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भारतीय खून में ही है साफ-सफाई को लेकर बेपरवाही

स्कूलों-कॉलेजों, संस्थाओं-संगठनों-पार्टियों में 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया गया. यह दिवस छोटे-बड़े सबको पता है, शायद जागरूकता की वजह से लेकिन इसके ठीक अगले दिन यानी शुक्रवार को ‘अंतर्राष्ट्रीय हाथ धुलाई दिवस’ भी था, यह किसी को नहीं मालूम क्योंकि इसे लेकर लोगों को जागरूक करने की कभी कोई आवश्यकता ही नहीं समझी गई. ऐसे में इसको लेकर कार्यक्रम-गोष्ठी या रैली की उम्मीद भी बेमानी है. इन दोनों दिवसों के फायदे-नाफायदे की बात करें तो बच्चों के लिये बाल दिवस से भी महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय हाथ धुलाई दिवस था.
स्कूलों-कॉलेजों, संस्थाओं-संगठनों-पार्टियों में 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया गया. यह दिवस छोटे-बड़े सबको पता है, शायद जागरूकता की वजह से लेकिन इसके ठीक अगले दिन यानी शुक्रवार को ‘अंतर्राष्ट्रीय हाथ धुलाई दिवस’ भी था, यह किसी को नहीं मालूम क्योंकि इसे लेकर लोगों को जागरूक करने की कभी कोई आवश्यकता ही नहीं समझी गई. ऐसे में इसको लेकर कार्यक्रम-गोष्ठी या रैली की उम्मीद भी बेमानी है. इन दोनों दिवसों के फायदे-नाफायदे की बात करें तो बच्चों के लिये बाल दिवस से भी महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय हाथ धुलाई दिवस था.
 
अब चूंकि प्राथमिक व मिडिल स्कूलों के टीचर्स को भी इस दिवस के बारे में नहीं मालूम तो वे अपनी तरफ से क्या पहल करें. उनका काम बीआरसी से मिले निर्देशों का पालन करना व बाकी समय अपनी मांगें मनवाने के लिये आंदोलन तक सीमित है. यहां टीचरों की बात इसलिये की क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय हाथ धुलाई दिवस घोषित करते समय इसे स्कूलों में ही बतौर अभियान चलाने का प्लान किया गया था. इस दिन विश्व, देश या प्रदेश भर के शिक्षकों व स्कूल के छात्र-छात्राओं को हाथ धोकर दुनिया को एक संदेश देना था. साथ ही शिक्षकों को बच्चों को यह भी बताना था कि उन्हें हाथ कब-कब धोना चाहिये और स्वच्छ हाथ से खाना खाने से किस प्रकार अनेक बीमारियों से बचा जा सकता है. खासतौर पर खाने से पहले व खाने के बाद, शौच के बाद तो अनिवार्यतः हाथ धोया जाना चाहिये. स्कूलों में यह जागरूकता इसलिये और भी जरूरी हो जाती है क्योंकि अधिकतर स्कूलों में निरीक्षण के दौरान मिड-डे मील बनाते व परोसते समय साफ-सफाई को लेकर बेहद लापरवाही पाई जाती है और जब-तब बच्चे बीमार भी पड़ते रहते हैं.
 
