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कैसे बचेंगे सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे भ्रष्ट शासन से

‘ये जो पब्लिक है ये सब जानती है पब्लिक है!’ रोटी फ़िल्म में किशोर कुमार द्वारा गाया गया यह गीत तो हम सभी को याद ही है। पर इसका महत्त्व शायद हम भूल चुकें हैं. पब्लिक सब जानती तो है, पर एक बोतल शराब और चंद रुपयों के लिए अपने ज़मीर, अपनी आत्मा, अपनी सत्ता को दांव पर लगा देती है। यही पब्लिक है जो एक चोर एक महाचोर के फेर में चोर को महाचोर बना देती है। अब कैसे कहें कि ये पब्लिक सब जानती है। 
‘ये जो पब्लिक है ये सब जानती है पब्लिक है!’ रोटी फ़िल्म में किशोर कुमार द्वारा गाया गया यह गीत तो हम सभी को याद ही है। पर इसका महत्त्व शायद हम भूल चुकें हैं. पब्लिक सब जानती तो है, पर एक बोतल शराब और चंद रुपयों के लिए अपने ज़मीर, अपनी आत्मा, अपनी सत्ता को दांव पर लगा देती है। यही पब्लिक है जो एक चोर एक महाचोर के फेर में चोर को महाचोर बना देती है। अब कैसे कहें कि ये पब्लिक सब जानती है। 
 
हम सभी जानते हैं कि चुनाव की घोषणा होते ही सडकों के पिछले पांच सालों से उभरे खड्डों को भरने की कवायद शुरू हो जाती है, पानी आना शुरू कर देता है, बिजली कुछ मिनट के लिए भी नहीं जाती, नालियों और नालों की सफाई व्यवस्था पर ज़ोर दिया जाने लगता है. पांच साल पुराने मेनिफेस्टो (जिसमें वर्णित वादों को अब तक तो पूरा नहीं किया गया था) अचानक कुछ नए बदलावों के साथ हमारे सामने पेश कर दिया जाता है, नई-नई नस्ल के उम्मीदवार विभिन्न वादों के साथ हमारी हर समस्या का हल लेकर हमारे सामने प्रकट हो जातें है, इनसे कोई ये पूछिए के भई पिछले पांच सालों तक आप कहां थे, यहीं थे या विदेश घूमने चले गए थे।
 
राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता विभिन्न वादों को लेकर ये साबित करने में जुट जाते हैं कि हम आपके लिए क्या कर सकते हैं. ज़रा बता ही दीजिये क्या कर सकते हैं आप? अभी तक कम खून चूसे हैं जो आने वाले पांच सालों का भी ठेका लेने को आमादा है। अरे जितना खर्च आप चुनाव प्रचार में कर देते हैं, उतना अगर ईमानदारी से जनकल्याण में लगा दे तो वाकई विकास का हम कुछ और ही रूप देख सकते हैं। पर विकास से क्या लेना देना अपनी कमाई जिंदाबाद। और एक बार सत्ता हाथ में आई तो माशा-अलाह अब तो हम दबंग हैं। और हम इतने मूर्ख हैं कि उनकी कमाई का ज़रिया आसानी से बन जाते हैं, अरे अपने विकास का जरिया बनो तो जानें। कहते हैं बदलाव हो रहा है कहां है बदलाव हम तो आज़ादी के बाद से सुनते पढ़ते आ रहे हैं राजनीति में कोई बदलाव नहीं हुआ जब जब बदलाव का प्रयास किया हमारी आवाज़ों को दबा दिया गया। तो कहां है विकास कहां है बदलाव?
 
