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समूह संपादक बन गए तो क्या हुआ, इतना कृतघ्न नहीं होना चाहिए

यह कहानी एक समूह संपादक जी के बारे में हैं। वह हिंदी पत्रकारिता में खुद को एक आइकन मानते हैं। उनके हर संपादकीय वर्तमान की घटनाओं से शुरू होते हैं और खत्म होते-होते इतिहास की गहराईयों में गोते लगाने लगते हैं। क्या करें? परास्नातक इतिहास से जो किया था, इसलिए आदत से मजबूर हैं। सभी को जबरन इतिहास की घुट्टी पिलाते रहते हैं, चाहे पाठक को जरूरत है या नहीं। वह जितने बड़े संपादक हैं उतने बड़े कृतघ्न भी हैं। लोगों के अहसान या संबंधों को अपने लाभ-हानि के अनुसार याद रखना व भुलाना उनका हुनर रहा है। जोड़-तोड़ उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। दूसरों को टंगड़ी मारकर अपना कैरियर बनाना, जैसे सिद्धांतों में प्रयोगात्मक रूप से सिद्धहस्त रहे हैं।
यह कहानी एक समूह संपादक जी के बारे में हैं। वह हिंदी पत्रकारिता में खुद को एक आइकन मानते हैं। उनके हर संपादकीय वर्तमान की घटनाओं से शुरू होते हैं और खत्म होते-होते इतिहास की गहराईयों में गोते लगाने लगते हैं। क्या करें? परास्नातक इतिहास से जो किया था, इसलिए आदत से मजबूर हैं। सभी को जबरन इतिहास की घुट्टी पिलाते रहते हैं, चाहे पाठक को जरूरत है या नहीं। वह जितने बड़े संपादक हैं उतने बड़े कृतघ्न भी हैं। लोगों के अहसान या संबंधों को अपने लाभ-हानि के अनुसार याद रखना व भुलाना उनका हुनर रहा है। जोड़-तोड़ उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। दूसरों को टंगड़ी मारकर अपना कैरियर बनाना, जैसे सिद्धांतों में प्रयोगात्मक रूप से सिद्धहस्त रहे हैं।
 
वर्तमान में महाशय समूह संपादक के रूप में कनॉट पैलेस के नजदीक स्थित एक बहुमंजिला इमारत में बनी ऑफिस में बैठते हैं। उसी इमारत में भारत सरकार के एक आयोग का भी कार्यालय है। अखबार के मालिकान कांग्रेस से सांसद हैं और भारत के प्रमुख व्यावसायिक घराने से संबंध रखते हैं। संपादक जी का हिंदी साहित्य व पत्रकारिता से पुश्तैनी संबंध रहा है। इऩके पिताजी केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा में बड़े अधिकारी रहे हैं, जिसका उन्हें पत्रकारिता में कैरियर आरंभ करने से लेकर ऊंचे ओहदे तक पहुंचने में लाभ मिलता रहा है।
 
संपादक जी के पिता और मेरे पारिवारिक दादाजी (सगे नहीं, दादाजी के भाई), दोनों घनिष्ठ मित्र रहे हैं। मेरे सगे दादाजी की मृत्यु मेरे पैदा होने से पहले ही हो गई थी। इन्हीं पारिवारिक दादाजी ने मुझे सगे दादा की तरह प्रेम किया। यही पारिवारिक दादाजी उन्नीस सौ पचास के दशक में आगरा कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष रहे। हिंदी साहित्य जगत से उनका गहरा नाता रहा है। हिंदी साहित्य सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा आगरा के भी वह अध्यक्ष रहे। अपने दौर में उनके कई कविता व कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं व प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें हिंदी साहित्य सेवा के लिए समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा है। करीब सालभर पूर्व उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने प्रदेश की जीवित साहित्यिक हस्तियों को सम्मानित किया था, जिसमें उन्हें भी सम्मानित किया गया।
 
