Nadim S. Akhter : चुनाव का वक्त उन नेताओं-सीएम-पीएम के लिेए कितना बेदर्द और दुखदायी होगा, जिन्हें पता होता है कि उनकी सत्ता-कुर्सी-गद्दी जा रही है. एक-एक करके वे सारी गलतियां याद करते होंगे कि हाय, ये ना किया होता तो अच्छा होता, वो ना किया होता, तो कितना अच्छा होता. लेकिन जब तक चुनाव नहीं आते, ये कुर्सी पर विराजमान होके लालबत्ती गाड़ी में घूमते हैं, तो अपने आपको भगवान से कम नहीं आंकते. जनता को अपना चाकर समझते हैं और ये बात हर राजनीतिक पार्टी पर लागू होती है. लेफ्ट-राइट-बीच वाले, सब पे.
अभी देखिए कि दिल्ली की मौजूदा सीएम शीला दीक्षित को कैसे अपनी कुर्सी सरकने का आभास हो गया तो उन्होंने अपनी रैली ही कैंसिल कर दी. प्रचार खत्म होने के आधे घंटे पहले ही घर आ गईं कि अब कोई फायदा नहीं. पब्लिक रिस्पॉन्स नहीं दे रही. कैसे देगी भइया, आपने इन वर्षों में पब्लिक को इतना रुलाया जो है. देखते हैं कि ऊंट किस करवट बैठता है. Times of India की इस खबर को देखकर तो यही लगता है कि पब्लिक का मूड अरविंद केजरीवाल के सपोर्ट में है. कांग्रेस और बीजेपी, दोनों को वो खारिज कर रही है. देर से ही सही, बीजेपी अब मान रही है कि आम आदमी पार्टी एक serious contender है. हवा का रुख समझिए, सोच-विचार कर वोट डालिए. पढ़िए ये रिपोर्ट…
तेजतर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.