क्या इसे विकास कहा जा सकता है? आज घूसखोरी, कमीशन लोगों के लिए व्यवसाय, रोजगार बन चुका है। सरकारी महकमे, विभाग और थाने आज भ्रष्टाचार का केंद्र बन चुके हैं। जहां देखो वहां भ्रष्टाचार अपनी पैठ बना चुका है। अगर पैसा है तो काम भाग कर होगा वर्ना सरकारी काम है तरीके से होता है। धीरे धीरे हो जाएगा। जिसके पास पैसा नहीं है वो काम करने के लालच में कर्ज करके पैसा ला रहा है जो काम कायदे से होना था। कम समय में होना था, उसके लिए पैसा देना पड़ रहा है। कितनी विडम्बना की बात है। यहां वही सवाल खड़ा हो जाता है जो पहले भी कई बार हमारे सामने आ चुका है कि क्या हम ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? अगर हम ही घूस देने से मना कर दे तो क्या भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होगा? आसानी से कहा जा सकता है हम कितने भी प्रयास कर लें घूसखोरी भ्रष्टाचार कभी खत्म होने वाले नहीं है, क्योंकि अगर आप घूस देना बंद भी कर दें जिनके लिए ये रोज़गार है वो कोई दूसरा रास्ता ढूंढ लेंगे। अरे भाई हम जुगाड़ू लोग हैं और हमारे देश में उम्मीद पर नहीं जुगाड़ पर दुनिया कायम है। इसके अलावा जब राजनैतिक पार्टी और उसके नुमाइंदों पर ही घूसखोरी और घोटालों के इलज़ाम है तो सोच लें कौन बचाएगा आपको इस सबसे बड़े लोकतंत्र के भ्रष्ट शासन से? जब राजा ही चोर हो तो प्रजा कहां बचेगी? 
 
अगर दफ्तरों की ओर देखें तो पता चलता है कि एक क्लर्क जो दफ्तर में पानी पिलाने वाले के जितना ही पढ़ा लिखा होता है। वो हमारे आपके लिए साहब है, और आम जनता के लिए सभी सरकार लोग साहब ही हैं। तो जब साहब ही पानी पिलाने वाला हो तो काम तो पैसा देकर ही करवाना पड़ेगा, आप खुद ही सोच लीजिये उत्तर आसानी से मिल जाएगा।
 
आज़ादी के समय में तो था ही, आज भी यह प्रथा चलन में है कि अनपढ़ और कम पढ़े लिखे लोगों को कोई यह बताने वाला नहीं है कि यह सरकारी साब फिर वह चाहे उच्च पद पर आसीन हो या पानी पिलाने वाला, ये सभी आम जनता के नौकर हैं। इनके घरों में जो रोटी बनती है वह जनता के खून पसीने से जमा किये गए टैक्स और सरकारी भुगतानों से बनती है। मोटी कमाई करने वाले ये साहब फिर भी ऊपरी मलाई की ताक में रहते हैं। हमें हमारे संविधान ने यह अधिकार दिया है कि हम इनसे कोई भी जानकारी, कोई भी काम करा सकते हैं और ये साहब उसे करने के लिए बाध्य हैं, यह हमारा अधिकार है। फिर हम अपने अधिकार को इस्तेमाल करने का पैसा क्यों दें?
 
अगर आसान शब्दों में कहें तो घूसखोरी एक ऐसी लत है जो एक बार लग जाए तो चाहकर भी पीछा नहीं छोड़ती। यूं तो कोई चाहता ही नहीं इससे अपना पीछा छुड़ाना, क्योंकि कोई अपने पेट पर लात कैसे मार सकता है। ये तो साधन है साहब लोगों और राजनीति से जुड़े लोकतंत्र के हितैषियों की ऊपरी मलाई का। आपके दूध की मलाई अगर आपको मिलनी बंद हो जाए तो आप क्या करेंगे, वही करेंगे ये लोग घूसखोरी बंद होने पर। फिर चाहे वह सही रास्ता हो या गलत। 
 
अब देखना है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में क्या होता है? क्योंकि सभी दल अपने को बड़ा और बेहतर साबित करने की दौड़ में लग गए हैं। क्या भ्रष्टाचार और घूसखोरी इस बार के चुनाव का अहम मुद्दा होगा? या कुछ प्रलोभन देकर फिर इस पब्लिक को जो सब जानती है फंसा लिया जायेगा?
 
लेखक अश्वनी कुमार से  [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.
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