह यह अपना दायित्व समझती हैं कि ऐसे गंदे लोगों के इन घिनौने कृत्यों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज कराएं ताकि इसमें आगे कानूनी कार्यवाही हो सके.
नीचे डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा एफआइआर तथा एसएसपी को दिये पत्र की कॉपी दी जा रही है.
सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
जनपद लखनऊ,
उत्तर प्रदेश
विषय- धारा 154(3) सीआरपीसी में एफआइआर दर्ज करने हेतु
महोदय,
कृपया निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या- NT/SC/Judge/01 दिनांक-15/11/2013 द्वारा कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा पिछले साल 24/12/2012 को दिल्ली के एक होटल के कमरे में दुराचार करने तथा आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा से एक अवकाश प्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाये जाने के परिप्रेक्ष्य में इन्हें अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य होने के नाते एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, लखनऊ को प्रार्थनापत्र दिया था. मैंने मा० सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 के आवश्यक अंशों को प्रस्तुत करते हुए उसके अनुक्रम में तत्काल एफआइआर दर्ज कर इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने हेतु निवेदन किया था.
थानाध्यक्ष गोमतीनगर द्वारा इस सम्बन्ध में मा० सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एफआइआर दर्ज नहीं किया गया और मात्र “उत्तर प्रदेश पुलिस प्राप्ति रसीद शिकायती प्रार्थनापत्र” क्रम संख्या 28310 मुझे दे दिया जो स्पष्टतया मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है.
अतः मैं यह पत्र आपके सम्मुख धारा 154(3) सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत थानाध्यक्ष गोमतीनगर को प्रस्तुत प्रार्थनापत्र की प्रति (संलग्नक तथा रसीद सहित) इस अनुरोध से प्रेषित कर रही हूँ कि कृपया तत्काल विधि के अनुसार इस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज करा कर अग्रिम कार्यवाही कराया जाना सुनिश्चित करें. साथ ही मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त आदेश का उल्लंघन करने के सम्बन्ध में थानाध्यक्ष गोमतीनगर के विरुद्ध कार्यवाही किया जाना भी सुनिश्चित करें.
पत्र संख्या- NT/SC/Judge/02
दिनांक-15/11/2013
भवदीय, (डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
94155-34525
सेवा में,
थानाध्यक्ष,
थाना गोमतीनगर,
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
विषय- मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य में पारित निर्णय के आलोक में पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध यौन उत्पीडन का एफआइआर दर्ज करने हेतु
महोदय,
कृपया निवेदन है कि दिनांक 06/11/2013 को जर्नल ऑफ इंडियन ला एंड सोसायटी के वेबसाईट पर Through my Looking Glass नामक एक लेख छपा (http://jilsblognujs.wordpress.com/2013/11/06/through-my-looking-glass/) जो इसी साल कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा लिखा गया था. कालांतर में दिनांक 11/11/2013 को यह लेख लीगली इंडिया नामक एक अन्य वेबसाईट तथा अन्य समाचारों के माध्यम से पूरे देश में प्रसारित हुआ.
इस लेख के अनुसार इस युवा महिला विधि इंटर्न के साथ हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज ने पिछले साल दिसंबर में एक होटल के कमरे में उस समय दुराचार किया जब राजधानी सामूहिक दुष्कर्म की घटना से जूझ रही थी. जज पर यह आरोप लगने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की कमेटी का गठन भी कर दिया है. लेख के अनुसार वह दिल्ली में उस समय यूनिवर्सिटी के अंतिम वर्ष के शीतकालीन अवकाश के दौरान में इंटर्न थी और अंतिम सेमेस्टर के दौरान अत्यधिक प्रतिष्ठित, हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के जज के तहत काम कर रही थी. लेख में स्पष्ट लिखा है- “मेरी कथित कर्मठता के पुरस्कार के रूप में मुझे यौन उत्पीड़न (शारीरिक नुकसान नहीं मगर हनन करने वाले) से एक वृद्ध व्यक्ति ने पुरस्कृत किया, जो मेरे दादा की उम्र का था. मैं उस पीडादायक विवरण का जिक्र नहीं करूंगी लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि कमरे से बाहर निकलने के काफी बाद तक मेरी स्मृति में वह अनुभव रहा और वास्तव में आज भी है.” सुश्री स्टेला ने "लीगली इंडिया" वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में पुनः आरोप लगाया कि दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज ने होटल के कमरे में उसके साथ दुराचार किया और इस घटना का कोई अन्य गवाह भी नहीं है. इस महिला ने अपने मूल लेख में हादसे में इस घटना की तारीख का जिक्र नहीं किया, लेकिन वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पिछले साल 24 दिसंबर को हुआ था.
