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तेजपाल और जस्टिस गांगुली पर एक ही तरह के आरोप के बावजूद कार्रवाई अलग-अलग क्यों

तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एके गांगुली पर एक ही तरह के आरोप हैं। भारतीय दंड संहिता में भी देश के सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून है, तो फिर क्यों दोनों ही मामलों में अलग-अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। एक तरफ जहां तेजपाल मामले में सरकार से लेकर मीडिया तक मुखर है, तो एके गांगुली के खिलाफ बोलने की हिम्मत कोई भी नहीं कर रहा है। क्या एके गांगुली के कानूनी कद को देखते हुए मीडिया चुप है या फिर तेजपाल मामले में भाजपा की अतिसक्रियता के चलते मीडिया मुखर है। आखिर क्या है पूरा सच?
तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एके गांगुली पर एक ही तरह के आरोप हैं। भारतीय दंड संहिता में भी देश के सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून है, तो फिर क्यों दोनों ही मामलों में अलग-अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। एक तरफ जहां तेजपाल मामले में सरकार से लेकर मीडिया तक मुखर है, तो एके गांगुली के खिलाफ बोलने की हिम्मत कोई भी नहीं कर रहा है। क्या एके गांगुली के कानूनी कद को देखते हुए मीडिया चुप है या फिर तेजपाल मामले में भाजपा की अतिसक्रियता के चलते मीडिया मुखर है। आखिर क्या है पूरा सच?
 
देश में महिलाओं का चीरहरण करने वाले लोगों की कमी नहीं है। महाभारत काल में द्रौपदी का चीरहरण दु:शासन ने किया था, तब द्वापर युग था, लेकिन अब तो कलयुग है। इस कलयुग में कौन किसके साथ क्या कर जाए, कहना मुश्किल है। तमाम सामाजिक वर्जनाएं टूट सी गई हैं। तमाम भाषाई अखबारों और समाचार माध्यमों को खंगालिए, तो देश के कोने-कोने में हर रोज ऐसी घटनाएं देखने सुनने को मिल रही हैं कि शर्म भी लज्जित हो जाए। कहीं बाप बेटी के साथ पकड़ा जा रहा है, तो कहीं भाई और बहन के पवित्र संबंध तार-तार होते दिख रहे हैं। कह सकते हैं कि आधुनिकता ने तमाम सामाजिक, धार्मिक और नैतिक संबंधों का गला घोंट दिया है। जब शिक्षक ही अपनी छात्रा के साथ रास रचाए, जब साधु-संत ही अपने अनुयाइयों के साथ दैहिक संबंध बनाए, तो आप क्या कहेंगे? जब दफ्तर में बॉस ही अपनी महिला कर्मचारियों के साथ अंग से अंग सटाकर समाज की मान्यताओं को बदलने की नापाक कोशिश करे। जब कानून बनाने वाले से लेकर कानून का रखवाला ही अपने पावर के दम पर महिलाओं की इज्जत तार-तार करने की कोशिश करे, तो इसे आप क्या कहेंगे? और इन सब के बीच एक अहम सवाल कि पैसा पावर और दंभ के बल पर समाज में रुतबा कायम करने वाले ऐसे भ्रष्टाचारी और बलात्कारी को दंड देने में हमारा कानून जब अलग अलग रवैया अपनाता है, तो फिर कानून की मर्यादा क्या है? 
 
ये तमाम सवाल इसलिए किए जा रहे हैं कि अभी हाल में यौन शोषण के दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसने देश, समाज और राजनीति को सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। यौनाचार के आरोपी पत्रकार तरुण तेजपाल और जस्टिस एके गांगुली पर लगभग एक ही तरह के आरोप लगने के बावजूद दोनों पर कार्रवाई अलग-अलग तरह से हो रही है। तेजपाल ने अपनी संस्था की महिला पत्रकार के साथ गोवा में छेड़छाड़ की और वह भी लिफ्ट में। लड़की ने शिकायत की और गोवा पुलिस ने इस पर संज्ञान लेते हुए तेजपाल पर कार्रवाई कर दी और अंत में तेजपाल को गोवा में गिरफ्तार कर लिया गया। कानूनी प्रक्रिया के तहत तेजपाल अब भले ही गिरफ्तारी से बाहर निकल जाएं, लेकिन इतना तो साफ हो गया कि महिला उत्पीड़न के आरोप में उन पर मुकदमा चलेगा, लेकिन दूसरी तरफ कानून बनाने वाले जस्टिस एके गांगुली के मामले में अभी तक दिल्ली पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है। गांगुली ने अपनी ट्रेनी महिला के साथ अपने ऑफिस और होटल में छेड़छाड़ करने की कोशिश की थी। वैसे तो महिलाओं के साथ कहीं भी छेड़छाड़ करने वालों के ऊपर एक जैसी कानूनी कार्रवाई ही की जाती है, लेकिन जब कार्यस्थल पर इस तरह की घटना घटी हो, तो घटना को अंजाम देने वाले ज्यादा कसूरवार हो जाते हैं। मामला इतना भर ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की हिफाजत करने और महिलाओं के साथ छोड़छाड़ करने वालों को कड़ी सजा देने के लिए सख्त कानून बनाए हैं। ऐसे में गांगुली का कुकर्म कानून की नजर में ज्यादा अहम हो जाता है। न्याय करने वाले और कानून बनाने वाले जब समाज विरोधी कर्मों में शामिल हो जाएं, तो भला समाज को कौन बचा सकता है? तेजपाल और गांगुली के केस में दिल्ली पुलिस की कमजोरी साफ झलक रही है और ऐसे में जांच की एक सुई दिल्ली पुलिस की ओर भी घूम सकती है।
 
