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हिंदी कहानी को लेकर नभाटा में संजय कुंदन का एक पठनीय विश्लेषण

: हिंदी कथा साहित्य का चेहरा बदलेंगी युवा लेखिकाएं : हिंदी में एक साथ कई महिला रचनाकारों की सक्रिय उपस्थिति को अलग से नोटिस लिए जाने की जरूरत है। यह एक ऐसा ट्रेंड है जो अगले वर्षों में हिंदी लेखन संसार पर गहरा असर डालेगा। एक साथ ढेरों युवा लेखिकाओं का सामने आना कहीं न कहीं हिंदी साहित्य जगत के बढ़ते जनतांत्रिकीकरण का सबूत है। ये लेखिकाएं हिंदी साहित्य के दायरे को थोड़ा और बढ़ा रही हैं, उसका चेहरा बदल रही हैं।

: हिंदी कथा साहित्य का चेहरा बदलेंगी युवा लेखिकाएं : हिंदी में एक साथ कई महिला रचनाकारों की सक्रिय उपस्थिति को अलग से नोटिस लिए जाने की जरूरत है। यह एक ऐसा ट्रेंड है जो अगले वर्षों में हिंदी लेखन संसार पर गहरा असर डालेगा। एक साथ ढेरों युवा लेखिकाओं का सामने आना कहीं न कहीं हिंदी साहित्य जगत के बढ़ते जनतांत्रिकीकरण का सबूत है। ये लेखिकाएं हिंदी साहित्य के दायरे को थोड़ा और बढ़ा रही हैं, उसका चेहरा बदल रही हैं।

ऐसा नहीं है कि हिंदी में लेखिकाएं पहले से सक्रिय नहीं रही हैं। बल्कि कथा साहित्य में तो उनकी खास जगह रही है। लेकिन अब एक साथ ढेरों महिला रचनाकार दिख रही हैं और उनके आने से अचानक विषयवस्तु और भाषा का तेवर बदल गया है। ये नई लेखिकाएं वरिष्ठ पीढ़ी की उन लेखिकाओं से अलग हैं जो प्राय: चहारदीवारी के भीतर के सुख-दुख, संघर्ष, घर-परिवार और दबे-छुपे प्रेम की दास्तान कहती रही हैं। ये आत्मनिर्भर महिलाएं हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की है, अच्छी नौकरियां प्राप्त की हैं।

नहीं चलेंगे दोहरे मानदंड

इसमें कोई दो मत नहीं कि मध्यवर्ग ने पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों को थोड़ा स्पेस दिया है। इस वर्ग के भीतर कई रूढ़ियां कम हुई हैं इसलिए लड़कियों के पढ़ने-लिखने और नौकरी करने को लेकर इसके आग्रह बदले हैं। शायद इसीलिए लड़कियां अब उन क्षेत्रों में भी कदम रखती हुई दिख रही हैं, जो अब तक उनके लिए वजिर्त माने जाते थे। आज की युवा महिला रचनाकार इसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। पर ये हाल में मिली स्वतंत्रता को पुरुष की कृपा मानकर स्वीकार नहीं करना चाहतीं। वे इसे अपना हक मानती हैं। उन्हें यह मंजूर नहीं कि उन्हें आधी-अधूरी आजादी मिले। वे हर लेवल पर पुरुषों की बराबरी चाहती हैं। वे सामाजिक व्यवहार और नैतिकता तथा शुचिता के दोहरे मानदंडों का विरोध करती हैं।

इंद्रधनुष के पार

आज के कथा लेखन में एक ऐसी स्त्री का चेहरा सामने आया है जो तमाम वर्जनाओं को नकारती है। पहले की तरह वह प्रेम और सेक्स को लेकर गिल्ट की शिकार नहीं है। अगर पुरुष के लिए यह सब एक शगल है तो उसके लिए भी क्यों नहीं? उसका सीधा सवाल है कि जब पुरुष ऐसे संबंधों को बोझ की तरह ढोता नहीं चलता तो वह क्यों ढोए? इस संदर्भ में गीताश्री की कहानियां उल्लखेनीय हैं।

वह एकदम हाल में उभरी नई पीढ़ी की तो नहीं हैं, थोड़ा पहले से लिखती रही हैं लेकिन पिछले एक-दो वर्षों के भीतर उनकी कुछ ऐसी कहानियां आई हैं, जो आज की स्त्री के बदलते जीवन और द्वंद्व को काफी प्रभावी ढंग से व्यक्त करती हैं। उनकी नायिकाएं सिगरेट-शराब पीती हैं, क्लबों में जाती है। उनके भीतर यौन संबंधों को लेकर भी झिझक नहीं है।

