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तिरूपति से पशुपति तक प्रचंड पराजय के बाद माओवाद

बस्तर का एक धुर नक्सल प्रभावित पहुंच विहीन गांव. नक्सलियों ने स्याही लगी अंगुलियों को काट डालने की धमकी दी हुई है. उसके अलावा पर्चे आदि बांट कर मतदान से दूर रहने की हिदायत या फिर अंजाम भुगतने की धमकी भी बस्तर के आदिवासी बंधुओं को मिली है. लेकिन बावजूद उसके लोगों में कोई डर या परवाह न देख नक्सली नया पैतरा गढ़ते हैं. उस गांव को दुनिया से जोड़ने वाले एकमात्र साधन ‘नाव’ को डुबो दिया जाता है ताकि जनता उस पार जा ही नहीं पाए वोट डालने. फिर भी आदिवासी युवा निकलते हैं. गहरे पानी में पैठ कर नाव को निकाला जाता है. दमदार लोग तैर कर तो बुजुर्ग और महिलायें उस नाव पर बैठ कर मतदान करने निकलती हैं. 
बस्तर का एक धुर नक्सल प्रभावित पहुंच विहीन गांव. नक्सलियों ने स्याही लगी अंगुलियों को काट डालने की धमकी दी हुई है. उसके अलावा पर्चे आदि बांट कर मतदान से दूर रहने की हिदायत या फिर अंजाम भुगतने की धमकी भी बस्तर के आदिवासी बंधुओं को मिली है. लेकिन बावजूद उसके लोगों में कोई डर या परवाह न देख नक्सली नया पैतरा गढ़ते हैं. उस गांव को दुनिया से जोड़ने वाले एकमात्र साधन ‘नाव’ को डुबो दिया जाता है ताकि जनता उस पार जा ही नहीं पाए वोट डालने. फिर भी आदिवासी युवा निकलते हैं. गहरे पानी में पैठ कर नाव को निकाला जाता है. दमदार लोग तैर कर तो बुजुर्ग और महिलायें उस नाव पर बैठ कर मतदान करने निकलती हैं. 
 
केरल से भी बड़े बस्तर में 75 प्रतिशत से ज्यादा मतदान होता है. चप्पे-चप्पे पर चुनाव आयोग समेत देश-विदेश के मीडिया के कैमरों की नज़र है. इतनी पारदर्शिता के बाद किसी भी तरह की धांधली की बात करने का बहाना नहीं मिलता नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों को और बस्तर जीत जाता है. लोकतंत्र को फतह हासिल होती है. राजनीतिक दलों की जीत-हार भले 8 दिसंबर को तय हो लेकिन दुनिया की सबसे कम बुरी प्रणाली जनतंत्र तुरत ही फतह हासिल कर लेता है और इस फतह के सेनापति होते हैं बस्तर के वही आदिवासीगण जिन्होंने कभी गुन्डाधुर के नेतृत्व में बदमाशों के दांत खट्टे किये थे तो कभी ‘कोई’ विद्रोह समेत दर्ज़नों विद्रोह की अगुआई कर अपनी वीरता और देश भक्ति का पताका फहराया था. 
 
हथियारबंद गुरिल्लाओं के मूंह पर निहत्थे युवको का यह तमाचा ऐसा है जिसकी गूंज सदियों तक सुनाई पड़नी है. इसके अलावा यह मतदान उन मुट्ठी भर आततायी दुर्जनों-सफेदपोशों को भी मुहतोड़ जबाब देने वाला है जिन्हें दरभा हमला अनुशासित हिंसा लगता है. झीरम दुष्कृत्य जिन्हें जनता का प्रतिशोध नज़र आता है. यह सवाल पूछने पर इन बुद्धिजीवियों को हाथ ही मलते रह जाना है कि देश में सबसे ज्यादा मत प्रतिशत के साथ लोकतंत्र के पक्ष में मत देने निकलते हैं बस्तर के आदिवासी. चुनाव परिणाम हमेशा पक्ष में जाता है सत्ताधारी दल के. खुर्दबीन लेकर खड़े देशी-विदेशी मीडिया को कहीं भी कोई धांधली की शिकायत भी नहीं मिलती. फिर वो कौन सी जनता है जो नक्सलियों के पक्ष में सरकार के खिलाफ खड़ी है? ब्रेख्त की कविता जैसे अपनी जनता खुद चुन लेने वाले ऐसे लोगों को बस दण्डित कर दीजिये, उनका बहिष्कार कीजिये. तय मानिए इतने से ही राष्ट्र की आन्तरिक सुरक्षा पर सबसे बड़े खतरे के रूप में परिभाषित माओवाद का भारत में सफाया होना सुनिश्चित होगा. समस्या कहीं से भी छग के बाहर से आये मुट्ठी भर आतंकी नहीं हैं. समस्या हैं तो पाकिस्तानी ‘फाई’ के पे-रोल काम करने वाले चंद भाड़े के टट्टू. बहरहाल.
 
