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नेताजी ने करवटें बदलते गुजारी कत्ल की रात

राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए शनिवार की रात कत्ल की रात रही। चुनाव नतीजों के एक दिन पहले की रात को कत्ल की रात क्यों कहते हैं, यह तो पता नहीं परंतु इतना पता जरूर है कि राजस्थान विधानसभा के फिलहाल 199 विधानसभा क्षेत्रों से विधायक बनने का सपना देख रहे 2087 उम्मीदवारों को शनिवार की रात शायद ही नींद आई हो। करवटें बदलते पूरी रात उन्होंने अपने को फूल मालाओं से लदा, भीड़ से घिरा और मुंह लड्डुओं भरा देखते गुजार दी। 2087 में तो जीतना सिर्फ 199 को ही है परंतु सपने देखने में क्या है, उसके पैसे थोड़े ही लगते हैं। पैसे तो जहां लगने थे 1 दिसंबर तक लग चुके। और बहुत अच्छे से लगे।
राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए शनिवार की रात कत्ल की रात रही। चुनाव नतीजों के एक दिन पहले की रात को कत्ल की रात क्यों कहते हैं, यह तो पता नहीं परंतु इतना पता जरूर है कि राजस्थान विधानसभा के फिलहाल 199 विधानसभा क्षेत्रों से विधायक बनने का सपना देख रहे 2087 उम्मीदवारों को शनिवार की रात शायद ही नींद आई हो। करवटें बदलते पूरी रात उन्होंने अपने को फूल मालाओं से लदा, भीड़ से घिरा और मुंह लड्डुओं भरा देखते गुजार दी। 2087 में तो जीतना सिर्फ 199 को ही है परंतु सपने देखने में क्या है, उसके पैसे थोड़े ही लगते हैं। पैसे तो जहां लगने थे 1 दिसंबर तक लग चुके। और बहुत अच्छे से लगे।
 
एक दिसंबर के बाद का पूरा सप्ताह सभी प्रत्याशियों के लिए बड़ा भारी रहा। टीवी और अखबारों में आ रहे सर्वे, ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल दिल की धड़कनों को घटाते बढ़ाते रहे। शुभचिंतकों, समर्थकों और मित्रों के सर्वे और पोल सब पर भारी रहे। मतदान के दिन के निजी अनुभव, मतदान के बाद जगह-जगह से आ रही पक्ष में मत पड़ने की खबरें, किस बूथ पर एकमुश्त मत पक्ष में गिरे, कहां सिक्सटी फोर्टी का रेशियो रहा और कहां बात फिफटी-फिफटी पर आकर थम गई। विस्तार से सारी आंकड़ेबाजी अपने निजी सर्वे के समर्थन में बताई जा चुकी है। इन निजी ओपिनयन पोल में हार किसी बूथ से नहीं, अगर किसी जले-भुने ने किसी बूथ से हार की आशंका जताई भी तो पलटवार में दो बूथ गिना दिए गए जहां से भरपाई होकर आगे निकल गए।   
 
परिवार के सदस्य और नाते रिश्तेदार जहां अपनी तरक्की की उम्मीदें लगाए रहे वहीं समर्थकों ने अपने ‘प्रिय नेताजी’ के भावी ‘मंत्रिमंडल’ में अपने लिए पद तय कर लिए। पार्षद का चुनाव जीतते ही समर्थक जैसे उसे अगला विधायक घोशित कर देते हैं उसी तरह समर्थकों ने विधायक चुनाव जीतने की उम्मीद के साथ ही उन्हें भावी मुख्यमंत्री का खास बताते हुए मंत्री बनना तय कर दिया है। मंत्री बनने के तर्क भी जता दिए गए। पहली बार जीतेंगे इसलिए नयों के कोटे में मंत्री बनना तय है। महिला है इसलिए महिला कोटे में मंत्री बनना तय है। दो या तीन बार जीतेंगे इसलिए सीनियर कोटे में मंत्री बनना तय है। पहले भी मंत्री रह चुके हैं इसलिए मंत्री तो बनना तय ही है, कोई माई का लाल नहीं रोक सकता। हरेक के अपने तर्क हैं, तर्क भी ऐसे जिनकी कोई काट नहीं। 
 
