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पुरुष प्रधान समाज में महिला होने का बोझ

केवल भारत में ही नहीं आज पूरे विश्व में महिलाओं के खिलाफ यौन, शारीरिक और मानसिक हिंसा बड़े पैमाने पर बढ़ चुकी है। महिलाओं में सामाजिक, सांस्कृतिक सीमाओं, धार्मिक बाधाएं, आर्थिक वर्ग मतभेद, नस्ल और राष्ट्रीयता के भेद आदि को लांघने का डर मौजूद है, वह खुलकर सांस भी नहीं ले पाती हैं। बंधी हैं ना जाने कितने ही अनगिनत बंधनों में, जिन्हें हमारे समाज ने गढ़ा है। भारत में महिलाओं का जीवन के हर क्षेत्र फिर चाहे वह माँ के रूप में हो बेटी के रूप में हो, बहू के रूप में हो, पिसता ही आ रहा है, हर बार उनकी आवाज़ को दबा दिया जाता है। कभी उनके साथ दुष्कर्म कर दिया जाता है, कभी वे घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं, कभी दहेज़ के लिए प्रताड़ित होती हैं और कभी उन्हें अपनी झूठी शान के लिए मार भी दिया जाता है। इसके अलावा धार्मिक और सामाजिक झगड़ों के दौरान उन पर कैसे हावी हुआ जाता है ये जग जाहिर है। यह भी कह सकते हैं कि आपसी दंगों और झगड़ों का शिकार मासूम महिलाएं ही होती हैं। 
केवल भारत में ही नहीं आज पूरे विश्व में महिलाओं के खिलाफ यौन, शारीरिक और मानसिक हिंसा बड़े पैमाने पर बढ़ चुकी है। महिलाओं में सामाजिक, सांस्कृतिक सीमाओं, धार्मिक बाधाएं, आर्थिक वर्ग मतभेद, नस्ल और राष्ट्रीयता के भेद आदि को लांघने का डर मौजूद है, वह खुलकर सांस भी नहीं ले पाती हैं। बंधी हैं ना जाने कितने ही अनगिनत बंधनों में, जिन्हें हमारे समाज ने गढ़ा है। भारत में महिलाओं का जीवन के हर क्षेत्र फिर चाहे वह माँ के रूप में हो बेटी के रूप में हो, बहू के रूप में हो, पिसता ही आ रहा है, हर बार उनकी आवाज़ को दबा दिया जाता है। कभी उनके साथ दुष्कर्म कर दिया जाता है, कभी वे घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं, कभी दहेज़ के लिए प्रताड़ित होती हैं और कभी उन्हें अपनी झूठी शान के लिए मार भी दिया जाता है। इसके अलावा धार्मिक और सामाजिक झगड़ों के दौरान उन पर कैसे हावी हुआ जाता है ये जग जाहिर है। यह भी कह सकते हैं कि आपसी दंगों और झगड़ों का शिकार मासूम महिलाएं ही होती हैं। 
 
दुनिया भर में हुए विभिन्न अध्ययनों से ये पता चलता है कि 15 से 44 साल की अधिकतर महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार है और इसी कारण यह कभी कैंसर, मलेरिया, किसी आकस्मिक दुर्घटना या सामाजिक झगड़ों के दौरान अपनी जान से हाथ धो देती हैं। पूरी दुनिया में लगभग 70 फीसदी महिलाएं, कभी अपने जानकारों से और कभी अजनबियों से शारीरिक और यौन शोषण की शिकार हैं। दुनियाभर के अलग-अलग भागों में लगभग 8 लाख लोगों में 80 फीसदी से अधिक हर साल यौन शोषण का शिकार होती हैं। साथ ही लगभग 60 लाख नाबालिग लड़कियों का बाल विवाह कर दिया जाता है। दक्षिण एशिया और उप सहारा अफ्रीकी क्षेत्रों के आंकड़ों के अनुसार यहां पर जल्दी ही युवा लड़कियों की शादी कर दी जाती है या यूँ कहें कि यह दुनिया का वह गढ़ है जहां सबसे कम उम्र में लड़कियों को ब्याह दिया जाता है। इतना ही नहीं, हिंसा का क्रूर कृत्य तो यह है जिसके तले महिलाएं भारत जैसे देश में दबी रह जाती है और वह ये है कि महिलाओं पर प्रभुत्व स्थापित कर दिया जाता है, और आज तो ये प्रभुत्व महिलाओं के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। आज दहेज के लिए हत्या, नई दुल्हन को जला दिया जाना, भ्रूण हत्या, शिशु हत्या, घरेलू हिंसा, एसिड हमले, ऑनर किलिंग, तस्करी और बलात्कार की घटनाएं अनदेखी और अनसुनी नहीं हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता होगा जब कहीं से दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध की खबर न आती हो, इतना ही नहीं 16 दिसम्बर को हुए दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म के बाद भी कुछ बदलाव नहीं हुआ है बल्कि इसके विपरीत दुष्कर्मों की घटनाएं दोगुनी जरुर हो गयी हैं। कई जगह तो दुष्कर्म को महिलाओं के विनाश के लिए इस्तेमाल किया गया, और इसका प्रभाव झगड़ों एवं दंगों के समय सबसे अधिक देखने को मिलता है। कई जगहों के रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि महिलाओं के दफ़न कंकाल चीख-चीख कर यह बताते हैं कि उनके साथ कितनी बेरहमी से दुष्कर्म कर उनकी हत्याएं कर दी गयी थी।
 
