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हिन्दुस्तान, कानपुर के जीएम नहीं ले रहे संजय दूबे की लीगल नोटिस

हिन्दुस्तान कानपुर ने पहले तो अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया और अब उनके द्वारा जवाब मांगे जाने पर उनके लीगल नोटिस को रिसीव ही नहीं कर रहा है. हिन्दुस्तान मीडिया चारों कर्मचारी पारस नाथ शाह, नवीन कुमार, अंजनी प्रसाद और संजय दूबे को पहले तो निकाल दिया फिर उन्हीं के खिलाफ जांच बिठा दी और जब ये पीड़ित कर्मचारी हिन्दुस्तान कानपुर के जीएम को जब कोई लीगल नोटिस स्पीड पोस्ट से भेजते हैं तो उसे लेने से इंकार कर दिया जा रहा है. हर बार लीगल नोटिस ये कह के लौटा दिया जाता है कि रिसीवर बाहर गया हुआ जबकि इनके यहां दसियों मैनेजर और 150 कर्मचारी हैं. केवल इन्हीं की नोटिस के साथ ऐसा हो रहा है बाकी सारे पत्र लिये जा रहे हैं.
हिन्दुस्तान कानपुर ने पहले तो अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया और अब उनके द्वारा जवाब मांगे जाने पर उनके लीगल नोटिस को रिसीव ही नहीं कर रहा है. हिन्दुस्तान मीडिया चारों कर्मचारी पारस नाथ शाह, नवीन कुमार, अंजनी प्रसाद और संजय दूबे को पहले तो निकाल दिया फिर उन्हीं के खिलाफ जांच बिठा दी और जब ये पीड़ित कर्मचारी हिन्दुस्तान कानपुर के जीएम को जब कोई लीगल नोटिस स्पीड पोस्ट से भेजते हैं तो उसे लेने से इंकार कर दिया जा रहा है. हर बार लीगल नोटिस ये कह के लौटा दिया जाता है कि रिसीवर बाहर गया हुआ जबकि इनके यहां दसियों मैनेजर और 150 कर्मचारी हैं. केवल इन्हीं की नोटिस के साथ ऐसा हो रहा है बाकी सारे पत्र लिये जा रहे हैं.
 
पीड़ितों की तरफ से एक पत्र एचटी मीडिया कर्मचारी संघ ने इन चारों को षणयंत्र पूर्वक निकाले जाने के संबंध में जो पत्र श्रम आयुक्त को भेजा था उसकी एक प्रति हिन्दुस्तान के सीईओ राजीव वर्मा को दिल्ली भी भेजी गई है जो रिसीव हो गई है. जीएम द्वारा लेटर लेने करने के इंकार के बाद से अब पीड़ितों द्वारा अपने सारे पत्रों को स्कैन करके सीईओ राजीव वर्मा, वाइस प्रेसीडेंट एचआर शर्मिला घोष और जीएम  नरेश पांडेय की मेल आईडी पर भेजा जा रहा है. नीचे भेजे गये पत्र और हिन्दुस्तान द्वारा लौटा दिये गये पत्रों के प्रमाणों की स्कैन कापी दी जा रही है.
संजय दूबे का कहना है कि प्रबंधन जानबूझकर उनके पत्रों को नही ले रहा क्यूंकि अगर वह इसे स्वीकार करते हैं तो उन्हें इन पीड़ितों के लीगल नोटिस का जवाब देना पड़ेगा. यहां के जनरल मैनेजर को कानून की जरा भी परवाह नहीं है. उन्हें ये भी ख्याल नहीं है कि पत्र को ना लेना भी एक गुनाह है. वे इन पत्रों को लेकर कोर्ट में जायेंगे और ये बतायेंगे कि प्रबंधन के द्वारा किस तरह उनका उत्पीड़न किया जा रहा है.
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