Shambhu Dayal Vajpayee : बरेली के अखबार देख कर मुझे कल से वंदना देवेन्द्र की ''समय का हिसाब'' की 'अखबार ज्यादा' कविता रह रह कर याद आ रही है। वंदना प्लास्टिक सर्जन डा. डीके अग्रवाल की पत्नी हैं। 11-12 साल पहले मैं जब मैं दैनिक जागरण, बरेली में सिटी चीफ था तो यह पुस्तक मुझे किसी ने दी थी। चंद्र कांत त्रिपाठी तब अखबार के महाप्रबंधक और स्थानीय संपादक थे। अभी डेढ साल पहले ही चंद्र कांत त्रिपाठी ने बड़े पदों पर रहने की करीब 35 साल की अपनी अखबारी यात्रा दैनिक जागरण, गोरखपुर से समाप्त की है।
अधिक समय नहीं हुआ दो साल पहले तक वह दैनिक जागरण के तीन तीन संस्करणों- बरेली, मुरादाबाद और हल्द्वानी के चेहरे थे। निर्बध अधिकारों वाले सीजेएम और स्थानीय संपादक। समाचार संपादक तक की वेतन वृद्धियां तय करने वाले। बरेली में 20 वर्षों के अपने सेवा काल में इस अखबार को फर्श से अर्श पर पहुंचाने और मुरादाबाद व हल्द्वानी संस्करण लांच कराने वाले। उसके पहले मेरठ, बरेली और कानपुर में अमर उजाला में प्रमुख भूमिका निभाने वाले। बनारस में स्वतंत्र भारत और पायनियर अखबारों के अगुवा।
परसों रात जब उनके बड़े बेटे अक्षत त्रिपाठी बुल्लन का असमायिक निधन हुआ तो यह मर्मांतक खबर लोकल अखबारों में ओझल थी। पता नहीं थी किस संपादकीय साथी की सदाशयता से काफी अंदर के किसी पन्ने में संक्षेप में दैनिक जागरण में स्थान पा गयी थी। अंत्येष्टि में उमड़े लोगों की संख्या शहर के शोकाकुल होने का संदेश दे रही थी। लेकिन इसे केवल अमर उजाला में अंदर सिंगल में स्थान मिला। दैनिक जागरण और हिुदुस्तान में इतनी भी जगह नहीं मिली। मैं ही नहीं बहुत लोग इस अखबारी रवैये से हतप्रभ हैं।
कुछ लोगों ने मुझ से कहा और पूछा कि अखबारों ने खबर नहीं छापी। दैनिक जागरण को तो कम से कम इस विपत्ति में साथ होना और अपनी संवेदना जतानी थी। मैं क्या जवाब देता। क्या यह कहूं कि मिशन से प्रोफेशन बनी पत्रकारिता का यही प्रोफेशनलिज्म है?
28-30 साल के अक्षत एक स्मार्ट, मिलनसार और ऊर्जावान युवक थे। दो हफ्ते पहले जिसने उन्हें देखा था उसके लिए उनके न रहने की बात पर विश्वास कर पाना कठिन था। वह भी जागरण में सीनियर एक्जीक्यटिव रह चुके थे। रांची तबादला होने पर उन्होंने पारिवारिक कारणों से अखबार छोड़ा था। उनके दो छोटे छोटे बच्चे हैं। लगता है काल ही निर्मम नहीं होता, अखबार और हम अखबार वाले भी होते हैं। कविता है –
दोस्त तुम मनुष्य कम अखबार ज्यादा लगे
बहुपृष्ठ सर्वथा संशोधित
सत्य का आभास
परिमित परिमार्जित विश्वास
मोहित अपने ही विचारों पर
सम्पादकीय की भांति
लालची विज्ञापन रंगीन
छद्म शिष्टाचार
आत्मीयता दो कौडी की
संबंध ब्यापार …………….;
वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल बाजपेयी के फेसबुक वॉल से.





