चलिए अरुषि और हेमराज को तो सीबीआई ने इंसाफ दिला दिया. सीबीआई को कोर्ट मे मिली जीत के लिए बधाई. लेकिन मुझे याद आ रहा है शशि हत्याकांड. ये भी लगभग अरुषि-हेमराज हत्याकांड के ही समय का था. जिसमें तत्कालीन मंत्री आनन्दसेन यादव पर एक लॉ स्टुडेंट शशि के अपहरण और फिर अपने ड्राईवर से उसकी हत्या करा देने के आरोप लगे थे. मायावती ने आनन्दसेन का मंत्री पद तुरंत छीन लिया था और सीबीआई को जांच दिए जाने की संस्तुति कर दी थी. इसके पहले लगभग ऐसे ही मामले मधुमिता हत्याकांड मे अपने ही मंत्री अमरमणि और उनकी पत्नी के खिलाफ मायावती सीबीआई जांच करा चुंकी थीं. आज ये दम्पति आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है.
खैर. सीबीआई ने आश्चर्यजनक तरीके से इस मामले की जांच करने से साफ इंकार कर दिया. पीड़ित पक्ष कोर्ट भी गया लेकिन सीबीआई ने मामले को नहीं लिया तो नहीं लिया. बाद मे यूपी पुलिस ने ही मामले की जांच की. निचली अदालत से आनन्दसेन को सजा भी हो गई लेकिन उच्च न्यायालय से वो बरी कर दिए गए, सिर्फ उनके ड्राईवर को दस साल की सजा हुई. जिसमें से 6 साल वो काट चुका है.
यहां ये भी बता दूं कि शशि का शव आजतक बरामद नहीं हो पाया. जहां तक मुझे जानकारी है कि यूपी पुलिस मामले को सुप्रीम कोर्ट मे भी नहीं ले गई क्योंकि आनन्दसेन के पिता मित्रसेन यादव अब समाजवादी रथ पर सवार हैं. उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच ने आनन्दसेन यादव के ड्राईवर विजयसेन यादव को आईपीसी की धारा- 364 का दोषी पाते हुए शशि के अपहरण के लिए जिम्मेदार पाया. इसी जुर्म के लिए विजयसेन को दस साल की सजा भी सुना दी गई. लेकिन आज भी ये सवाल अनुत्तरित है कि यदि शशि की हत्या नही हुई तो शशि आज 6 साल बाद भी कहां है? जब विजयसेन ने उसका अपहरण किया था जैसा कि उच्च न्यायालय मानता है तो शशि की हत्या के लिए विजयसेन द्वारा उसका अपहरण करना, ये सर्कमटांसेज एविडेंस नहीं है? एक साल बाद यानि शशि के अपहरण या गुमशुदा हो जाने के 7 साल पूरे हो जाने के बाद जब कानूनी तौर पर उसे मरा हुआ मान लिया जाएगा तो क्या न्यायालय विजयसेन व अन्य आरोपियों पर शशि को मरा हुआ मानते हुए पुनः मुकदमा चलाएगा? अगर इन सभी सवालों के जवाब नकारात्मक हैं तो क्या हम कह सकते हैं कि शशि और उसके परिवार को इंसाफ मिल गया? या शशि और उसका परिवार सिर्फ इसलिए इंसाफ के काबिल नहीं क्योंकि वो दिल्ली एनसीआर मे नहीं रहते, वो एक छोटे से फैज़ाबाद जिले के निवासी हैं. क्या सीबीआई भी अब टीवी मीडिया की तरह सिर्फ एनसीआर के मामलों को सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री मानेगी?

क्या अरुषि-हेमराज का मर्डर शशि कांड से ज्यादा बड़ी मिस्ट्री है? जहां उच्च न्यायालय न्याय कर चुका है, प्रॉसिक्युशन उच्चतम न्यायालय मे नहीं गया क्योंकि प्रॉसिक्युशन अब बसपा का नहीं सपा का हो चुका है और इन्ही बदली परिस्थितियों मे तब के आरोपी लेकिन आज के बरी लोग सपा वाले पाले मे जाकर खड़े हो गए हैं. शशि मर चुकी है उसकी लाश भी देखी गई थी. जिस मल्लाह ने उसकी लाश देखी थी सुल्तानपुर के गोमती नदी मे, उसने उसकी कलाई की घड़ी निकालकर वापिस नदी की गहराईयों मे ढकेल दिया था. जिसे पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था. घड़ी भी बरामद की गई थी और तभी हत्या और सम्बन्धित धाराएं अल्टर की गईं थीं. पुलिस ने इस मल्लाह को गवाह बनाया लेकिन जैसा कि होता आया है ये मल्लाह कोर्ट मे पक्षद्रोही हो गया. निचली अदालत ने अपने फैसले मे कहा भी था कि इस कोर्ट रूम के बाहर ही गवाह तोड़े जा रहे थे, उन्हें होस्टाईल किया जा रहा था. कहा जाता है कि आनन्दसेन यादव के शशि से प्रेम सम्बन्ध थे. लेकिन अब शशि उन्हें गले की फांस लगने लगी थी. आनन्दसेन और शशि की बातचीत की पुष्टि कॉल डिटेल भी कर रहे थे.
शशि का मामला नवम्बर 2007 का था जबकि अरुषि का मई 2008 का. शशि काण्ड के आरोपी बहुत ही ताक़तवर और रसूखदार लोग थे, जिनसे एक सामान्य दलित व्यक्ति शशि का बाप लड़ रहा था. दूसरी तरफ अरुषि-हेमराज के मामले मे ऐसा नहीं था. देखा जाय तो सीबीआई ने यूपी पुलिस की उसी बात को 5 सालों तक घसीटा जिसे यूपी पुलिस महज 48 से 72 घंटे मे साफ कर चुकी थी. बहरहाल सीबीआई ने अरुषि मामले को लेने मे जो तत्परता दिखाई थी वो कम से कम मेरी समझ से परे थी, क्योंकि अरुषि मामला ऐसा भी नहीं था कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी उसमें यूं कूद पड़े. अरुषि मामले मे
सीबीआई की तत्परता मेरे लिए आश्चर्यजनक तब और हो गई जबकि वो शशि कांड की जांच करने से साफ इंकार कर चुके थे. बहरहाल आज तो शशि के लिए यही कहा जा सकता है कि “नो-वन किल्ड शशि”.
लेखक चंदन श्रीवास्तव युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. अयोध्या-फैजाबाद से पत्रकारीय जीवन शुरू करते हुए लखनऊ से होते हुए दिल्ली तक पहुंचे. कई न्यूज चैनलों में कार्यरत रहे हैं. न्यू मीडिया के माध्यम से सामयिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप. चंदन से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





