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सुख-दुख...

और अब पान बेचने वाला पत्रकार बनेगा!

कभी मीडिया और मार्केटिंग में नाता दूर-दूर का भी नहीं हुआ करता था. लेकिन बदले जमाने में मीडिया के व्यवसाय और मुनाफे का माध्यम बन जाने के कारण अब मीडिया को भी मार्केटिंग की भरपूर जरूरत पड़ती है. जितना बड़ा बैनर, उतनी बड़ी मार्केटिंग स्ट्रेटजी. कलम में दिन प्रतिदिन दम कम होते जाने के नाते कलम को मार्केटियरों के कंधे का सहारा लेना पड़ रहा है. कंटेंट को बिकाऊ और गैर-बिकाऊ कैटगरी में देखा जाने लगा है. न्यूज से धंधा बिजनेस रेवेन्यू निकालने की बातें होने लगी हैं. ऐसे में अगर पान की दुकान में किसी अखबार का कार्यालय खुल जाए तो कोई बड़ी बात नहीं. 
कभी मीडिया और मार्केटिंग में नाता दूर-दूर का भी नहीं हुआ करता था. लेकिन बदले जमाने में मीडिया के व्यवसाय और मुनाफे का माध्यम बन जाने के कारण अब मीडिया को भी मार्केटिंग की भरपूर जरूरत पड़ती है. जितना बड़ा बैनर, उतनी बड़ी मार्केटिंग स्ट्रेटजी. कलम में दिन प्रतिदिन दम कम होते जाने के नाते कलम को मार्केटियरों के कंधे का सहारा लेना पड़ रहा है. कंटेंट को बिकाऊ और गैर-बिकाऊ कैटगरी में देखा जाने लगा है. न्यूज से धंधा बिजनेस रेवेन्यू निकालने की बातें होने लगी हैं. ऐसे में अगर पान की दुकान में किसी अखबार का कार्यालय खुल जाए तो कोई बड़ी बात नहीं. 
ये तस्वीर मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले डिंडोरी की है. इसे भड़ास4मीडिया के एक साथी ने मेल के माध्यम से भड़ास के पास भेजा है. साफ दिख रहा है कि पान की दुकान को प्रदेश टुडे अखबार का कार्यालय बना दिया गया है. जैसे कोई चाय वाला जनता के वोटों से चुनकर पीएम बन जाए तो किसी को गुरेज नहीं, वैसे ही कोई पान वाला अपने ज्ञान-योग्यता के बल पर पत्रकार बन जाए तो किसी को दिक्कत नहीं. लेकिन यहां मामला इतना सीधा नहीं है. झूठ-फरेब के बल पर चाय वाले, पान वाले अगर राजनीति व मीडिया को संचालित करने लगे तो इससे और किसी का नहीं बल्कि इस देश के लोकतंत्र का सत्यानाश होगा. भुगतना पड़ेगा उस आम जनता को जिसके हित की बात करते हुए राजनीति और मीडिया आदि के क्षेत्र में लोग आया करते हैं. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि राजनीति और मीडिया के चरम पतन और परम बाजारू होने के इस दौर में अगर पान की दुकान पर अखबार का कार्यालय खुल गया है तो ये कोई चौंकाने वाली बात नहीं. उलटबांसियों, नकारात्मकताओं और विद्रूपताओं को आम जन ने इस कदर देख लिया है, चख लिया है, जान लिया है कि उन्हें अब कोई चीज चौंकाती नहीं न दुखी करती है, बस पहले से अवसादग्रस्त मन को थोड़ा और अवसादी बना देती है. 
 
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