यशवंत जी आपने अपने भड़ास फॉर मीडिया पोर्टल पर ‘मैगजीन वी द पावर के नाम पर हो रहा प्लाट बिकवाने और ठगी का धंधा’ शीर्षक से एक खबर प्रकाशित की है। आपने खबर के अंत में लिखा है कि यह खबर एक पत्रकार के पत्र पर आधारित है। जिस पत्रकार ने आपको पत्र लिखकर यह जानकारी दी, क्या आपने एक बार भी यह जानने की कोशिश की वह कितना सच और कितना झूठ लिख रहा है। कुछ बातें मैं बताना-कहना चाह रहा हूं…
१- खबर के जरिए मुझ पर आरोप लगाया है कि मैं नेताओं को मैनेज करने का काम करता हूं। क्या आपको लगता है कि एक पत्रिका का संपादक नेताओं को मैनेज कर सकता है।
२- खबर में लिखा है कि मेरे गुरु प्रभात रंजनदीन हैं और मैंने उनके खिलाफ साजिश की। तो मैं आपको बता दूं वह आज भी मेरे गुरु हैं। इसकी पुष्टि आप स्वयं उनसे कर सकते हैं, और किस ने उनको निकलवाने की साजिश रची, इसका सही जवाब भी प्रभात जी आपको दे देंगे क्योंकि वे आपके भी मित्र हैं।
३- खबर के अनुसार मैंने श्री टाइम्स में भी संपादक अशोक सिंह जी के खिलाफ साजिश की। फिर वही बात कहूंगा, इसका सही जवाब संपादक जी ही दे सकते हैं। यह भी लिखा है कि वहां पर मैंने होमगार्ड्स विभाग के विज्ञापन के पैसे में हेराफेरी की तो इसका यही जवाब है कि यदि विभाग का एक भी अधिकारी यह कह दे कि विज्ञापन का एक रुपया भी मैंने लिया है तो मैं अपनी मूंछ मुंडवा दूंगा। यशवंत जी मैं भी बागी बलिया का शेर हूं। यहां की माटी में कितनी आग है आप इससे भलीभांति वाकिफ होंगे।
४- खबर में यह भी कहा गया है कि मैं अपने यहां रिपोर्टरों से प्लॅाट बिकवाने की बात करता हूं। भईया पत्रिका देखेंगे तो इस बात का अहसास हो जायेगा कि सड़क छाप खबर लिख रहे हैं या फिर संभ्रांत वरिष्ठ संवाददाता।
आपने भले ही अपने पोर्टल में उस पत्रकार का नाम न दिया हो जिसने आपको यह चिट्ठी लिखी है। लेकिन मैं आपको उसके बारे में बता दूं। मान्यवर का नाम कुमार सुशांत है। अब जरा इनकी काबिलियत के बारे में भी बता दूं। साहब दिल्ली से लखनऊ आये, और इसे लाने वाला कोई और नहीं आदरणीय प्रभात रंजन दीन जी हैं। प्रभात जी हों या फिर अशोक सिंह, दोनों को हटाने के लिये इसने एक ही गेम खेला। सभी से मोबाइल पर बात करता और बातों को टेप कर लेता था। उसने इस खेल को लखनऊ के दर्जनों पत्रकारों के साथ खेला। टेप करने के बाद सुशांत सभी को ब्लैकमेल करता था। पहले वो सभी की हमदर्दी जीतता था उसके लिये वो अपने आपको अनाथ (नाजायज) बताकर संवाददाताओं के करीब आता था।
संवाददाताओं का भरोसा जितने के बाद वो संपादक के खिलाफ बातें करता था। आप तो जानते ही हैं कि आज के दौर के संपादकों की कार्यशैली से संवाददाता कितने खुश रहते हैं। जैसे ही संवाददाता संपादक के खिलाफ बोलता उसे टेप को वो ले जाकर सुना देता था इससे वो कुछ दिनों के लिये संपादक का करीबी बनकर आराम से अपनी नौकरी बचाता था। यह बात दिल्ली से लेकर लखनऊ के सभी पत्रकारों को मालूम चल गयी। इसी ब्लैकमेल का शिकार मैं भी बना। मैंने इसे श्री टाइम्स में नौकरी दिलाने में सहयोग किया।
'वी द पावर' जब लांच हो रहा था तो इसे वहां अपने साथ ले गया लेकिन यहां भी वो अपनी आदत से बाज नहीं आया और टेप का गेम करने लगा। यशवंत जी आप ही बताये, आप जिसे अपना छोटा भाई मान रहे हों और वही आपको कुर्सी से हटाने की व्यूह रचे तो आप क्या करेंगे? शुक्र है 'वी द पावर' के चेयरमैन राशिद नसीम का जिन्होंने उससे बातचीत का पूरा टेप सुना। फिलहाल सुशांत को तीन माह पहले ही पत्रिका से बाहर निकाल दिया गया है। वैसे भी उसे लखनऊ के कई पत्रकार ढूंढ रहे हैं क्योंकि उसने सभी की बातों को टेप कर लोगों में गलतफहमी पैदा करने का काम किया है। अति महत्वाकांक्षी बनने का खामियाजा तो आदमी को भुगतना ही पड़ता है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यहां काम करने वाले साथियों ने मेरी भावनाओं को समझा देखा है। यही मेरी जीत है।
प्रणाम
संजय श्रीवास्तव
लखनऊ
मूल खबर…
मैगजीन 'वी द पावर' के नाम पर हो रहा प्लाट बिकवाने और ठगी का धंधा





