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बंद हो अब सहारा का डर्टी गेम (संदर्भ: आज प्रकाशित सेबी विरोधी विज्ञापन)

जबकि देश की सर्वोच्च अदालत सहाराश्री को चेतावनी दे चुकी है कि वैसे तो सहारा श्री के कारनामों के बदले में अदालत उन्हें जेल भेज सकती है लेकिन जनता के पैसे की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए ही उन्हें जेल नहीं भेजा जा रहा है लेकिन अपने हर कदम से सहारा संस्थान ये जता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट, सरकार आदि सब उसके लिए मजाक है. सहारा को ज्ञात है कि सेबी एक ऐसी संस्था है जिसका काम ही जनता से धोखाधड़ी करने वाले तत्वों पर लगाम लगाना है और इसीलिए हर कदम पर सुप्रीम कोर्ट सेबी के क़दमों का समर्थन कर रहा है लेकिन फिर भी सेबी ये जताने की कोशिश कर रहा है जैसे सेबी की सुब्रत राय से कोई जाती दुश्मनी है.

जबकि देश की सर्वोच्च अदालत सहाराश्री को चेतावनी दे चुकी है कि वैसे तो सहारा श्री के कारनामों के बदले में अदालत उन्हें जेल भेज सकती है लेकिन जनता के पैसे की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए ही उन्हें जेल नहीं भेजा जा रहा है लेकिन अपने हर कदम से सहारा संस्थान ये जता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट, सरकार आदि सब उसके लिए मजाक है. सहारा को ज्ञात है कि सेबी एक ऐसी संस्था है जिसका काम ही जनता से धोखाधड़ी करने वाले तत्वों पर लगाम लगाना है और इसीलिए हर कदम पर सुप्रीम कोर्ट सेबी के क़दमों का समर्थन कर रहा है लेकिन फिर भी सेबी ये जताने की कोशिश कर रहा है जैसे सेबी की सुब्रत राय से कोई जाती दुश्मनी है.

सहारा ने आज फिर सभी अखबारों को बड़े -बड़े विज्ञापन देकर एक बार फिर सेबी को कठघरे में खड़ा तो किया है लेकिन ये नहीं स्पष्ट किया है कि सेबी की उससे दुश्मनी क्या है? अगर सेबी ने सहारा द्वारा दर्शाई गई अरबों रुपये की संपत्ति को महज चंद करोड़ माना है तो उसके पीछे सेबी के तार्किक कारण है सहारा के महज सेबी को कठघरे में खड़ा करने से असलियत बदल नहीं जाती।  हैम सब जानते है कि बैंकों की कर्ज देने कि प्रणाली कितनी लचर और लापरवाहीपूर्ण है, अगर सहारा को लोन देने के मामले में किसी बैंक ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली तो इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए कि सेबी भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर सहारा के अबूझ तर्कों को मान ले, विज्ञापन की  भाषा से कोई भी आम नागरिक समझ सकता है कि सेबी वही कर रही है जो कानूनन है लेकिन सहारा केवल अपने वसूली एजेंटों का मनोबल बनाये रखने के लिए ऐसे विज्ञापन बार -बार जारी करती है जिसका निवेशकों के पैसे वापस करने अथवा अदालती कार्यवाई से कोई मतलब नहीं है.

अगर सहारा अपने विज्ञापनों में खुद को सक्षम और धनवान बताती है तो उसे ये भी बताना चाहिए कि क्यों वो अपनी परिसम्पत्तियां बेच रही है, क्यों उसने भारतीय टीम की स्पांसर शिप छोड़ी, क्यों वो आई पी एल में अपनी टीम को छोड़ने पर मजबूर हुई, क्यों उसके चैनल में कर्मियों को समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है?
ऐसे तमाम कारण है जो बारम्बार ये बता रहे है कि सहारा में गड़बड़ी है, और ऐसी गड़बड़ी जिससे निपटना उसके लिए टेडी खीर है, सिर्फ एजेंटों के मनोबल बनाये रखने और जनता से किसी न किसी बहाने धन वसूली करने के लिए मीडिया को साधे रखने के लिए विज्ञापन देने से बात बनने वाली नहीं है सहारा को जनता को ये भी बताना होगा कि किन वजहों से वो इस मुकाम पर पहुँच रही है जहां उसे निवेशकों के पैसे लौटाना भारी हो रहा है और वो इसके लिए क्या करेगी?

सच्चाई ये है सहारा श्री कि हिंदुस्तान जाग रहा है, आप ऐसे खोखले विज्ञापन देकर अपने सहयोगियों, कार्यकर्ताओं को बेवकूफ बना सकते है जमाकर्ताओं को नहीं जिनके पैसे के साथ -साथ दिल भी डूब रहे है और कोर्ट को उन्हीं की चिंता है, अब सहारा को अपना भ्रमजाल समेट कर जनता को बता देना चाहिए कि वो उनके धन को वादों के मुताबिक़ गुणकों में न सही पर जितना अधिकतम लौटा सकते है लौटा रहे है और अब आगे उनसे निवेश लेना बंद करे. सरकार, अदालत और नीति नियामक संस्थाओं के साथ चूहे -बिल्ली का खेल बंद होना चाहिए।

हरिमोहन विश्वकर्मा की रिपोर्ट.

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