मेरे पारिवारिक दादाजी और उक्त संपादक जी के पिताजी एक ही क्षेत्र हिंदी साहित्य से जुड़े होने के कारण दोनों में गहरी मित्रता थी। दादाजी ने मुझे बताया कि “संपादक जी के पिताजी की शादी के लिए लड़की देखने वालों में वह भी शामिल थे।” उनकी शादी दादाजी ने अलीगढ़ से कराई थी। वैसे उनकी पत्नी मेरे दादाजी से बहुत चिढ़ा करती थीं। सामान्यतौर पर होता भी यही है कि महिला अपने पति के गहरे मित्र से चिढ़ती जरूर है, उसे शायद लगता है कि इसी की वजह से मेरा पति घर में नहीं टिक पाता है, और इऩका यह मित्र जब चाहे मुंह उठाए घर में चला आता है। वह सोचती है 'इसके घर आते ही मेरे पति घर की सारी रामायण इसे बताना शुरू कर देते हैं, उसका पति अपने मित्र से उसकी बुराई करने को तो उतावला ही नजर आता है। साथ ही सारे काम छोड़कर इसके चाय-पानी के इंतजाम करने के लिए पतिदेव का ऑर्डर अलग से मिलता है।' ऐसी परिस्थिति में स्वाभाविक रूप से कोई भी महिला अपने पति के घनिष्ठ मित्र से जरूर चिढ़ेगी।
 
दादाजी ने उक्त संपादक जी को बचपन में गोदी में खिलाया है। दादाजी के बच्चे यानी मेरे रिश्ते के चाचा-ताऊ और संपादक जी साथ-साथ खेलेते-कूदते बड़े हुए हैं। युवा अवस्था वाले सभी काम मिल-जुलकर किए हैं, चाहे वो घर वालों से छिपकर फिल्म देखना हो या किसी मामूली सी बात को लेकर बाजार में किसी से झगड़ना, किसी लड़की को प्यार भरे अंदाज में छेड़ना हो या कॉलेज से बंक मारना, सभी साथ-साथ किया है।
 
मेरे पारिवारिक बाबा के पोते ने मास्टर डिग्री पत्रकारिता एवं जनसंचार में किया है। वह, मेरा चचेरा भाई होने के साथ अच्छा मित्र भी है। उसके पत्रकारिता में परास्नातक करने के पीछे घर का साहित्यिक माहौल भी जिम्मेदार रहा है। पत्रकारिता करने बाद करीब दो वर्ष तक उसने एक हिंदी के राष्ट्रीय समाचार पत्र में काम किया। किसी कारणवश वहां से उसे नौकरी छोड़नी पड़ी। उसने मुझे बताया कि जब दादाजी से उसने नौकरी छोड़ने और नई नौकरी की तलाश करने में आ रही दिक्कतों के बारे में बताया तो दादाजी ने उसकी मदद करने के लिए उक्त संपादक जी को फोन करके अपने पोते की मदद करने की सोची।
 
वह अपने पोते को आगरा या यूपी के अन्य अखबारों की यूनिटों में आसानी से उसे लगवा सकते थे। उनके कई घनिष्ट मित्र विभिन्न अखबारों या पत्रिकाओं
में संपादक या अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं। लेकिन वह दिल्ली में पत्रकारिता करने की जिद पर अड़ा हुआ था। उन्होंने उक्त संपादक जी को फोन मिलाया। संयोगवश मैं वहां मौजूद था। दादाजी की संपादक जी से काफी सालों बाद बात हो रही थी। दूसरी तरफ से फोन उठते ही दादाजी ने अपना परिचय दिया। संपादक जी ने लोक मर्यादा निभाते हुए चाचाजी संबोधन के साथ प्रणाम कहा। दादाजी ने संपादक जी से परिवार का हालचाल जानने के बाद अपने पोते के बारे में बताते हुए उसकी मदद करने व अपने अखबार में दिल्ली रखने के लिए कहा। काफी देर बात हुई। संपादक जी ने अंत में कृतघ्नता और अहं का छोड़ा सा नमूना दिखाते हुए कहा “मैं केवल संपादकीय स्तर के मामलों को देखता हूं। सब एडिटर या सीनियर सब एडिटर की भर्ती प्रक्रिया को स्थानीय संपादक देखते हैं। चलिए देखता हूं”। दादाजी ने संपादक जी को बोल दिया कि उनका पोता आपसे मिलने दिल्ली आएगा।
 