जितनी मन्नतें और पूजा पाठ टिकट पाने के लिए कीं गई उससे कई गुना मतदान के बाद विधायक बनने के लिए की जा चुकी हैं। ज्योतिषियों ने भी जमकर चांदी कूटी। ऐसे धंधेबाजों की भी चल निकली जो अपने को भगवान के कुछ ज्यादा ही निकट मानते हैं। कौन सी मन्नत किस धाम, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में शर्तिया पूरी होती है, उसका जीवंत चित्रण कर उन दरबारों में नेताजी का मत्या टिकवाने का अभियान पूरा हो चुका है। मित्र मंडली जीत के बाद के जश्न की पूरी प्लानिंग कर चुकी है। जीत की खुशी को कब, कहां, किसके साथ और कैसे बांटना है, सारा खाका दिमाग में तय हो चुका है। बारात सज चुकी है। बाराती तय हो गए हैं। बैंड-बाजा भी तय हो चुका है। अंतर सिर्फ इतना है कि बारात में सब कुछ तय होने के बाद बता भी दिया जाता है परंतु यहां सब कुछ गोपनीय है। 
 
हनुमानों और विभीषणों की पहचान अच्छे से की जा चुकी है। शनिवार की रात उन सभी सिपहसालारों की हाजिरी लगाई गई जिन्हें मतगणना में रहना है। कौन किस टेबल पर रहेगा यह एक बार फिर पुख्ता किया गया। मतगणना के दौरान क्या ध्यान रखना है। अगर किसी तरह का शक-सुबहा हो तो कैसे एतराज करना है। मौखिक एतराज ना मानें तो लिखित में क्या देना है? ऐसी विपदा में कौन सेनापति मदद के लिए कहां मौजूद रहेगा जिससे तत्काल संपर्क करना है, सब कुछ अच्छे से समझा दिया गया है। सभी को सुबह कितने बजे कहां इकट्ठा होना है। किसे कौन लेकर आएगा। किस गाड़ी में कौन-कौन जाएगा। इसक हिदायतें दी चुकी हैं। सुबह सात बजे तक सभी को मतगणना स्थल पहुंच जाना है इसकी सख्त हिदायतों के बाद ‘रात्रिभोज’ और ‘ऑल द बेस्ट’ के साथ सभी ने रवानगी ली है। खासमखास सिपहसालारों को प्रत्याशियों ने रोक लिया। उनसे देर रात तक एक बार फिर सारी आशंकाएं दूर कर ली गई। ‘आप चिंता ना करें’, ‘मैं हूं ना’ के भरोसे के बाद, ‘ध्यान रखना, कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए’, ‘अब आपकी जिम्मेदारी है’ जैसे डॉयलॉग प्रत्याशी के मुंह से एक बार फिर निकले और सभी ने गुडनाइट के साथ विदा ली। प्रत्याशियों के मन में रह-रहकर आशंकाएं उभरती रही, अगर नहीं जीते तो, अगले ही पल आशंका झटक दी जाती रही। अच्छा-अच्छा बोलो, अच्छा-अच्छा सोचा, उपर वाला सब सही करेगा। 
 
इधर प्रशासन भी देर रात तक इंतजामात को अंजाम तक पहुंचाने में जुटा रहा। जैसे अब तक सब ठीकठाक निबटा, कल का दिन भी निबट जाए। रिजल्ट आ जाए और उसके बाद सब कुछ शान्ति से निबट जाए तो गंगा जी नहाएं। 
 
                       लेखक राजेंद्र हाड़ा वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीति एवं मीडिया विश्लेषक हैं. इनसे सम्पर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.
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