Vikas Mishra : वीकली ऑफ और पत्नी का व्रत। कानपुर से जेपी त्रिपाठी जी का फोन आया, पूछा-क्या कर रहे हैं, मैंने कहा-आलू की भुजिया बना रहा हूं। त्रिपाठी जी बोले-क्यों चोखा क्यों नहीं बना रहे हैं। मैंने कहा-बेटे को ज्यादा पसंद नहीं है। उसको चोखा परोसकर, मैं चोखे का इगो हर्ट करना नहीं चाहूंगा। जी हां-चोखा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का बेहद आसान डिश। मुझे जानने वाले जानते हैं कि ये मुझे कितना पसंद है, खाना भी और बनाना भी।
हाल में ही कानपुर गया था, जेपी त्रिपाठी जी के यहां पहुंचा तो भाभी जी ने शानदार चोखा खिलाया। बचपन गांव में बीता, भूख लगती तो सबसे आसान था चोखा बनाकर दे देना। हरी धनिया, अचार का मिर्चा, हरे लहसुन की पत्ती, थोड़ा प्याज, सरसों का तेल, नमक, एक दो टमाटर, सिरके का रस, हरा मिर्चा..। बस उबले आलू में मिलाना ही तो है, तैयार हो गया शाही चोखा। बड़ा ही स्वावलंबी है चोखा। किसी का मोहताज नहीं है। रेसिपी में दो चार चीजें ना हों तो भी बुरा नहीं मानता। सिर्फ आलू और नमक से भी तैयार हो जाता है। हां तो गांव में ठंड के सीजन में कौड़ा की आग में भुने हुए आलू का चोखा श्रेष्ठ माना जाता था और हमारे बारी काका (घर के बुजुर्ग नौकर) इसके एक्सपर्ट थे। कौड़ा की आग के उपले सुबह तक राख तले दबे अंगारे हो जाते थे, बारी काका सुबह सुबह उसमें आलू भून लेते थे और हमारे स्कूल जाने से पहले क्या शानदार चोखा पेश करते थे। मेरी दिद्दा चाहे जितना भी व्यंजन बना लें, दाल में चार आलू डाल देती थीं, खास मेरे लिए, खास चोखा। दिद्दा नहीं रहीं, बारी काका नहीं रहे, गांव में चोखे का स्वाद चला गया।
बचपन में चोखे को लेकर कई बार युद्ध भी होता था। घर में एक चोखा सामूहिक बनता था, जिसमें प्याज लहसुन नहीं पड़ता था। फिर मेरे जैसे शौकीन बच्चे और बड़े अलग कटोरे में बनाते थे। मेरे चोखे का स्वाद हमेशा बढ़िया होता था, क्योंकि सारे मसालों के साथ तबीयत से बनाता था। चोखा तैयार होते ही हमारी तीन भाभियां, उनके साथ मणिमाला भाभी (हमारे यहां एएनएम थीं), दो बहनें हमारे चोखे के पीछे पड़ जाती थीं, कटोरा लेकर मैं आगे-आगे, चोखा लुटेरी फौज पीछे पीछे..। हंसी-ठहाकों के साथ इस सीन का आनंद लेते, अम्मा-बाबूजी, दिद्दा..। कई बार तो मैं चोखा बनाकर उसमें थूक देता था, और ऐलान करता था कि अब कौन खाएगा। लेकिन क्या कहूं इस प्यार को, मणिमाला भाभी और सरिता दीदी फिर भी कटोरे में बकोट्टा मार देती थीं।
इंटर में पढ़ने बनारस गया तो ग्रेजुएशन में इलाहाबाद। चोखा अब सिर्फ स्वाद ही नहीं मजबूरी भी बन गया। सुबह कुकर में डब्बों में चावल, दाल और आलू डाल देते थे। एक साथ पक जाता था, चावल, दाल, चोखा तैयार। दोस्तों और घर में अक्सर कहता था कि नौकरी करूंगा तो बारी काका को अपने साथ रखूंगा, दोनों वक्त चोखा बनेगा।
नौकरी की मार पड़ी, जिंदगी की तबीयत बदल गई। मेरा चोखा मेरे नए शहरों में जाकर बेचारा-भर्ता बन गया। कहीं कहीं तो भुर्ता..। आलू वाले चोखे से परिचय था, बैंगन वाला फाइव स्टार तक में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता मिला।
बनाने में भी फर्क देखा। आलू वाले चोखे को प्यार से हाथों से सानकर बनाते थे, तो बैंगन को कड़ाही में पीट-पीटकर भुर्ता बनते देखा। कई बार ऐसा भी लगा जैसे हम वक्त की कड़ाही में पड़े हैं और हालात की कलछी से पीट-पीटकर जिंदगी हमारा ही भुर्ता बना रही है।
खैर चोखे का साथ नहीं छूटा है, उसे आदत नहीं, ख्वाब बनाकर रखे हुए हूं। मजबूरी में कभी नहीं खाता। जब भी बनाता हूं, सारे साजोसामान के साथ। और हां, त्रिपाठी जी से मैंने सच कहा था- मैं खुद को हर्ट कर सकता हूं, लेकिन चोखे का इगो कभी हर्ट नहीं कर सकता। क्योंकि चोखे में स्वाद है, प्यार है, आनंद है तो जिंदगी चोखी है। वरना मुंह चोखा।
आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.