अब बात करते हैं अपने देश व शहर में साफ-सफाई को लेकर वर्तमान हालात की. बहुत पहले एक अंग्रेज द्वारा कही गई इस बात ‘भारतीय बहुत गंदे होते हैं’ के आलोक में देखें तो कहीं न कहीं ये बात सच भी है कि हम साफ-सफाई को लेकर बहुत जागरूक नहीं हैं। यहां पर मैं अपने एक अफसर पड़ोसी का जिक्र करना चाहूंगा. उनके घर के ठीक सामने मुख्य सड़क पर गाय-भैंसों का जमावड़ा रहता है. एक ‘यादव जी’ वहां अपने अपने जानवर बांधते हैं. वहां इतनी बदबू होती है कि पास से गुजरने पर सांस लेना तक दूभर हो जाता है. इसकी शिकायत जब मेयर से करने की बात उठी तो कहा गया कि जब वह अपनी गली में कूड़े का ढेर तक नहीं उठवा सकतीं तो यह काम क्या खाक करवायेंगी. साफ-सफाई को लेकर उठी यह बात कॉफी हाउस में दोस्तों के बीच भी अनायास ही बहस का मुद्दा बन गई. तथ्यात्मक रूप से जो बात सामने आई, वह यह है कि शहर के बडे़-बड़े अधिकारियों के घरों के आस-पास भारी गंदगियां हैं लेकिन वे उसे हटवाने को लेकर कभी गंभीर नहीं होते. पूरे शहर भर के अलग-अलग कोनों में सैकड़ों अफसर रहते हैं, अगर वे अपने आस-पास फैलने वाली वाली गंदगी को लेकर सख्त हो जायें तो पूरा शहर चमचमा उठेगा. लेकिन ये हो भी कैसा सकता है कि साफ-सफाई को लेकर बेपरवाही तो हमारे भारतीय खून में है फिर वह चाहे अफसर ही क्यों न हो? अब बताइये जब अफसरों का यह हाल है तो फिर शिक्षकों से क्या उम्मीद की जा सकती है. 
बहुत अफसोस होता है कि बुद्धिमत्ता में पूरी दुनिया को हरा देने वाले हम भारतीय साफ-सफाई को लेकर इतने अगंभीर हैं जबकि सच यह है कि हमारी आधी से अधिक बीमारियों की जड़ गंदगी ही है. यह हमारा देश ही है जहां लोग खांसने और छींकने के बाद अपने हाथ तक नहीं धोते. बच्चों को तो छोड़ो, हमारे यहां करीब 25 प्रतिशत बड़े तक खाने से पहले हाथ धोना भी गवारा नहीं समझते. मुंह की सफाई को लेकर तो 75 प्रतिशत से भी अधिक भारतीय बेपरवाह रहते हैं. उनके मुंह से बदबू आती है. यह हम नहीं, बल्कि डेटॉल लिक्विड एंटीसेप्टिक की निर्माता ‘रेस्किट बेंकिशर (इंडिया) लिमिटेड’ और ‘ग्लोबल हायजेनिक काउंसिल’ (जीएचसी) के एक संयुक्त अध्ययन की एक रिपोर्ट कहती है. रिपोर्ट में भारत के 78 प्रतिशत घरों की सतहों पर जीवाणुओं का स्तर असंतोषजनक पाया गया। यहां के 90 प्रतिशत रसोई घरों की सतह पर, 83 प्रतिशत रसोई घरों के सिंक और 85 प्रतिशत नलों में अत्यधिक रूप में जीवाणु पाए जाते हैं. अध्ययन के अनुसार केवल छह प्रतिशत भारतीय यह मानने को तैयार हैं कि रसोई घरों में लगे नल बीमारी फैला सकते हैं. 
 
जरा सोचिये हमें पश्चिम से जो सीखना-अपनाना चाहिये, उसे न अपनाकर हमने उनसे ‘मिलते ही हाथ मिलाने’ की एक गंदी आदत सीख ली. एक-दूसरे से संक्रमण फैलने-फैलाने का एक और बड़ा कारक. आधुनिकता के नाम पर 90 प्रतिशत भारतीय यही तो कर रहे हैं. हमारी परंपरा ‘हाथ जोड़कर नमस्ते’ कितनी अच्छी थी. कुल मिलाकर कहने का मतलब यही है कि क्या हमें साफ-सफाई को लेकर गंभीर नहीं होना चाहिये? आखिर यह हमें स्वस्थ रखने के लिये भी आवश्यक है. और फिलहाल, हमें अपनी तरफ से एक कोशिश करनी ही चाहिये ताकि उस अंग्रेज की कही हुई बात हम गलत साबित कर दें.
 
लेखक रवि प्रकाश मौर्य से संपर्क 09026253336 के जरिए किया जा सकता है.
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