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अपने समलैंगिक बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले इन पैरेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि….

Manisha Pandey : फरवरी, 2011 में फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल और अमोल पालेकर की पूर्व पत्नी चित्रा पालेकर के नेतृत्व में 19 पैरेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वे लोग अपने लेस्बियन और गे (समलैंगिक) बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे. आपको याद है कि तब श्‍याम बेनेगल और चित्रा ने सुप्रीम कोर्ट में क्‍या कहा था। उन्‍होंने कहा था, ''हमारे बच्चे अपराधी नहीं हैं. हम अपने बच्चों को बहुत करीब से जानते हैं और वे दुनिया के सबसे अच्छे बच्चे हैं.”

Manisha Pandey : फरवरी, 2011 में फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल और अमोल पालेकर की पूर्व पत्नी चित्रा पालेकर के नेतृत्व में 19 पैरेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वे लोग अपने लेस्बियन और गे (समलैंगिक) बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे. आपको याद है कि तब श्‍याम बेनेगल और चित्रा ने सुप्रीम कोर्ट में क्‍या कहा था। उन्‍होंने कहा था, ''हमारे बच्चे अपराधी नहीं हैं. हम अपने बच्चों को बहुत करीब से जानते हैं और वे दुनिया के सबसे अच्छे बच्चे हैं.”

इस देश के किसी भी समझदार और संवेदनशील व्‍यक्ति ने ये उम्‍मीद नहीं की थी कि 2 जुलाई, 2009 को दिए दिल्ली हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट के महज दो जजों की बेंच किसी मुहल्‍ले की कचहरी जैसा कोई स्‍टेटमेंट देगी। अगर सुप्रीम कोर्ट इस भाषा में बात कर सकता है तो हमारा मुल्‍क कितना समझदार, आधुनिक और लोकतांत्रिक हुआ है, इस बारे में थोड़ा शांत दिमाग से सोचने की जरूरत है।

हर संवेदनशील और ऐसे दिल-दिमाग का इंसान कि जिसके खिड़की-दरवाजे खुले हुए हैं और जहां ताजी धूप और हवा के आने-जाने का रास्‍ता है, सुप्रीम कोर्ट को अचरज से देख रहा होगा और निराश होगा।
इस मुल्‍क में कोई रहे हो कैसे।
और न रह सके और जाए तो कहां जाए?

Manisha Pandey : चित्रा पालेकर ने अपने उस अनुभव के बारे में लिखा है, जब एक शाम अचानक उनकी बेटी शाल्‍मली ने अमोल और चित्रा के सामने ये खुलासा किया कि वो होमोसेक्‍सुअल है। पहली बार तो उन्‍हें सदमा ही पहुंचा था। ये क्‍या कह रही है। शाल्‍मली लेस्बियन है। जिसे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाना कहते हैं, कुछ वैसा ही महसूस हुआ था उस दिन उन्‍हें। लेकिन उसके बाद जिंदगी के 23 साल खुद उस माता-पिता के ग्रो होने, ज्‍यादा संवेदनशील और समझदार बनने की कहानी है, जिन्‍हें उनकी बेटी ने रिश्‍तों और जिंदगी को देखने की एक नई संवेदनशील नजर दी।

चित्रा ने उसके बाद होमोसेक्‍सुअल्‍स पर काफी किताबें पढ़ीं और उन्‍हें समझ में आया कि लोग अलग हो सकते हैं, उनकी चॉइस अलग हो सकती है। लेकिन इस वजह से वो अपराधी नहीं हो जाते। वो जो भी चाहते हैं, वो होना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है और हमें उनके इस हक की इज्‍जत करनी चाहिए। लेकिन एक सामंती और लट्ठमार देश से किस हक, आजादी और इज्‍जत की उम्‍मीद करना भला। लाठी तानकर बाप जो बोले सही, वही सही। और कुछ नहीं सही।
सुप्रीम कोर्ट भी बोले, वही सही,
जो अब्‍बाजान बोले, सही,
जो खाप बोले, सही,
जो चर्च बोले, सही,
जो मौलाना साहब बोले, सही,
जो रामदेव बोले सही।

Manisha Pandey : मैं किसी गे लड़के को पर्सनली नहीं जानती। ऐसा कोई मेरा दोस्‍त नहीं। लेकिन मैं दो लेस्बियन लड़कियों को बहुत करीब से जानती हूं और बिना किस शक और पूर्वाग्रह के ये कह सकती हूं कि वो दुनिया के सबसे बेहतरीन इंसानों में से एक हैं। बहुत जहीन, बहुत मानवीय, संसार की हजारों मुहब्‍बत से भरी हुई। बुखार में पूरी रात मेरे सिरहाने बैठकर ठंडे पानी की पट्टियां रखने वाली। मुझसे उन्‍हें बदले में क्‍या मिलेगा, इस बात की रत्‍ती भर परवाह किए बगैर मुझे प्‍यार करने वाली, मेरा ख्‍याल रखने वाली। और सबसे बढ़कर एक शानदार कपल। एक आदमी और एक औरत आपसी संदेहों, मनमुटावों और झगड़ों से ऊपर उठकर क्‍या रहेंगे, जैसे वो दोनों रहा करती थीं, करती हैं। और इस देश के जाहिलों की जमात कह रही है कि वो अनैतिक, अमानवीय और असंवैधानिक हैं। मूर्खों, जाकर अपने दिमाग का इलाज कराओ कहीं।

इंडिया टुडे हिंदी में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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