तुरंता न्याय का धंधा करने वाले मीडिया के कुछ अपने दुष्ट न्याय हैं: पहला न्याय यह है कि जो मीडिया से मारता है वह मीडिया से मरता है. जो मीडिया से शिकार करता है वह एक न एक दिन मीडिया का शिकार बनता है. दूसरा यह कि मीडिया का यह दुष्ट न्याय एक-दूसरे को नीचा दिखाने की मध्यवर्गीय चैनल एंकरों की आपसी होड़ से पैदा होता है. इस न्याय के अनुसार भयानक कंपटीशन में पली-बढ़ी अपनी ही बिरादरी अपनों से ही हिसाब चुकता किया करती है. एक समय जो तेजपाल ने किया उसी का हिसाब उनकी बिरादरी उन्हीं से चुकता कर रही है.
तेजपाल प्रकरण की रिपोर्ट और बहसें बताती हैं कि हर एंकर, हर रिपोर्टर संपादक तरुण तेजपाल की पिछले दिनों की हेकड़ी और कीर्ति से जलता है और अब उनसे निपटने के लिए हाथ आए मौके किसी कीमत पर छोड़ने वाला नहीं है. तरुण तेजपाल की कहानी और उसका चैनल ट्रीटमेंट एक चेतावनी भी दे रहा है: अपनी सहकर्मी पत्रकार के साथ तरुण तेजपाल द्वारा किए गए बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की रिपोर्टिंग और चर्चा प्रकरण में कई एंकरों की तुरंत मुकदमा चलाकर तुरंत फैसला देने की आदत एक दिन उन्हें भी कठघरे में खड़ा करने वाली है.
यह आपराधिक कहानी पत्रकारिता द्वारा छिपाई हुई अपनी अंदर की गिरावट को उजागर करने वाली कहानी है. इस कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह मीडिया की हेकड़ी को धूल-धूसरित करती है.विडंबना देखिए कि कुछ दिन पहले तक तहलका की जो मैनेजिंग एडिटर चैनलों पर पैनलिस्ट बनकर बड़ी रेडीकल मुद्रा में पोजीशन लेती रही हैं, वही सहकर्मी पत्रकार के लिए न्याय की गुहार करने की जगह मालिक तरुण तेजपाल का कथित बचाव करती नजर आई हैं. अब उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा है.
इस कहानी में तहलका की क्रांतिकारिता की नाक के नीचे बनते स्त्री विरोधी कल्चर की कहानी भी है, जो कहती है कि दीपक तले सिर्फ अंधेरा नहीं होता, अंधेर भी होता है! अब भी तथाकथित क्रांतिकारी पत्रकारिता की नाक के नीचे न केवल घुप अंधेरा है, बल्कि अंधेर भी है. यह भी एक विडंबना है कि स्त्री की अस्मिता के पक्ष में हर रोज खड़े दिखने वाले मीडिया के पास स्त्री को न्याय प्रदान करने वाली प्रक्रियाओं का अभाव रहा है और इस केस से पहले आज तक किसी ने भी इस बारे में नहीं सोचा!
जिस मीडिया में बड़ी संख्या में स्त्रियां काम करती हैं उसी में उनकी हिफाजत के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है. यह सोचकर महसूस होता है कि मीडिया स्त्री-हित के सवालों पर गाल भले बजाए लेकिन उसका मूल नजरिया उसे ‘उपभोग्य सामग्री’ बनाने वाला है जो उसके विज्ञापनों में खूब दिखता है, जिनके बिना वह एक दिन नहीं चल सकता.
इस घटना ने बताया है कि जब अपने भीतर न्याय देने की बात आई तो सारा मीडिया बगलें झांकता फिरा. यह उसके न्यायबोध पर अपने आप एक टिप्पणी है. जो अपने भीतर न्याय की प्रक्रिया से रहित है वह हर रोज मुकदमा चलाकर बाहर की दुनिया से किस तरह न्याय का आग्रह कर सकता है?तेजपाल के इस आपराधिक प्रकरण के प्रसारण के दौर में मीडिया के अपने अंतर्विरोध भी उजागर हुए हैं और तहलका के साथ बाकी के तहलकाबाज मीडियाकर्मी भी नंगे हुए हैं, उनका पाखंड उजागर हुआ है. जो चैनल तरुण तेजपाल को तुरंत सजा देने, गिरफ्तार करने की मांग करते रहे; वे दरअसल अपने उसी अधूरे रेडीकल मुहावरे में काम कर रहे थे जिसमें तहलका काम करता रहा था और अब जब तहलका कठघरे में था तो वे तहलका पर लग लिए जबकि यह कहानी उनकी भी कहानी थी और है!
यह बात किसी मामूली पत्रकार ने नहीं, बल्कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता ने एक चैनल के एक एंकर से एक बहस में कही कि पहले मीडिया अपने गिरेबान में झांक कर देखे. बड़े पत्रकार भी झांक कर देखें कि वे अपनी जूनियरों के साथ क्या-क्या करते रहे हैं? इस प्रकरण से तहलका का डबल स्टैंर्डड तो उजागर हुआ ही है, मीडिया के अन्य संस्थानों का दोहरापन भी उजागर हुआ है.
तरुण तेजपाल के यौनापराध का प्रसंग स्त्रीत्ववादी विमर्श की सरहदों की लड़ाइयों का दौर है. मीडिया के भीतर और बाहर दो तरह की दुनिया बन गई है: एक दुनिया परंपरागत ठहरे हुए सोच की है जो स्त्री का हित तो चाहती है लेकिन ठीक आधुनिक स्त्रीत्ववादी विमर्शकारों की तरह नहीं सोचती, न वह कानून की धाराओं के परिणामों के प्रति सजग है. दूसरी सोच तेज झटके की तरह आती है. वह आरोप को चरम और परम मानकर चलती है.
मीडिया के तुरंतावादी न्याय-बोध के साथ यह न्याय-बोध पूरी तरह सिंक कर जाता है. नतीजतन आरोपित की छवि एक सतत और ‘प्रमाणित रूप से’ दागी बनती जाती है. देखते-देखते आरोप सत्य का रूप धारण कर लेते हैं. पब्लिक का एक माइंडसेट बन जाता है. इस बार मीडिया की मुकदमेबाजी को लेकर बात यहां तक गई है कि वकीलों ने कहा है कि मीडिया माइंडसेट तैयार कर देता है जिसका असर न्याय की प्रक्रिया पर पड़ सकता है.
ऐसे बहुत से सबक हैं जो मीडिया को सीखने हैं और विमर्शकारों को समझने हैं. मीडिया ‘न्याय लाघव’ का शिकार हो रहा है. यह उसके लिए भला नहीं. जिस तरह तहलका ने ‘न्याय लाघव’ से अपने दुश्मनों का शिकार किया, उसी तरह बाकी मीडिया भी ‘न्याय लाघव’ से शिकार बनाता है. नतीजा कि मीडिया में या तो आरोप बचे हैं या निरी आत्मरक्षा बची है.
उदाहरण के लिए जब तेजपाल पर बात आई तो तेजपाल के वकील कानून की ही आलोचना करने लगे कि वर्तमान कानून बड़ा ही ड्रेकोनियन (कठोर) है! जाहिर है कि अब आशंका स्वयं एक ‘स्थिति’ बन रही प्रतीत होती है. क्या परस्पर आशंका के वातावरण में सामाजिक न्याय की वह व्यवस्था तैयार हो सकती है जिसके लिए आम स्त्री लड़ रही है?
लेखक सुधीश पचौरी जाने-माने मीडिया विश्लेषक हैं.





