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कुछ लोगों का धर्मान्‍तरण होता है, मेरा जातांतरण हो गया

​​मीडिया में जाति का दंश-पार्ट ​1​: जाति पर बात करना मुझे भी खराब लगता है. जाति व्‍यक्ति की नहीं जमात की होनी चाहिए. मैं आज नहीं अभी से ही जाति से सम्‍बंधित कोई बात नहीं लिखूंगा ना ही कहूंगा लेकिन मुझे आश्‍वासन चाहिए कि जो मेरे और मेरे जैसे सैकड़ों के साथ जो 'जाति का नंगा नाच' हुआ वह बंद होना चाहिए. माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय से जनसंचार में एमए करने के बाद एक मीडिया संस्‍थान में नौकरी के लिए (एक यादव, एक ब्राह्मण और एक श्रीवास्‍तव जी) तीन दोस्‍त गए. लिखित परीक्षा हुई जिसमें तीनों पास कर गए. लेकिन साक्षात्‍कार में अन्‍य सवालों के साथ जाति भी पूछी गई. पूछने वाले उमा शंकर मिश्रा नामक व्‍यक्ति ने मेरे नाम में आर्य टाईटल देख पूछा की आप तिवारी जी हैं, मैने कहा कि नहीं सर मै 'अहीर' हूं तो उनका जवाब सुन कर अवाक रह गया. वे मुझे पत्रकारिता छोड़ आर्मी में जाने के लिए तैयार करने हेतु कहने लगे. परिणाम में मैं फेल और सब पास थे. उसके बाद संस्‍थान के निदेशक जगदीश उपासने के सहयोग से मुझे लोकमत जैसे संस्‍थान में नौकरी मिल गई लेकिन इन जातिवादी मानसिकता वालों के लिए मन में घृणा पैदा हो गई और देखते देखते मै अमरेन्‍द्र आर्य से अमरेन्‍द्र यादव बन गया. कुछ साथी अब मुझे ही जातिवादी कहते हैं. कुछ लोग का धर्मान्‍तरण होता है, मेरा जातांतरण हो गया.
 
मीडिया में जाति का दंश-पार्ट 2: 2009 में राष्‍ट्रीय सहारा के छपरा संस्‍करण में संवाददाता के रूप में काम कर रहा था. (यह पत्रकारिता में मेरे शुरू के दिन थे.) छपरा कार्यलय के प्रभारी विद्याभूषण श्रीवास्‍तव थे. अभी भी हैं. इन्‍होंने सारण एकेडेमी में हुए एक कार्यक्रम को कवर करने के लिए भेजा. मै सारण एकेडेमी गया और पूरे कार्यक्रम को कवर कर समाचार लिखा. वह खबर सिटी पेज पर बैनर न्‍यूज बन कर गई. अगले सुबह जब अखबार छपरा के बजारों में आया तो कार्यालय प्रभारी श्रीवास्‍तव जी ने कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि सारण एकेडेमी के नवांगतुक प्राचार्य (श्रीवास्‍तव जी) को कार्यालय से फोन कर बधाई देते हुए कहा कि 'आपकी खबर को बैनर छपवाये हैं देख लीजिए. दो दिन बाद छपरा स्थित यादव छात्रावास में एक बैठक हुई थी. मै वहां गया और उस बैठक को कवर कर खबर लाया, लिख कर (जब खबर पन्‍नों पर लिख कर प्रभारी को देना होता था) प्रभारी श्रीवास्‍तव जी को दिया. उन्‍होंने पन्‍ना हाथ में लेते ही पूछा, कहां की खबर है, मैने बताया छात्रावास में हुई बैठक की. उन्‍होंने खबर पढ़ी भी नहीं और पन्‍ने को फाड़ते हुए कहा ''यादव छात्रावास वाली, हटाओं मेरे सामने से, यादव-फादव का खबर छापने के लिए यहां बैठे हैं.'' इसके बाद राष्‍ट्रीय सहारा छोड़ प्रभात खबर से जुड़ गया. यह घटना मेरे पत्रकारिय जीवन की अहम घटना थी, इसके बाद सबकुछ छोड़ पत्रकारिता को ही जीवन समर्पित कर दिया. अब आपके सामने हूं. अब आप लोग ही बतायें कि जातिवादी कौन.
 
लेखक अमरेन्द्र यादव फारवर्ड प्रेस से जुड़े हैं. उनसे 09278883468 पर संपर्क किया जा सकता है.
 
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