Rana Yashwant : मैं तमाम आपत्तियों के बावजूद दांते और मार्क्स का हमेशा से कायल रहा। दांते में एक अजीब सा दंभ था – तुम अपनी राह चलते चलो, लोग चाहे कुछ भी कहें और मार्क्स को वाहवाही और लफ्फाजी से नफरत थी। दांते और मार्क्स में मौलिकता थी, सोच के पीछे मजबूत तर्क हुआ करता था और दोनों निर्भीक थे। वर्ना पोपशाही के दौर में क्रांतिकारी विचारों का अलख जगाने की हिम्मत वही कर सकता था जो जान पर खेलने का साहस रखता हो।
आम आदमी पार्टी का दिल्ली में प्रदर्शन जान पर खेलने जैसा साहस नहीं लेकिन खेलने के लिये जान देने के जुनून तक पहुंचने का नशा सा दिखा। लोकशाही में जनता के फैसले का सम्मान करना स्वस्थ व्यवस्था का जितना पोषण करता है उससे कहीं ज्यादा आत्मचिंतन और आत्मशुद्दि की संभावना पैदा करता है। बहतु सारी वजहों से मैंने आम आदमी पार्टी को उम्मीदों की पार्टी के रुप में नहीं देखा, लोकशाही के पहरुआ और आम आदमी की लाठी के रुप में नहीं माना । ऐसा मानना भी जल्दबाजी होगी। लेकिन दिल्ली में इस पार्टी ने जैसा प्रदर्शन किया है उसने अपने बारे में एक बार तसल्ली से सोचने की जरुरत जरुर पैदा की है।
जिस जमात और जिस जमीन के लोगों ने इस पार्टी की कमान थामी औऱ जिस तरह से लोगों का भरोसा जीता उससे दो बातें साफ होती हें । एक ये कि लोकशाही में पोपशाही जैसे युग के बने रहने को पत्थर की लकीर मानकर बैठना सही नहीं औऱ दूसरा ये कि हौसला बुलंद हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं। आपके कुछ फैसलों पर लोग सवाल कर सकते हैं करेंगे भी लेकिन वो फैसले आपके तर्क और मौजूदा तथ्यों के आधार पर होते हैं। इसको किसी औऱ रुप में समझना गलत होगा। हां, उन फैसलों से कहीं बड़े फैसले जनमत से पैदा हो रहे हों तो आपका सोचना लाजिमी हो जाता है । लिहाजा मैं खुद भी बहुत सारे मामलात पर सोचने लगा हूं। आम आदमी पार्टी ने लोकशाही के मूल रुप में आम आदमी का भरोसा जरुर पैदा किया है, जो इस देश में अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ ही लगता रहा । आप को मेरी ढेरों शुभकामनाएं।
राणा यशवंत के फेसबुक वॉल से.






