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बाजार ने सिर्फ अखबार के पेज और डिजाइन ही बल्कि खबरों का समाजशास्त्र भी बदला है

अखबारों के अर्थशास्त्र के साथ खबरों का समाजशास्त्र भी बदलने लगा है। अब पाठक यह भी पूछने लगा है कि हमारी खबरें छपती हैं कि नहीं? डॉ अंबेडकर के निर्वाण दिवस पर पटना के दारोगाराय पथ में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। वहां भास्कर की बुकिंग के लिए कुछ मार्केटिंग वाले भी मौजूद थे। भास्कर के एक सदस्य ने एक व्यक्ति के सामने बुकिंग के आग्रह के साथ बुकिंग रसीद भी बढ़ा दी। उस व्यक्ति ने तुरंत पूछ लिया कि इसमें दलितों की खबर छपती है या नहीं? ऐेसे किसी प्रश्न की अपेक्षा उस व्यक्ति को नहीं थी। वह इतना ही कह पाया कि अखबार में दलितों की खबर भी छपेगी। 
अखबारों के अर्थशास्त्र के साथ खबरों का समाजशास्त्र भी बदलने लगा है। अब पाठक यह भी पूछने लगा है कि हमारी खबरें छपती हैं कि नहीं? डॉ अंबेडकर के निर्वाण दिवस पर पटना के दारोगाराय पथ में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। वहां भास्कर की बुकिंग के लिए कुछ मार्केटिंग वाले भी मौजूद थे। भास्कर के एक सदस्य ने एक व्यक्ति के सामने बुकिंग के आग्रह के साथ बुकिंग रसीद भी बढ़ा दी। उस व्यक्ति ने तुरंत पूछ लिया कि इसमें दलितों की खबर छपती है या नहीं? ऐेसे किसी प्रश्न की अपेक्षा उस व्यक्ति को नहीं थी। वह इतना ही कह पाया कि अखबार में दलितों की खबर भी छपेगी। 
 
अखबार के आकर्षक गिफ्ट प्लान के साथ बाजार की स्पर्धा में उतरे अखबारी बनियों को अब सामाजिक सरोकारों का भी सामना करना पड़ रहा है। अपनी खबरों और सरोकारों को लेकर पाठक या ग्राहकों की यह चेतना निश्चित रूप से मीडिया जगत के लिए शुभ संकेत है। लेकिन यह बदलाव भी इतना आसान नहीं है। 
 
करीब दस वर्ष पहले की घटना होगी। कंकड़बाग की एक झुग्गी मुहल्ले में भीषण आग लगी थी। अगले दिन सभी हिन्दी अखबारों के पहले पेज की वह लीड या बैनर खबर थी। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीसरे पन्ने पर छोटी सी खबर लगाई थी। उस दिन मैं टाइम्स ऑफ इंडिया के तत्कालीन संपादक (संभवत: उनका नाम विनय तिवारी था) से मिलने गया था। बातचीत की शुरुआत में ही मैंने यह सवाल पूछ दिया कि आपके यहां आगजनी की घटना को उचित जगह नहीं मिली है। उन्होंने इस संबंध में अपनी बात कही और अंतत: कहा कि हमारा पाठक उन झुग्गियों ने नहीं रहता है। इसलिए यह खबर हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं थी।
 
एक बड़े हिन्दी अखबार के एक संपादक ने रिपोर्टर मीटिंग में घोषणा की थी कि गरीबों की खबर हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि गरीब हमारा अखबार नहीं खरीदता है। उसी अखबार के एक संपादक ने श्याम रजक (उस समय श्याम रजक राजद के विधायक व राष्ट्रीय प्रवक्ता हुआ करते थे) की खबर को लेकर कहा था नउवा-धोबी की खबर पेज दो पर नहीं छपेगी। 
 
लेकिन यह सुखद संयोग है कि अब पाठक पूछ रहा है कि अखबार में दलितों की खबर छपती है या नहीं? बाजार ने सिर्फ अखबार के पेज और डिजाइन को नहीं बदला है, बल्कि उसने खबरों का समाजशास्त्र भी बदल दिया है। इसका असर भी अब दिखने लगा है। दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी-अंग्रेजी की मासिक पत्रिका फॉरवर्ड प्रेस घोषित रूप से कहती है कि दलित-पिछड़ों का पक्ष और उनका सरोकार ही हमारा विषय है। उसके आलेखों में दलित-पिछड़ों का पक्ष और उनका दृष्टिकोण भी झलकता है। यहां तक कि संवाददाताओं के चयन में भी सामाजिक सरोकारों पर जोर दिया जाता है। हमने अपनी पत्रिका आह्वान के लिए एक विज्ञापन अखबार में दिया था, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा हुआ था कि बायोडाटा में जाति का भी उल्लेख करें और जितने भी बायोडाटा आए, सबमें जाति का उल्लेख था।
 
बदलते समाज का प्रतिबिंब अब खबरों में भी दिखने लगा है और यही कारण है कि भूमिहार महासभा से लेकर कहार व दुसाध महासभा तक की खबरें जगह पा रही हैं और जगह की गुहार भी लगा रही हैं। यह मीडिया की व्यापकता और उसकी अपरिहार्यता का संकेत भी है।
 
पटना से वरिष्ठ पत्रकार बीरेन्द्र कुमार यादव का विश्लेषण
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