Chanchal Bhu : 'विकास' एक लंगड़ा पहलवान है. कागज़ में अच्छा लगता है. जमीन पर इसे देखिये तो हाँफते हुए चलता है. उदाहरण के लिए हम सड़क को लेते हैं. केन्द्र ने अच्छी योजना दी. प्रधानमंत्री सड़क योजना. गाँव को मुख्य सड़क मार्ग से जोड़ दो. जुड़ गयी. मजेदार आंकडा देखिये. सार्वजनिक निर्माण विभाग, ठेकेदार और राजनीति ने सड़क निर्माण में अपनी साझेदारी दिखाते हुए लाभ का बंटवारा तो कर लिया. अब इसकी उपयोगिता देखिये. इस पर साइकिल, ट्रैक्टर और यदाकदा निजी वाहन चले और सड़क गड्ढे में चली गयी.
सड़क महकमे का केवल एक रिश्तेदारी बनती है वह है परिवहन विभाग. लेकिन दोनों विभागों में कोई लेना देना नहीं. इस मामले में हम मायावती जी सरकार के एक मंत्री राम अचल राज भर का जिक्र करना चाहूँगा. हमने इस विषय पर 'अमर उजाला' के अपने एक कालम में इसका जिक्र किया. यह नहीं कहते कि उसने हमारे कहने पर इसे संज्ञान में लिया लेकिन बहुत दमदारी का काम किया. और जनता का आह्वाहन किया कि वह सीधे हमारे विभाग को लिखे कि कहाँ से कहाँ तक बस चलाई जा सकती है. बड़ा अच्छा कदम था. हमने अपने गाँव का लिखा. गाँव पूरालाल से बनारस तक. बस चल गयी. लेकिन ज्यों ही सरकार बदली बस बंद. बगैर किसी कारण के. इस तरह के बुनियादी सवालों को हल करने के लिए यह सरकार तैयार नहीं है. क्योंकि सड़क का ठेकेदार, सड़क मंत्री और परिवहन मंत्री एक ही जमात के हैं.
इस सरकार की पहली दिक्कत है दृष्टि दोष. यह रहेंगे उत्तर प्रदेश में और सपना देखेंगे, हरियाणा, कर्नाटक महाराष्ट्र का. मजे की बात यह कि यह सब दिखाने का काम करता है कलम घिस्सू 'बाबू'. जिसे नौकरशाही कहा जाता है. इससे इन बाबुओं को दो फायदा होता है. एक फ़ाइल चल रही है, दूसरा मंत्री को ऐसा लाग लपेट में डाल देगा कि मालिक नौकर बन जाता है और नौकर मालिक. इस सरकार से पूछा जाय कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? इस सरकार की वरीयता क्या है? इस मुद्दे पर सरकार चुप्पी साध लेती है.
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र है. लेकिन खेती पर सबसे ज्यादा उदासीन सरकार है. पिछले बीस साल से खेती पर सरकार चुप है. विधान सभा, विधान परिषद के अंदर इस पर कोई बात नहीं हुई है. प्रतिपक्ष में बैठी कांग्रेस और भी निठल्ली साबित हुई है. विधान सभा के सामने प्रदर्शन कर देने के टोटके के अलावा कोई ठोस पहल नहीं हुई. कांग्रेस को चाहिए था कि खेती पर एक नीति बना कर उसे प्रस्तुत करते. उदाहरण के लिए गन्ना नीति क्या है? आज उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों ईख की कमी के चलते किसान परेशान हैं. किसान पूछ रहा है- क्या गन्ना को खेत में ही जला दिया जाय? चौधरी चरण के जमाने में यह हो चुका है. सरकार और कांग्रेस दोनों को इस पर तैयारी के साथ उतरना चाहिए. हम भाजपा और साम्यवादियों का जिक्र नहीं कर रहे हैं क्योंकि भाजपा का किसानों से कोइ रिश्ता नहीं है और साम्यवादी उत्तर प्रदेश में लुंजपुंज हो गए हैं.
विधान सभा में यह सवाल उठना चाहिए- इस सूबे में कितनी चीनी मिलें थी? उन मिलों को खोलने के लिए सरकारों ने किसान से किस भाव जमीन खरीदी थी. उस पर कितना लागत आया था? वे मिलें बंद क्यों हुयी? और फिर उन मिलों को सरकार ने किस भाव बेचा और किसको? अगर चीनी मिलें नहीं हैं तो मिलों का विकल्प क्यों नहीं दिया गया? उदाहरण के लिए खांडसारी की विकेंद्रित और कम लागत व्यवस्था. आज खेती का उत्पाद कारखाने के उत्पाद का सबसे बड़ा स्रोत है. दोनों के बीच क्या रिश्ता है? उदाहरण के लिए आलू खलिहान का उत्पाद है. और उससे बनने वाला चिप्स कारखाने का उत्पाद है. दोनों के बीच कितने प्रतिशत का मुनाफ़ा हो रहा है? जनाब उत्तर प्रदेश सरकार, आप खेती नीति पर सार्थक कार्यक्रम बना कर न केवल सूबे को बल्कि पूरे देश को चौकन्ना कर सकते हैं. यह नहीं करोगे तो मरो जैसे मरने की आदत बनी है.
चंचल के फेसबुक वॉल से. चंचल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. वे रंगकर्मी, लेखक, पत्रकार, नेता होने के साथ-साथ चिंतक-विचारक भी हैं.





