Nadim S. Akhter : फेसबुक पर मैंने एक चलन नोटिस किया है. जब तक लोग कामयाब रहते हैं, पद पर रहते हैं, उनकी हुकूमत होती है, तो वे फेसबुक से नदारद होते हैं. पता नहीं, कभी इधर झांकते भी हैं या नहीं लेकिन वे क्या सोच रहे हैं-कर रहे हैं, नहीं बताते. जब तक शहंशाही है, अपने दड़बे में दुबके रहते हैं. लेकिन, लेकिन, जैसे ही बादशाहत जाती है, तो अचानक से बंधु फेसबुक पर प्रकट होने लगते हैं. बताने लगते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं. और भेड़चाल देखिए, फेसबुक पर चेले-चपाटे भी तुरंत जयकार करने लगते हैं. ये नहीं पूछते कि महोदय, अब तक आप कहां थे?? अचानक से दर्शन कैसे, वह भी बिना हमारी किसी तपस्या के!!!?
सार ये है कि अपनी अक्ल लगाओ. जो फेसबुक पर नहीं हैं या नहीं आना चाहते, यह उनकी निजी पसंद-नापसंद है. लेकिन फेसबुक पर चांद की तरह दिखने और गायब हो जाने की अवसरवादिता ठीक नहीं लगती. इस दुनिया का कोई भी कितना ही महान आदमी क्यों ना हो, इतना बिजी नहीं है कि फेसबुक पर कुछ लिखने या शेयर करने का वक्त ना मिलता हो.
टि्वटर को ही देख लीजिए. वहां कोई लोग सक्रिय हैं और लगातार रहते हैं क्योंकि सोशल मीडिया की दुनिया में भी एलीट और सर्वहारा की खाई खोद दी गई है. टि्वटर इलीट टाइप का माध्यम है, आप वहां एक-दूसरे को फॉलो करते हैं, मित्र नहीं बनाते, सो फॉलो करने का ये concept इन स्वनामधन्य टाइप को लोगों को सूट करता है. वो वहां दिख जाएंगे, हमेशा..लेकिन फेसबुक पर तब आएंगे जब शंटिंग में पड़े हों. बाकी सब तो मोहमाया है. जय हो.
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.