इसके अतिरिक्त आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा ने एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. फेसबुक पर प्रस्तुत इस टिप्पणी को लीगली इंडिया वेबसाईट ने प्रस्तुत किया है, यद्यपि लीगली इंडिया में दोनों रिपोर्ट लिखने वाले कियान गैन्ज़ ने इस दूसरी विधि छात्रा का नाम नहीं लिखा है. लीगली इंडिया के अनुसार- “she was “at the receiving end of unsolicited sexual advance more than once”. Both the interns knew each other, the report claimed.” (अर्थात यह छात्रा कई बार अवांछनीय यौन शोषण की शिकार हुई. ये दोनों विधि छात्रा एक दुसरे को जानती भी हैं).
मैं इस सम्बन्ध में आवश्यक अभिलेख साक्ष्य हेतु संलग्न कर रही हूँ. साथ ही चूँकि ये सीधे-सीधे अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य हैं अतः सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु यह प्रार्थनापत्र प्रस्तुत कर रही हूँ. मैं यह एफआइआर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में ही नहीं एक विधि की छात्रा तनया की माँ के रूप में भी प्रस्तुत करना अपना आवश्यक फर्ज और उत्तरदायित्व समझती हूँ जो इन्हीं बच्चियों की तरह एक नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही है और इन्हीं की तरह कई स्थानों पर इंटर्न बनेगी, क्योंकि मैं इन दोनों बच्चियों में अपनी बेटी तनया को देखती हूँ और मुझे इस बात से ही रौंगटे खड़े हो जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त जज छोटी बच्चियों के साथ इस प्रकार की अत्यंत घिनौनी हरकत कर रहे हैं और कार्यवाही के नाम पर एफआइआर दर्ज कर उन पूर्व जजों को सलाखों के पीछे करने के बजाय मात्र जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है.
जैसा कि क़ानून का नियन है, जांच अपनी जगह होती रहेगी लेकिन इन दोनों मामलों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किया जाना अत्यंत आवश्यक है और मैं, एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में यह प्रार्थनापत्र तत्काल एस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किये जाने हेतु प्रस्तुत कर रही हूँ.
चूँकि ये दोनों घटनास्थल आपके थाना क्षेत्र के नहीं हैं, अतः साथ ही यह भी निवेदन करती हूँ कि इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने की कृपा करें.
अंतिम बात मैं यह कहना चाहूंगी कि आप अवगत होंगे कि मा० सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 में यह स्पष्ट कर दिया है कि अब प्रत्येक थाने को प्रत्येक संज्ञेय अपराध में एफआइआर आवश्यक रूप से तत्काल पंजीकृत किया जाना आवश्यक है और ऐसा नहीं करने पर संबधित थानाध्यक्ष व्यक्तिगत रूप से कार्यवाही किये जाने के हकदार होंगे. मैं सुलभ सन्दर्भ हेतु इस निर्णय के आवश्यक भाग को भी संलग्न कर रही हूँ.
तदनुसार कृपया उक्त प्रार्थनापत्र और संलग्न अभिलेखों के आधार पर तत्काल उचित धाराओं में दोषी अभियुक्तों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कर अग्रिम विवेचना एवं आवश्यक कार्यवाही कराये जाने की कृपा करें.
पत्र संख्या- NT/SC/Judge/01
दिनांक-15/11/2013
भवदीय,
(डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
94155-34525