आइये अब तिरुपति से हटकर ज़रा ‘पशुपति’ की ओर, मूर्खों के स्वर्ग कथित लाल गलियारा के दूसरे छोर की तरफ का रुख करें. वहां भी साथ ही चुनाव हो रहे थे. बस फर्क इतना था की ‘स्याही लगी’ अंगुली काट लेने वाले लोग वहां अपनी अंगुली दमदारी से आगे किये हुए थे कालिख लगाने को. अजीब विरोधाभास है कि भारत में लोकतंत्र के खिलाफ लड़ने वाले गिरोह वहां लोकतंत्र के लिए ही संघर्षरत रहे हैं. कमजोर राजशाही के कारण वहां उनको लोकतंत्र मिला भी. लेकिन चंद साल भी उसे सम्हाल कर रख नहीं पाए वे. माओ आन्दोलन के अगुआ रहे नेता ‘प्रचंड’ के हाथ ही सत्ता आयी. प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रचंड अगर जाने गए तो बस अपनी विलासिता और पांच लाख के पलंग के कारण ही. सत्ता हासिल करने के बाद सबसे प्रसिद्ध बयान उनका यही आया था की ‘गुरिल्ला आन्दोलन चलाना काफी आसान है लेकिन लोकतंत्र में सत्ता चलाना काफी कठिन.’ यानी आबादी के हिसाब से छग से भी छोटे देश का सत्ता नहीं चला पाने वाले अक्षम लोग जब सवा सौ करोड़ वाले देश में चल रहे दुनिया के सबसे अच्छे लोकतंत्र की आलोचना करते हैं, इसे बदलने भारत में खून की होली खेलने को तैयार होते हैं तो इनसे आप केवल तर्कों से पेश तो नहीं आ सकते. खैर. चुनाव परिणाम नेपाल में भी आ गए हैं. वहां भी परिणाम बस्तर की तरह ही माओवाद के खिलाफ ही गए हैं. खुद प्रचंड की तो करारी हार हुई ही है, उनकी बेटी रेणु ने भी प्रचंड हार का रिकार्ड अपने नाम किया है.
 
तो तिरुपति से पशुपति तक के इन दोनों उदाहरणों ने यही तो समझाया है कि माओवाद के साथ और जो कुछ हो कम से कम जनता तो नहीं है. लेकिन आश्चर्य यह की जहां भी इनकी दूकान है वहां ये ‘जनता’ को ही अपना ग्राहक और गरीबी को ही अपना उत्पाद मानते हैं. आज अगर चीन भी इनके बावजूद वहां विकास कर रहा है या वहां उनकी सत्ता कायम है तो महज़ इसलिए कि एक तो वहां लोकतंत्र नहीं है और दूसरा सबसे पहले उन्होंने माओ विचार से अधिकृत-अनधिकृत तौर पर पीछा छुड़ाते पूंजीवाद और प्रखर राष्ट्रवाद को अपनाया है.
 
सवाल महज़ इतना है की तर्कों का जबाब तो तर्क से दिया जा सकता है. विचार विमर्श तो निश्चय ही लोकतंत्र की प्रमुख शर्त भी है. लेकिन अगर कोई आपके कनपटी पर बंदूक सटा कर अपनी बात जबरन मनवाने को खड़ा रहे तो क्या किया जा सकता है? और उससे भी आपत्तिजनक बात यह कि तमाम तर्कों को खुद के खिलाफ जाते दिखने के बाद भी पेड बुद्धिजीवी तमाम तरह के कुतर्क के साथ गोलियों की आवाज़ को सही बताएं. दरभा घाटी में एक राजनीतिक दल की पूरी पीढ़ी को ही खत्म कर देने का जश्न मनाएं. ताड़मेटला, रानीबोदली, मदनवाड़ा आदि में किये गए जनसंहार को अपनी उपलब्धि बतायें. एर्राबोर में डेढ़ वर्ष की बच्ची ‘ज्योति कुट्टयम’ को ज़िंदा जला दिए जाने समेत साठ से अधिक निरपराध जनता की निर्ममता पूर्वक ह्त्या को जनक्रांति बतायें. ऐसे में विकल्प क्या रह जाता है आखिर? निश्चय ही राज्य को चाहिए की ऐसे गुरिल्लाओं से गुरिल्ला तौर-तरीके अपना कर ही निपटा जाय. Fight Gurilla like A Gurillaa को मूलमंत्र बनाया जाए.
 
पुलिस महानिदेशकों के चल रहे सम्मलेन में आईबी प्रमुख ने ठीक ही कहा है की ‘नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया जाना ज़रूरी है.’ निश्चय ही खुफिया तन्त्र को मज़बूत कर एक हिट-लिस्ट बनाया जाना चाहिए. विचार-विमर्श में समय खोने की ज़रुरत नहीं बची है अब. ऊपर के सारे उदाहरण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं की माओवादी आतंक कम से कम कोई जनयुद्ध नहीं है और न ही यह कोई आन्दोलन है. ढेर सारे आंकड़े इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि यह सिर्फ और सिर्फ एक संगठित गिरोह और धंधा बन गया है. इसे निपटाना भी उसी तरीके से संभव है. निश्चय ही आईबी को अपना टार्गेट न केवल हार्डकोर नक्सलियों को रखना चाहिए बल्कि उन्हें बौद्धिक समर्थन देने वाले प्रचारकों पर भी उन्हें कड़ी नज़र रखने की ज़रुरत है. यही वो समय है जब नक्सल समस्या के खात्मे के लिए सर्वानुमति बना कर इस चुनौती से पार पाया जा सकता है. कल को कहीं देर न हो जाय. छत्तीसगढ़ की आदिवासी जनता और नेपाल की गरीब कमज़ोर जनता ने भी माओवाद के खिलाफ जो एकजुटता दिखाई है उस पर अभी गौर ना कर हम निश्चय ही इस संकट से पार पाने को तमाम राजनीतिक विरोध को ताक पर रख कर एकजुट नहीं हुए तो इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा. हम अपने ही नागरिकों के भविष्य से खिलवाड़ करने के भागी माने जायेंगे. तो हमें यह तय करना होगा कि लोकतंत्र और माओवाद में छिड़ी है जंग, आप है किसके संग. 
 
लेखक पंकज झा पत्रकार और बीजेपी नेता है. वर्तमान में वे दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं. इनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.
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