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बरखुरदार तुम पत्रकारिता के पहले ही टेस्ट में फेल हो गए

पत्रकारिता के कुछ रोचक प्रसंग
सर कौन सा पजामा: संवाददाता समाचार लिख कर लाया और पूछा कि इस का अंत कैसे किया जाए। मैंने कहा बस अंत में एक लाइन लिख दो कि इस प्रकार पुलिस ने अपनी योजना को अमली जामा पहना दिया। सर कौन सा पजामा संवाददाता ने पूछा। चुस्त पजामा, मेरे साथ बैठे सहयोगी ने कहा और संवाददाता उठ कर चला गया और लिख लाया कि इस प्रकार पुलिस ने अपनी योजना को चुस्त पजामा पहना दिया। यह छपा तो नहीं मगर बाद में एक मजाक जरूर बन गया।
पत्रकारिता के कुछ रोचक प्रसंग
सर कौन सा पजामा: संवाददाता समाचार लिख कर लाया और पूछा कि इस का अंत कैसे किया जाए। मैंने कहा बस अंत में एक लाइन लिख दो कि इस प्रकार पुलिस ने अपनी योजना को अमली जामा पहना दिया। सर कौन सा पजामा संवाददाता ने पूछा। चुस्त पजामा, मेरे साथ बैठे सहयोगी ने कहा और संवाददाता उठ कर चला गया और लिख लाया कि इस प्रकार पुलिस ने अपनी योजना को चुस्त पजामा पहना दिया। यह छपा तो नहीं मगर बाद में एक मजाक जरूर बन गया।
 
ये दस्यु क्या होता है: जिले में नए आए एस. एस. पी की प्रैस कांफ्रेंस थी । ये साहब दस्यु प्रभावित क्षेत्र से आए थे । इन्होने बताया कि दस्यु उन्मूलन में उन्हें क्या क्या झेलना पड़ा था।और भी बहुत बातें हुईं जिले की कानून व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। प्रैस कांफ्रेंस समाप्त होने पर एक पत्रकार खड़ा हो गया। हां क्या बात है। एस.एस. पी. ने पुछा? सर आप की सारी बात सुनी मगर ये दस्यु क्या होता है आपने यह नही बताया। यह सुन कर सारे पत्रकार हंस पड़े  एक वरिष्ठ पत्रकार उसे पकड़ कर बाहर ले गया और कहा कि साले क्यों हम सब का अपमान कराता है दस्यु डाकू को कहते है।
 
थानेदार ने माफी मांगी: काफी पहले की बात है उन दिनों संभल में आए दिन बम धमाके हो रहे थे हालांकि कोई हताहत नही हुआ था मगर इन धममाकों से षहर में दहषत बहुत थी। मुझे पड़ताल करने के लिए संभल भेजा गया। लोगों से बात करने के बाद मैं शाम को थाने गया थानेदार साहब अकेले ही मिल गए। मैंने अपना परिचय दे कर आने का मकसद बताया। नाम पूछने पर मेरे मुंह से संत मेहर दास निकल गया। उन दिनों संत मेहरदास के नाम से छप रहा कबीर चौरा काफी लोकप्रिय था। थानेदार ने चाय पिलाई और बातों-बातों में मुसलमानों पर आरोप लगाने लगा। मैंने भी मुसलमानों की बुराई की तो उस का हौंसला बढ़ गया और फिर जो उस ने पुलिसिया भाषा में मुसलमानों को गरियाया तो मेरी सहन शक्ति भी जवाब देने लगी मगर मैं शांत रहा और कुछ देर बाद उठ कर चला आया।
 
अगले दिन दोपहर में कार्यालय गया तो थानेदार संभल के संवाददाता के साथ विराजमान मिला। मुझे देखते ही हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और अपने कहे की माफी मांगने लगा। हुआ यह था कि मेरे आने के बाद संवाददाता थाने गया तो थानेदार ने मेरे बारे में बताया तो संवाददाता ने उसे बताया कि वह कोई संत नही वह तो डाक्टर महर उद्दीन खां है। खैर थानेदार को कुछ न कह कर चाय पिला कर विदा कर दिया।
 