सुप्रीम कोर्ट के जज रहे एके गांगुली की पूरी कहानी से हम आपको परिचय कराएंगे, लेकिन इससे पहले देश में जो हाल में ही एंटी रेप कानून बने हैं, उसके कुछ बिंदुओं पर एक नजर डालें। नया कानून कहता है कि 18 साल की कम उम्र की लड़की के साथ उसकी मर्जी या मर्जी के खिलाफ संबंध दुष्कर्म माना जाएगा। पहले छेड़छाड़ के लिए आईपीसी की धारा 354 के तहत केस दर्ज होता था और यह जमानती अपराध था। अब आईपीसी में छेड़छाड़ के अपराध में सजा के दायरे को बढ़ा दिया गया है और आईपीसी की धारा 354 में कई सब सेक्शन बनाए गए हैं। इनमें कई प्रावधान गैरजमानती कर दिए गए हैं। गलत तरीके से महिला को छूने के मामले में आइपीसी की धारा 354 का प्रावधान है। इनमें तीन साल तक कैद की सजा हो सकती है। अगर किसी महिला के खिलाफ बल प्रयोग करके उसे निर्वस्त्र किया जाता है, तो आईपीसी की धारा 354बी के तहत तीन साल से सात साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत पीछा करने और घूरने को भी गैरजमानती अपराध घोषित किया गया है। बशर्ते अपराधी दूसरी बार यह अपराध करते हुए पकड़ा गया हो। इसके अलावा कई तरह के और सख्त कानून हैं, लेकिन जस्टिस एके गांगुली के ऊपर इन कानूनों का अभी तक कोई असर नहीं है। जब गांगुली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की जांच के लिए कमेटी गठित की, तो फिर दिल्ली पुलिस ने इस पर एक्शन क्यों नहीं लिया? यह सवाल इसलिए किया जा रहा है कि जब लोगों का शिकायतों के आधार पर ही पुलिस काम करने लगती है, तो गांगुली ने जिस ट्रेनी महिला के साथ छेड़छाड़ की और इसकी जानकारी एक वकील ने ही मीडिया के सामने पहुंचाई, तब भी इस पर दिल्ली पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया। लगता है कि आज भी देश के लोग कानूनी लोगों से ज्यादा डरते हैं। मीडिया में भी एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि ज्यूडिसियरी के बारे में ज्यादा कुछ लिखना, बोलना आफत को न्यौता देना है। एक सवाल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य जस्टिस अल्तमस कबीर से भी पूछा जा सकता है, जो गांगुली को बचाने के लिए आगे आए हैं। जस्टिस कबीर ने कहा है कि कोई भी आदमी आरोप लगने से गुनहगार नहीं हो जाता। फिर गांगुली को अपने बंगाल मानवाधिकार आयोग के प्रमुख पद से भी हटने की कोई जरूरत नहीं है। कबीर साहब यह बात तो सही कह रहे हैं कि केवल आरोप के दम पर कोई अपराधी नहीं हो जाता, लेकिन नैतिकता भी तो कोई चीज होती है। इसी नैतिकता के दम पर राजनेताओं से कई तरह के सवाल किए जाते हैं और उन्हें पद से हटने के लिए मजबूर भी किया जाता है।
 
गौरतलब है कि एक महिला प्रशिक्षु वकील ने ब्लॉग में सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। बाद में एक वेबसाइट पर और वेबसाइट के हवाले से ही एक अखबार में खबर छपी, जिसमें प्रशिक्षु ने आरोप लगाया कि दिसंबर, 2012 में दिल्ली में जब सामूहिक दुष्कर्म के विरोध में प्रदर्शन चल रहा था, उस समय हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने होटल के कमरे में उसका यौन उत्पीड़न किया था। प्रशिक्षु ने जज के नाम का खुलासा नहीं किया था। मुख्य न्यायाधीश ने खबरों में आए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए 12 नवंबर, 2013 को आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की एक जांच समिति गठित कर दी। न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा, एचएल दत्तू और रंजना प्रकाश देसाई की तीन सदस्यीय समिति ने गठन के दूसरे ही दिन काम शुरू कर दिया था। अब प्रशिक्षु महिला वकील के यौन उत्पीड़न मामले में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली का नाम सामने आया है। मामले की जांच कर रही सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की समिति ने जस्टिस गांगुली के भी बयान दर्ज किए हैं।
 