उनकी एक कहानी है- 'प्रार्थना के बाहर'। इसमें एक ऐसी लड़की है जो आईएएस परीक्षा की तैयारी कर रही है। वह रिलैक्स होने के लिए अनेक लड़कों के साथ यौन संबंध बनाती है। उसकी सहेली उसे रोकती है, उसकी इस आदत के लिए उसे भला-बुरा कहती है पर वह इसे गलत नहीं मानती। आखिरकार वह सिविल सेवा परीक्षा में टॉप पोजीशन हासिल करती है। लेखिका का आशय स्पष्ट है। जब एक पुरुष यही सब करके सच्चरित्र और नैतिकतावादी बने रह सकता है तो एक स्त्री को यह सब करने के लिए गलत क्यों ठहराया जाता है। यह दोहरापन क्यों? सारी नैतिकता का बोझ महिला ही क्यों ढोए?

गीताश्री की कहानी 'इंद्रधनुष के पार' में एक न्यूड पार्टी का वर्णन है जिसमें कपड़े पहनकर जाना मना है। इस विषय पर हिंदी में यह संभवत: पहली कहानी है। इसमें नायिका न चाहते हुए भी किसी तरह पहुंच जाती है। वहां उसे अपना बॉस दिख जाता है जो हर समय उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाता रहता है और 'शालीन' कपड़े पहनने की हिदायत देता है। यह कहानी पुरुषवादी पाखंड को बेनकाब करती है। पुरुष अपनी मनमर्जी के हिसाब से कभी स्त्री को कपड़ों में ढंके रखना चाहता है तो कभी नग्न करना चहता है।

न्यूड पार्टी आधुनिक सभ्यता का एक रूपक बन गई है जिसमें उसका विद्रूप पूरी तरह झलकता है। हाल में रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार से सम्मानित आकांक्षा पारे की कहानी 'तीन सहेलियां, तीन प्रेमी' एक नए नजरिए से प्रेम, विवाह और स्त्री-पुरुष संबंध को देखती है। इन मुद्दों पर तीन सहेलियां पारंपरिक धारणाओं को परे धकेलकर अपने तरीके से स्टैंड लेना चाहती हैं। एक सहेली कहती है, 'अपनी शर्तों पर जिओ, अपनी शर्तों पर प्रेम करो। जो करने का मन नहीं उसके लिए इनकार करना सीखो, जो पाना चाहती हो, उसके लिए अधिकार से लड़ो।'

ओनली टू पर्सेंट, चलेगा?

ऐसा नहीं है कि महिला रचनाकार केवल इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था धर्म और संस्कृति पर भी बारीक नजर रखती हैं। वंदना राग की कहानी 'यूटोपिया' हिंदूवादी राजनीति की खबर लेती है और बताती है कि धर्म की रक्षा के नाम पर अपराधी ही समाज के नियंता बनते जा रहे हैं। रीता सिन्हा की कई कहानियां आज के युवाओं के संघर्ष का कोलाज प्रस्तुत करती हैं। उनकी कहानी 'ओनली टू पर्सेंट, चलेगा?' कॉर्पोरेट कल्चर के भीतर के अंधेरे की पड़ताल करती है।

लेखिका आगाह करना चाहती हैं कि आज धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था जड़ जमा रही है जिसमें सच्चे और ईमानदार लोगों को धकियाकर तिकड़मी और चालाक लोग आगे बढ़ रहे हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ अपनी कहानियों के जरिए उत्तर आधुनिक समाज की पड़ताल करती हैं। लोकजीवन और समाज के हाशिए पर रहे वर्गों के जीवन को भी वह जानती-समझती हैं। इस संदर्भ में उनकी कहानी 'कठपुतलियां' की चर्चा की जा सकती है। ये तो कुछ उदाहरण हैं। इनके अलावा और भी कई समर्थ लेखिकाएं काफी गंभीरता के साथ लेखन में जुटी हुई हैं। वे आश्वस्त करती हैं कि हिंदी कथा साहित्य आने वाले वर्षों में और भी समृद्ध होगा।

संजय कुंदन के इस विश्लेषण को नवभारत टाइम्स से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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