उस का नाम ही बरखुरदार हो गया: पास के गांव का एक लड़का मेरे पास आता रहता था उसे एक मित्र ने भेजा था पत्रकरिता सीखने के लिए। मैंने कहा बरखुरदार अभी तुम अपनी पढाई पर ध्यान दो मगर वह नहीं मान रहा था तो मैंने उसे बताया कि बरखुरदार पत्रकारिता का पहला पाठ यह है कि किसी की बात पर एक दम विश्वास न करो भले ही कोई तुम्हारा कितना ही अपना हो। सर बरखुरदार का मतलब क्या होता है। मेरे दिमाग में शरारत सूझी तो मैंने बता दिया कि बरखुरदार सम्मानित व्यक्ति को कहते हैं। एक दिन मैंने उसे कहा कि जाकर मस्जिद के इमाम से मुसलमानों की शिक्षा पर बात करके लाओ। वह इमाम के पास गया और बोला- बरखुरदार मुझे……….इतना ही कह पाया था कि इमाम ने डांट दिया बदतमीज भाग यहां से और उसे भगा दिया। वह रूआंसा सा मेरे पास आया और बताया कि मौलवी ने उसे डांट कर भगा दिया। पूछने पर असली माजरा पता चला तो मैंने कहा बरखुरदार तुम पहले ही टेस्ट में फेल हो गए। बाद में लोगों ने उस का नाम ही बरखुरदार रख दिया।
 
डी. एम. से शरारत: मेरठ के डीएम कुछ खास बताने के लिए शहर के केवल दो पत्रकारों को ही अपने आवास पर बुला कर उन्हें बता देते थे यह बात धीरे धीरे सब पत्रकारों को मालूम हो गई मगर इस का कोई हल नजर नही आ रहा था। एक दिन मैं और अमर उजाला के हरि जोशी बैठे इसी पर विचार कर रहे थे तभी दिमाग में एक शरारत सूझी। पता चला कि डी. एम. ने अपने चहेतों को फिर बुलाया है सो हम दोनों ने तय किया कि डी. एम. के स्टाफ के नाम से पांच सात पत्रकारों को निमंत्रण दे दिया जाए बस फिर क्या था हरि जोशी ने फोन उठाया और पत्रकारों को फोन कर बताया कि वह डी. एम. साहब के बंगले से बोल रहा है शाम को छह बजे डी एम साहब ने आप को बुलाया है। छह सात पत्रकारों को फोन करने के बाद शाम का इंतजार करने लगे। पत्रकार दिए गए समय पर डी. एम. के बंगले पर पहुंचने लगे। हम दोनो आधा घंटा देरी से पहुंचे और जाते ही सॉरी बोल कर लेट आने के लिए क्षमा प्रार्थना की। डी. एम. टुकर टुकर हमें देख रहा था उस की समझ में नही आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है पत्रकार आ ही गए थे तो उन्हें एक दम जाने को भी नहीं कहा जा सकता था। खैर कुछ देर अनौपचारिक बातचीत के बाद सब को चाय पिलाई और विदा कर दिया बाहर आ कर सब एक दूसरे से पूछ रहे थे कि बात तो कुछ खास नहीं थी फिर पता नही क्यों बुलाया गया था। बाद में डी. एम. ने अपने स्टाफ से पूछा मगर कोई कुछ न बता सका हमने भी किसी तीसरे को इस सब के बारे में नही बताया। हां इतना अवश्य हुआ कि इस घटना के बाद डी. एम. ने फिर अपने चहेतों को अकेले बुलाना बंद कर दिया।
 
थानेदार को ही मरा बता दिया: उन दिनों हरियाणा का प्रभार मेरे पास था। संवाददाताओं की अच्छी टीम थी मगर पलवल का मामला उलझ रहा था यहां से तीन लोग अपनी अपनी सिफारिशों के आधार पर संवाददाता बनने का प्रयास कर रहे थे मेरी में समझ नहीं आ रहा था सो मैंने मामला उस समय अखबार संभाल रहे अच्युतानंद मिश्र को सौंप दिया तो उन्होंने एक को संवाददाता बनाने की बात तय कर दी। जिसे संवाददाता बनाया गया वह इतना सीधा था कि हर आदमी पर विश्वास कर लेता था। इसे संवाददाता बनने पर बाकी दो इस को पलीता लगाने लगे। ये लोग कोई झूठा समाचार बनाते और इसे दिखा देते ये महाशय उसे सही समाचार मान लेते और भेज देते। पहला ऐसा समाचार इसने एक खलिहान में आग लगने का भेजा जो छप गया मगर बाद में प्रशासन का खंडन आ गया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस के बाद हम सावधानी बरतने लगे।
 
शनिवार को मेरा अवकाश होता था यह उन लोगों को पता था सो एक शनिवार समाचार भेजा कि सड़क दुर्घटना में पलवल के थानेदार की मृत्यु हो गई है समाचार छप गया तो सवेरे से ही पलवल से फोन आने लगे मैं कार्यालय गया तो अच्युतानंद जी ने इस बारे में बताया। यह समाचार पंजाब केसरी में भी छपा था। अच्युता जी ने आग्रह किया कि तुरंत पलवल जा कर थानेदार से मिल कर खेद प्रकट किया जाए क्योंकि खंडन तो अगले ही दिन छप सकता था। खैर मैं और मेरा सहयोगी उमेश पलवल गए थाने में कई लोगों के साथ तीनों संवाददाता भी थे जो एक दूसरे पर आरोप लगा रहे थे। थानेदार को कितनी परेशानी हुई होगी इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। उस की तसल्ली के लिए जितना कह सकते थे कहा गया और अगले दिन खंडन खेद सहित छाप दिया मगर इस के बाद कुछ समय के लिए पलवल के समाचार देने बंद कर दिए बाद में दूसरे प्रभारी ने किसी अन्य को रख लिया।
 
