Ravish Kumar : इ कइसन खोजी पत्रकारिता किये कि खुद ही खोजा रहे हैं। वैसे प्रायश्चित्त करने हिमालय गए हैं या दक्षिणे दिल्ली में कंदरा बना लिये हैं। सत्य पर जब संदेह नहीं है तो संदिग्ध पर इतना स्नेह क्यों। या तो सत्य को संदिग्ध करो या संदिग्ध को सत्य घोषित।
Ravish Kumar : प्रायश्चित्त से पहले सज़ा का हक़ बनता है किसी भी अपराधी पर। ये अंगुलीमाल डाकू की कहानी नहीं है संपादक इन चीफ़ साहब। छह महीने के कल्पवास की जगह सात साल का कारावास हो। हम भीड़ बनकर फ़ैसला नहीं दे रहे, दिमाग़ लगाकर सवाल कर रहे हैं कि आपने खुद को पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया, अगर प्रायश्चित्त का इतना ही भूत सवार हो गया है तो। सब समझ रहे हैं। ये कोई चलताऊ या किसी मक़सद से लगाए आरोप नहीं है जिसकी जाँच कमेटी करेगी। जब सज़ा भी खुद तय करनी थी तो ग़लती मानी क्यों। कमेटी बनवाते न। अपना पक्ष वहाँ रखते।
एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार के फेसबुक वॉल से.





