Atul Kanakk : लोगों ने उसकी प्रतिभा से आक्रांत होकर उसके खिलाफ सामूहिक लामबद्व कर ली, लेकिन उसने एक बार कुछ ठान लिया तो फिर अपने पथ पर आगे बढ़ता गया। षड्यंत्रों ने उसे स्नेह सने स्टिंग के व्यूह में फँसाना चाहा तो कुंठाओं ने उसके खिलाफ अनर्गल प्रलाप किये। लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचने की कीमत कुमार विश्वास ने अनेक आत्मीय मित्रों की कुंठाओं को चुपचाप सहकर चुकाई। लोग उसकी विराट उपलब्धियों में क्षुद्रताओं की अनुशंसा तलाशते रहे और प्रेम का यह कवि अपनी निष्ठाओं और अपनी मान्यताओं के प्रति प्रबिद्वताओं का जीवन जीता रहा।
जब चुनाव की सगुबुगाहट प्रारंभ हुई तो कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बड़े बड़े नेताओं ने उससे अपने पक्ष में सभाऐं करने के लिये संपर्क किया। वह चाहता तो अवसर का लाभ लेकर रूपया भी खूब कमा सकता था और अपने लिये किसी शानदार पद का रूतबा भी तय कर सकता था। आखिर पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह उसे भी तो करना है। लेकिन वह मित्रों और समाज के प्रति अपनी निष्ठाओं के साथ खड़ा रहा। …..तब जबकि वह स्वयं कहीं से चुनाव नहीं लड़ रहा था। उसकी लोकप्रियता को देखते हुए चुनाव जीतना उसके लिये कठिन नहीं होता। लेकिन वह व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर विराट का हित देखने की सामथ्र्य रखता है और इसीलिये उसकी प्रेम कविताऐं दिल को छूती हैं। अन्ना के आंदोलन में वह नाम कमाने या पैसा कमाने के लिये शामिल नहीं हुआ था।
आम आदमी के लिये सुख के नये रास्ते कमाने की मंशा से सक्रय हुआ था। दूसरों के सुख के प्रति यह बेचैनी ही उसे प्रेम का सच्चा कवि बनाती हैं। मैनें देखा है कि किस तरह उसके खिलाफ लगातार दुष्प्रचार करने वालों के साथ खड़े लोग जब संकट में पड़े तो वह सूचना मिलते ही उनकी मदद के लिये अगली ही फ्लाइट या रेल से रवाना हो गया। वाग्देवी के वरदान को प्राप्त व्यक्ति की वाणी क्या चमत्कार कर सकती है, यह उसने कवि मंचों पर भी दिखाया और राजनीतिक सभाओं में। उसकी वाणी शब्द के ब्रह्म होने के प्रति हमारी आस्था को और मज़बूत करती है।
तुम्हारा प्रेम हम सबको गौरवान्वित करता है………. जियो कुमार।
अतुल कनक के फेसबुक वॉल से.





