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अवधेश कुमार को भी लगता है कि आसाराम पर बहस ने टीवी बहस का स्तर गिराया है

Awadhesh Kumar : इंडिया न्यूज पर आसाराम बापू बहस… कई मित्रों ने पूछा कि आज रात आठ बजे श्री दीपक चौरसिया के साथ इंडिया न्यूज पर नारायण साई वाली बहस में मैं क्यों नहीं था। मुझे बुलावा आया था, और पहले मैंने विशेष आग्रह पर सहमति भी दे दी थी, लेकिन बाद में मैंने मना कर दिया। कारण, ऐसे गंदे आरोपों पर बहस में अपना स्तर गिरता है।

Awadhesh Kumar : इंडिया न्यूज पर आसाराम बापू बहस… कई मित्रों ने पूछा कि आज रात आठ बजे श्री दीपक चौरसिया के साथ इंडिया न्यूज पर नारायण साई वाली बहस में मैं क्यों नहीं था। मुझे बुलावा आया था, और पहले मैंने विशेष आग्रह पर सहमति भी दे दी थी, लेकिन बाद में मैंने मना कर दिया। कारण, ऐसे गंदे आरोपों पर बहस में अपना स्तर गिरता है।

कई लोगों को आपत्ति थी कि मैं बहस में जाता क्यों हूं। आप सबने देखा होगा कि कई-कई दिन मैं नहीं गया। फिर मित्रों के आग्रह पर कई बार जाना पड़ता है। पत्रकार होने के नाते एकदम से बहिष्कार करना न उचित है और न इससे कोई लक्ष्य सधता है। बिल्कुल न जाना भी कोई विकल्प नहीं है। इससे ओछे मुद्दे पर भी कुछ गंभीर, सार्थक, तटस्थ और विवेकयुक्त विचार देश में जाना रुक जाएगा जो मेरा उद्देश्य रहता है।

मेरा मानना है कि आसाराम बापू पर बहस ने टेलीविजन बहस का स्तर गिराया है। ऐसे लोग राष्ट्रीय चैनलों पर आए जिन्हें शायद मुहल्ले में भी कोई न सुनना चाहे। स्वयं गंदे आरोपों में जेल जाने वाले जीतू जैसे लोग अपने पैसे के बल पर पत्रिका निकालकर पत्रकार के रुप में बहस में बैठते हैं। भाषा शब्द और सोच सब पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है।

India News से मेरा जुड़ाव बेहरत पत्रकारिता के लिए था और मैंने आसाराम प्रकरण पर आन एअर एवं पीछे भी जितना संभव था विरोध और समझाने की कोशिश की, जो आप सबको पता नहीं होगा। मेरे पर कुछ कुंठाग्रस्त लोगों ने चैनल से मिलीभगत का भी आरोप लगा दिया। आखिर मिलीभगत क्यों होगी? इसका कुछ कारण भी तो चाहिए। पूरा जीवन अपने मूल्यों और सिद्धांतों पर जीने वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह आरोप दुष्कर्म जैसा ही था। किसी का मुंह तो नहीं रोक सकता।

आप लोग इस प्रश्न का उत्तर दीजिए कि हमलोग इस बहस को गलत मानते हैं, लेकिन इससे चैनलों का टीआरपी बढ़ता है। आखिर लोग क्यों देखते हैं ऐसी बहस? वे न देखें तो चैनल इसे चलाएं ही नहीं। लोगों के देखने से हमारी अंदर या लाइव लड़ाई कमजोर पड़ती है।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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