भारत के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि जब भी किसी आक्रमणकारी ने भारतीय राजा/महाराजाओं पर आक्रमण कर उन्हें पराजित किया उनकी रानियों को भी उठा लिया गया, अपने शोक पूरे करने के लिए। अगर बात हो रही है दंगों के दौरान महिलाओं के साथ दुष्कर्म और हत्याओं की तो गुजरात के दंगों को कैसे भुलाया जा सकता है, जहां न जाने कितनी ही महिलाओं की आबरू के साथ खिलवाड़ किया गया था। दंगों के दौरान महिलाओं के साथ जो होता है वह शायद उन दंगों से प्रभावित लोगों के दर्द से भी ज्यादा भयावह है, दंगा प्रभावित तो शायद अपने को सम्भाल भी लेते है परन्तु ये महिलाएं तो अपना सबकुछ खो देती हैं, तो इसे अगर आसान शब्दों में कहें कि दंगों का शिकार सबसे अधिक महिलाएं ही होती है। भट्टा पारसोल (नोएडा) और मुजफ्फरनगर के दंगे इसके नवीनतम उदाहरण हैं।
 
मुज़फरनगर दंगों के लगभग दो माह बीतने के बाद यह बात सामने आयी कि वहां महिलाओं ने क्या सहा, क्या गुजरा उन महिलाओं पर, और क्या नहीं सहा उन्होंने? दुष्कर्म, ह्त्या, मारपीट आदि। सबसे बड़ी बात तो यह है कि महिलाओं को अपनी जागीर समझा जाता है जिसे जो चाहे जब चाहे अपने इस्तेमाल में ले सकता है। आखिर कब ख़त्म होगी हमारे समाज से यह धारणा?
 
भारत में महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन का कार्य रूढ़िवादी या अशिक्षित और पिछड़े समाज तक ही सीमित नहीं है ये आज भारत के हर नुक्कड़, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में एक घातक अभिशाप बन चुका है। फरवरी 2013 में जारी के गयी एक रिपोर्ट को देखकर आश्चर्य होता है कि भारत आज भी महिला अधिकारों के उल्लंघन के मामले में 90 देशों में पहले स्थान पर है। यदि हम राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के नवीन आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि केवल 2012 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 2,44,270 मामले सामने आये, जबकि 2011 में यह मामले 22,8,650 थे। इसके अलावा निष्कर्ष देखें तो 2012 में बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज हत्या, यौन उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराधों की घटनाओं में 6.4 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसके साथ 2011 की जनगणना भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा को दर्शाती है इस जनगणना के अनुसार भारत में महिला की संख्या पुरुषों की अपेक्षा निरंतर कम हो रही है, आलम यह है कि 1000 पुरुषों पर केवल 914 महिलाएं ही हैं। अगर इसे बड़े पैमाने पर देखें तो दुनियाभर से लगभग 25 लाख महिलाएं अपने खिलाफ हो रही हिंसा के कारण लापता हैं। इसी कमी के चलते आज भारत में दुल्हन खरीदने के उद्योग के रूप में एक नया चलन चल पड़ा है, साथ ही आज दुनिया भर में महिलाओं की तस्करी कर उन्हें बेचा जा रहा है। कम विषम लिंग अनुपात का यह प्रभाव सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता बल्कि यह तो निर्दयतापूर्वक नाबालिगों और बच्चों पर हमला कर रहा है।
 
महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के मुद्दे पर सम्मेलन को संबोधित करते हुए यूएन महासचिव बान-की-मून ने संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं से कहा कि "वे महिलाओं के खिलाफ हिंसा सम्बन्धी संघर्ष अभियानों की निगरानी, विश्लेषण और रिपोर्टिंग में तेजी लाएं। उन्होंने कहा यौन हिंसा जैसी घटना जहां भी और जब भी घटती है यह एक नीच अपराध है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा जब भी उजागर होती है वह गुस्से और कार्रवाई की हक़दार है।" इनकी बातों से प्रेरणा लेकर हमें प्रभावी रूप से विभिन्न सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं, धार्मिक अतिवादियों, अशिक्षा, गरीबी, हिंसा और नग्नता को बढ़ावा देने वाली फिल्मों, अपर्याप्त न्याय व्यवस्था पर हमला करना होगा, नियमों और विनियमों की समस्याओं को ख़त्म करना होगा, और गम्भीरता से कार्य करते हुए हिंसा को ख़त्म करने के लिए उसकी जड़ को ही काटना होगा तभी महिलाएं समाज में सुरक्षित महसूस करेंगी, एक भयमुक्त समाज का निर्माण भी तभी सम्भव है। हम सभी यह जानते हैं कि महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा को रोका जा सकता है पर हमारे देश में कोई ऐसा दृढ़ कानून नहीं है जिसके माध्यम से ऐसा किया जा सके। इसलिए अभी भी हिंसा की तीव्रता को कम करने अथवा समाप्त करने के लिए हमें कठोर प्रयास करने की जरुरत है,  महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा को रोकने के लिए क्रिमिनल लॉ बनाने कि आवश्यकता है, पुलिसकर्मियों को अधिक सतर्क रहने के साथ उनकी संख्या में भी वृद्धि की जरुरत है, महिलाओं को कानूनी सहायता देने के लिए कानूनो में परिवर्तन की जरुरत है, अपराध की रिपोर्ट और लंबित पड़े मामलों के ढेर को साफ करने के लिए नेताओं और न्यायपालिका द्वारा पीड़ितों को प्रोत्साहित देने की जरुरत है। तभी इन मामलों पर रोक सम्भव है। महिलाओं की सुरक्षा ही भविष्य को सुधारने की पहली कसौटी है।
 
लेखक अश्वनी कुमार से [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.
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