दादाजी ने संपादक जी से बातचीत होने के बाद उनके पिताजी यानि अपने पुराने घनिष्ठ मित्र को फोन मिलाया। घर का हाल-चाल पूछा। इसके बाद वह उनके लड़के यानि संपादक जी के बारे में बात करने लगे। संपादक जी के पिताजी फोन पर ही रोने लगे और अपने बेटे के बारे में बुरा-भला बताने लगे। उनके पिताजी ने बताया कि उनका अपने बेटे से कोई संबंध नहीं हैं, वह अलग रह रहे हैं। शायद ओल्ड हाउस बताया था। वैसे दादाजी का उद्देश्य अपने मित्र से उसके संपादक बेटे की शिकायत का था। फोन पर हुई बातचीत के बाद अपने मित्र और उनकी पत्नी की हालत देखकर उन्होंने इरादा छोड़ दिया।
 
दादाजी के कहे अनुसार उनका पोता संपादक जी से मिलने दिल्ली पहुंच गया। कनॉट पैलेस के नजदीक बहुमंजिला इमारत में स्थित अखबार के कार्यालय में तैनात रिसेप्शन वालों ने उससे पूछा “आप किससे मिलने आए हो”। उसने बताया “समूह संपादक जी से”। रिसेप्शन पर तैनात व्यक्ति ने नाम, पता व रेफरेंस पूछकर तुरंत समूह संपादक जी के पीए को फोन मिला दिया। पांच मिनट बाद जवाब आया कि हमने इसे मिलने के लिए नहीं बुलाया था। आ ही गया है तो अंदर भेज दो। अंदर पहुंचते ही पीए ने बायोडाटा मांगा, और वरिष्ठ स्थानीय संपादक के पास भेज दिया। समूह संपादक जी ने कृतघ्नता का एक और नमूना पेश किया, उससे मिलना भी जरूरी नहीं समझा। वरिष्ठ स्थानीय संपादक ने उसे टेस्ट के लिए एनई के पास भेज दिया। एनई ने उससे दिल्ली में गरमाए हुए एक ज्वलंत मुद्दे पर एक खबर लिखवाई। संयोगवश उसकी लिखी हुई खबर हूबहू अगले दिन दिल्ली के संस्करण में फर्स्ट पेज की लीड स्टोरी के रूप में प्रकाशित हुई।
 
टेस्ट के बाद वरिष्ठ स्थानीय संपादक और समूह संपादक के पीए ने फोन पर जानकारी देने की बात कहकर उसे घर भेज दिया। काफी दिनों तक कोई सूचना ना मिलने पर उसने जब समूह संपादक जी और वरिष्ठ स्थानीय संपादक से बात की। उन्होंने बताया कि उसका टेस्ट के दौरान इंप्रेशन बेहद खराब रहा है, हम तुम्हें अपने अखबार में नहीं ले सकते हैं। दादाजी के पोते ने जब समूह संपादक जी को बताया कि टेस्ट में लिखवायी गई खबर आपके अखबार में पहले पेज की लीड स्टोरी बनी थी, तो वह चौंक गए। लेकिन, उसका सलेक्शन नहीं हुआ। उसने भी संतोष कर लिया जो व्यक्ति अपने माता-पिता को घर से निकाल सकता है, वह पुराने संबंधों और अहसानों को कैसे ध्यान रख सकता है। वह तो केवल पद, नाम, शक्ति और पैसे की शब्दावलियों को जानता है। उसे दु:ख केवल इस बात का है कि वह केवल पुरानी जानकारी के आधार पर नौकरी नहीं मांग रहा था, उसने टेस्ट के जरिए अपनी योग्यता भी सिद्ध की थी।
 
                         आशीष कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार में शोध कर रहे हैं. इनसे 09411400108 के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.
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