एस. पी. को गिरा दिया: दादरी में सड़क दुर्घटना में एक किशोरी की मृत्यु हो गई थाने के पास की घटना थी सो वहां भीड़ जमा हो गई उधर थाने से दो किलोमीटर दूर एक अन्य दुर्घटना हो गई वहां काफी हंगामा हो गया सो थाने की पुलिस वहां भीड़ को संभालने चली गई थाने में केवल एक दारोगा और तीन सिपाही थे जो थाने पर जमा भीड़ को नहीं संभाल पा रहे थे हम चार लोग वहां खड़े थे तभी एस. पी. साहब जीप में आए और भीड़ देख कर बोले हटो यहां से। मैंने सहज ही कहा सर एक्सीडेंट में एक किशोरी की जान चली गई है। ये एस. पी. अपने अक्खड़ स्वभाव के लिए काफी बदनाम थे हमने इनके खिलाफ एक पोस्टर भी तैयार कर रखा था जिसे आज ही बांटना था। मेरी बात पर एस. पी. ने डांट कर पूछा आप कौन हैं मैंने कहा सर मैं तो पत्रकार हूं इस पर एस. पी. साहब बोले क्या थर्ड क्लास पत्रकार हो, मैं भी भड़क कर बोला आप फोर्थ क्लास अफसर हैं। इस पर एस. पी. साहब मेरी ओर बढ़े मगर इसी बीच मेरे साथ खड़े तीन मित्रों ने उन्हें बीच में ही थाम लिया और पलक झपकते ही नीचे गिरा दिया। यह देख कर भीड़ हो हो करने लगी थाने में मौजूद पुलिस वाले ओट में हो गए एस. पी. साहब उठे और धूल झाड़ कर जीप में सवार हो कर तुरंत चले गए। पता नहीं यह सब कैसे हो गया।
 
एस. पी. साहब के जाने के बाद हमें होश आया कि यह क्या कर दिया अब एस. पी. छोड़ेगा नहीं। हम चारों घबरा गए और पोस्टर बांटने का काम स्थगित कर बचने के उपाय सोचने लगे। फौरी तौर पर तय किया कि अब भूमिगत होने में ही फायदा है। सो चारों दिल्ली आ गए। खिजराबाद में एक के मामा थे रात वहां गुजारी मगर डर सता रहा था कि पुलिस घर जा सकती है। जानकारी लेने का काई साधन नही था अगले दिन सब शाहदरा आ गए। एक मित्र का भाई एस. पी. आफिस में तैनात था उस से सम्पर्क कर सारी बात बताई और पता करने का आग्रह किया। उसने शाम को जो जानकारी दी उससे हमारी बांछें खिल गईं उस ने बताया कि एस. पी. साहब का तबादला पिथौरागढ हो गया कल चले जाएंगे। हम लोग रात में ही वापस आ गए और प्रचारित कर दिया कि दिल्ली जा कर बड़े नेताओं से मिल कर एस. पी. का तबादला करा दिया है। लोगों पर इस का बड़ा असर हुआ और थाने वाले भी इस बात से बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि ये साहब पुलिस वालों से बहुत दुर्व्यवहार करते थे। अब पोस्टर का क्या किया जाए सो पोस्टर के बंडल बना कर पिथौरागढ के विभिन्न विभागों के नाम डाक से भेज दिए।
 
तीन साल बाद यह एस. पी. बुलंदशहर आ गए एक समाचार के सिलसिले में इनसे मिला तो देखते ही बोले आप को पहले कहीं देखा है मैं कैसे बताता कि कहां देखा है सो शांत रहा और वांछित जानकारी ले कर चला आया। इस के कई साल बाद कुछ समय के लिए शाह टाइम्स के देहरादून कार्यालय जाना पड़ा तब उत्तराखंड बन चुका था और यह सज्जन राज्य के डी. जी. पी. बन गए थे एक समाचार के सिलसिले में इनके  पास गया तो देखते ही बोले आप को पहले कहीं देखा है। मैंने कहा जी बुलंदशहर में भेंट हुई थी। उन्हें शायद दादरी की घटना याद थी कह नहीं सकता।
 

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

 

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