समिति ने आरोपों की जांच रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम को सौंप दी। हालांकि, जस्टिस गांगुली ने आरोपों को नकार दिया है, लेकिन अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह और सुप्रीम कोर्ट की वकील कामिनी जायसवाल ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है। इस समय जस्टिस गांगुली पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं। वह फरवरी, 2012 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए थे।
 
गांगुली पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली प्रशिक्षु महिला वकील का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति उसे शक की निगाह से देख रही है और वह अपमानित महसूस करती है। उसे लगातार यह सही साबित करना होगा कि वह झूठ नहीं बोल रही है। इसका कारण है कि कानूनी तंत्र महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संवेदनशीलता के साथ निपटने में उतना सक्षम नहीं है।
 
महिला ने इतनी देर से आरोप लगाने का कारण बताते हुए कहा, मुझे इतना समय इस तथ्य को स्वीकार करने में लगा कि मेरे साथ यौन दुर्व्यवहार हुआ है। इस मामले को उजागर करने वाली वेबसाइट लीगली इंडिया ने को वॉल स्ट्रीट जनरल में प्रकाशित साक्षात्कार के हवाले से यह बात कही थी। साक्षात्कार में महिला ने कहा है कि वह (आरोपी जज) एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी वह प्रशंसक थी और आदर से देखती थी। इस मामले में वह कानून का सहारा लेने की सोच रही थी, लेकिन उसे डर लगा कि इससे अच्छा के बजाय और बुरा होगा। सबसे पहले तो उसका मामला वर्षों तक खींचा जाएगा। उसके बाद बचाव पक्ष का वकील उसे अदालत में उस उत्पीड़न के हर क्षण का फिर से अनुभव कराएगा। तीसरी बात कि यौन उत्पीड़न के मामले में जिसमें कोई ठोस सुबूत नहीं है। ऐसी कोई वजह नहीं है कि एक कानून की स्नातक एक ऐसे न्यायाधीश के खिलाफ जीत जाए, जिसका रिकॉर्ड बेदाग हो। उदाहरण के तौर पर अब भी जब वह समिति के समक्ष पेश हुर्इं, तो उसने महसूस किया कि उसे संदेह की नजर से देखा जा रहा था। उसने पांच माह पहले इस साल मई 2013 में जब अपने परिजनों से कहा, तो वे भी औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कराने को इच्छुक नहीं थे।
 
उसने जब इस बारे में अपनी दादी से कहा, तो उसे यह समझ में नहीं आया कि वह इसे इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रही है? वे इसे गलत मानने को भी तैयार नहीं थीं। उनका कहना था कि वे सभी कभी न कभी उत्पीड़न की शिकार हुई हैं। उसकी मां का कहना था कि जो कुछ हुआ, वह गलत हुआ, लेकिन उसे उस सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं है।
 
अब सवाल है कि जब इतना सब हो गया, तो गांगुली पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? ऐसा नहीं है कि देश में पहली बार किसी जस्टिस पर अनैतिक होने के आरोप लगे हैं। देश के कई जस्टिस पर घूसखोरी से लेकर भ्रष्टाचार करने के आरोप लग चुके हैं और उन्हें सजा भी मिली है, लेकिन क्या गांगुली को केवल इसलिए छोड़ दिया जाए कि वे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस थे। और क्या मान लिया जाए कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस समाज विरोधी कोई काम नहीं करते? फिर नैतिकता की बात करने वाले तेजपाल पर यह कार्रवाई क्यों की गई? फिर आसाराम बापू सलाखों में क्यों बंद हैं? फिर तमाम तरह के राजनीतिक लोग क्यों जेल में बंद हैं? फिर दर्जनों नौकरशाह क्यों अपमानित होकर पद से हटाए गए हैं? इससे जुड़े कई सवाल और उठ सकते हैं। एक बेहतर समाज की रचना और समाज का संचालन तभी संभव हो सकता है, जब एक ही नजर से हर किसी को देखा जाए। तभी समाज और और कानून की गरिमा बचेगी और तभी लोकतंत्र में लोगों का विश्वास बढ़ेगा। 
 
लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'हम वतन' अखबार से जुड़े हुए हैं. इनसे[email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.
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