Anand Pradhan : दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) ने कांग्रेस-भाजपा को कड़ी चुनौती दी है. लेकिन उन्हें वोट और सीटें कितनी मिलेंगी, इसे लेकर भ्रम और कयास बने हुए हैं. कई लोगों को लग रहा है कि ‘आप’ को वोट देना बेकार तो नहीं जाएगा?
मुझे १९९१-९२ के बी.एच.यू छात्रसंघ चुनाव की याद आ रही है जिसमें मैं आइसा की ओर से पहली बार अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहा था. हमारे मुकाबले एन.एस.यू.आई, ए.बी.वी.पी, छात्र जनता, समाजवादी छात्र सभा आदि के उम्मीदवार न सिर्फ पानी की तरह पैसा बहा रहे थे बल्कि धर्म, जाति और क्षेत्र के नामपर खुली गोलबंदी कर रहे थे. हमारे पास न पैसा था, न जाति-क्षेत्र की गोलबंदी थी और न ही बाहुबलियों की फ़ौज थी. उल्टे हम इसके खिलाफ लड़ रहे थे.
अधिकांश लोगों को लगता था कि हमलोग पढ़ने-लिखने वाले लड़के हैं, अच्छी बातें करते हैं लेकिन दो-ढाई सौ से ज्यादा वोट नहीं मिलेंगे. यह कि हम लड़ाई में नहीं हैं, हमें वोट देने का मतलब वोट बर्बाद करना है. इसके बावजूद हमारे अभियान को सैकड़ों छात्र-छात्राओं की बहुत उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया मिल रही थी. खुद मुझे भी लगता था कि इस माहौल में पांच सौ वोट भी काफी रहेंगे.
लेकिन जब नतीजे आए तो पता चला कि मुझे साढ़े ग्यारह सौ से ज्यादा वोट मिले और हारने के बावजूद मैं तीसरे स्थान पर रहा. जीतनेवाले उम्मीदवार से सिर्फ तीन सौ वोटों का अंतर था. विज्ञान और मानविकी संकाय और शायद महिला महाविद्यालय में मुझे सबसे ज्यादा वोट मिले. इस नतीजे ने सबको चौंका दिया. कई छात्र यह कहते मिले कि हमें मालूम होता कि आइसा को इतने वोट मिल रहे हैं और आप मुकाबले में हैं तो हम आपको ही वोट देते.
उसके बाद अगले साल हमें बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी. मैं आसानी से चुनाव जीत गया. दिल्ली के चुनाव में क्या कुछ वैसी ही स्थिति बनती दिखाई पड़ रही है?
आनंद प्रधान के फेसबुक वॉल से.





